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असली फोर बाइ फोर (4X4)

 

अपूर्वा चुप-चाप कार से बाहर देख रही थी. उसका गुस्सा अभी तक उतरा नहीं था. विशाल ने कुछ देर पहले ही ‘भद्रा टाइगर रिज़र्व’ जाने का प्लान ड्रॉप कर दिया था और ड्राइवर को वापस होटेल चलने को कहा था. विशाल के हिसाब से दिन ढलने में ज़्यादा वक़्त नहीं, इसलिए टाइगर रिज़र्व में ज़्यादा कुछ दिखने की गुंजाइश कम थी. वैसे भी दिन भर चिकमग्लूर के आस-पास के टूरिस्ट स्पॉट देखने के बाद वो अब होटेल जाकर आराम करना चाहता था. उसने एक बार फिर से अपूर्वा की तरफ देखा…फिर उसे ख़याल आया की ना जाने कब ऐसा मौका हाथ लगे. इसी ट्रिप के लिए तो कितना लंबा इंतेज़ार करना पड़ा था बेचारी को.
‘ये भद्रा टाइगर रिज़र्व वाला मोड़ निकल गया क्या?’ उसने ड्राइवर से पूछा.
‘नहीं सर, ज़रा सा आगे है…जाइएगा क्या?’
‘कब तक खुला रहता है?’
‘लास्ट सफ़ारी पौने छे में जाता है, हम लोग कॅच कर सकते हैं…जैसा कहिए’
‘ले चलो, फिर पता नहीं कब इधर आएँगे’
अपूर्वा अभी भी कार के बाहर ही देख रही थी. पर उसके चेहरे पे गुस्से की जगह, एक छोटी सी मुस्कान आ गयी थी.
कुछ ही देर बाद ड्राइवर ने गाड़ी बायें जाती हुई पतली से सड़क में मोड़ दी.
अचानक ही खेतों और खलिहानों वाला परिदृश्या बदल गया. सड़क की दोनों तरफ घने घने पेड़ो की एक गुफा सी बन गयी. अपूर्वा ने विशाल की तरफ देखा. वो भी गाड़ी से बाहर झाँक रहा था. पेड़ो से परे एक नदी चल रही थी. इसी नदी का काटे हुए रास्ते से उनकी सड़क भद्रा टाइगर रिज़र्व के ओर जा रही थी. नदी थोड़े उफान पर थी…दो दिनों से रुक-रुक बारिश हो रही थी इस इलाक़े में…इस बारिश ने उनकी छुट्टी का भी थोड़ा नुकसान किया था. विशाल मन ही मन इन्द्र देवता से प्रार्थना कर रहा था की वो अपनी कृपा कुछ समय के लिए रोक लें.
भद्रा टाइगर रिज़र्व चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा हुआ था…मान्सून हाल में ही अपनी सौगात दे कर गया था…सारी पहाड़ियाँ गहरे हरे रंग से पूती हुई थी. इस कटोरे जैसे नॅशनल पार्क के बीच से ‘भद्रा’ नदी बहती थी…जिसके किनारों पे आज भी बाघ पानी पीते हुए देखे जा सकते थे. दस किलोमेटेर चौड़े और पंद्रह किलोमेटेर लंबे इस रिज़र्व में करीब तीस बाघ थे, जिनके दर्शन करवाने के लिए वन-विभाग एक ओपन-जीप सफ़ारी चलाता था. बाघों के दर्शन मगर विरले ही हो पाते थे.
सड़क काफ़ी घुमावदार थी, जिससे विशाल को थोड़ी सी परेशानी होनी शुरू हो गयी थी. अपूर्वा को पता था…उसने अपने पर्स से एक एलाईची निकाल कर विशाल के हाथों में रख दिया. विशाल ने भी उस इलायची को उनके बीच हुई संधि का द्योतक मान कर चबाना शुरू कर दिया. वॉमिटिंग वाली फीलिंग धीरे धीरे ख़तम हो गयी. उनकी गाड़ी वन-विभाग के रेस्ट-हाउस पे पहुँच चुकी थी.
‘सर, जल्दी जाइए, लास्ट सफ़ारी कहीं निकल ना जाए’ ड्राइवर ने विशाल को चेतावनी दी.
‘तुम बैठो यहीं, हम पता करके आते हैं’ विशाल ने अपूर्वा से कहा और भागता हुआ रेस्ट-हाउस के बाहर वाले कमरे की तरफ गया.
रेस्ट-हाउस काफ़ी पुराना था…शायद अँग्रेज़ों के ज़माने के समय बनाया गया था…दीवारो पर वन-संरक्षण के संदेश जानवरों के थोड़े अटपटे से चित्रों के साथ मौजूद थे. ‘शायद पैसे कम पड़ होंगे’ विशाल ने सोचा.
कमरे में एक काला पड़ा लॅंप जल रहा था…जंगल में बिजिली कहाँ से आती. उस छोटे से कमरे में करीब दस लोग थे. उनमें से पाँच किसी कॉलेज के स्टूडेंट्स थे…एक और दंपति भी मौजूद था.
आधी वर्दी पहने हुए वन-विभाग का एक कर्मचारी सफ़ारी पे जाने का खर्चा वसूल रहा था.
‘सौ रुपये पर हेड’
विशाल ने नोटीस किया की वो आदमी किसी को भी रसीद नहीं दे रहा था. असल में वन-विभाग के आदेशानुसार सफ़ारी चार बजे ही बंद हो जानी थी. उसके बाद जो भी सफ़ारी होती थी उसका पैसे सीधा इन महानुभाव के पॉकेट में जाते थे. विशाल ने रसीद के लिए जिरह करना ज़रूरी नहीं समझा.
आधी वर्दी वाले गार्ड के पीछे एक पूरी वर्दी पहने दुबला सा आदमी खड़ा था. गार्ड ने उसकी तरफ इशारा करके कहा, ‘ ये रघु है, आपका ड्राइवर और गाइड…ये जैसा बोलेगा वैसा ही करने का’
विशाल ने रघु को एक बार फिर से आँका. ‘ये सींक सा आदमी स्टियरिंग भी हिला पाएगा?’
रघु ने सबको अपने पीछे आने का इशारा किया. विशाल ने कमरे से बाहर आकर अपूर्वा को आवाज़ दी.
‘अंदर बैठना है या बाहर?’ विशाल ने अपूर्वा से पूछा.
‘अंदर ही बैठते हैं…शायद बारिश भी आ जाए’
ओपन-जीप पूरी तरह से ओपन नहीं थी. ड्राइवर और चार पॅसेंजर कॅबिन में बैठ सकते थे…फिर पीछे ओपन कार्गो स्पेस था, जिसमे लोग खड़े या बैठ सकते थे. कॉलेज के लड़कों ने बिना वक़्त ज़ाया किए, कार्गो स्पेस में अपनी जगह पकड़ ली.
रघु ने ड्राइविंग सीट में अपनी जगह पकड़ी.
‘पार्क के अंदर भी ऐसी ही चिकनी सड़क है क्या?’
विशाल ने पूछा.
‘नहीं सर, उधर तो कोई सड़क नहीं है…और अभी बारिश के चलते तोड़ा कीचड़ हो गया है…पर ये स्विच देख रहे हो आप…ये फोर बाइ फोर एंगेज कर देता है…फिर ये जीप कीचड़ में भी मक्खन के जैसे निकल जाती है’ रघु ने ओडॉमीटर के नीचे एक लाल रंग के स्विच की तरफ इशारा किया जिसपे 4X4 लिखा हुआ था.
जीप भी काफ़ी नयी लग रही थी… विशाल के हिसाब से नॉर्मली सरकारी गाड़ियाँ थोड़ी खटारा सी होती थी…पर ये जीप वेल-मेंटेंड थी.
जैसा की रघु ने कहा था, आधे किलोमेटर बाद से ही पक्की सड़क ख़तम हो गयी और सामने सिर्फ़ घास में बनी दो चौड़ी लाइने दिखने लगीं.
कुछ दूर पर एक गेट दिखा जिसपे ताला जाड़ा हुआ था. रघु ने जीप से उतार कर ताला खोला.
‘ये क्या बाघों को रोकने के लिए बनाया है? इतने कमजोर गेट से बाघ रुक जाएँगे क्या?’
जीप में बैठे दूसरे नौजवान जोड़े से ये सवाल आया.
‘नहीं सर, ये बाघों के लिए नहीं है…ये उससे भी ख़तरनाक जानवर के लिए है’
‘क्या बात कर रहे हो…बाघ से ख़तरनाक कौन सा जानवर है यहाँ? कोबरा?’
‘आदमी’
इस फिलोसॉफिकल टिप्पणी से जीप के पसेंजेरो में शांति छा गयी. अचानक अपूर्वा की तेज़ चीख ने उस शांति को तोड़ा.
‘आईईईईईईई….अरे बाप रे…हटाओ इसको’
जीप के पीछे वाली सीट की तंग जगह में अपूर्वा अपने हाथ-पैर छटपटाने लगी.
‘क्या है?’ विशाल ने जीप की कॅबिन लाइट को औन करके पूछा.
अपूर्वा ने धीरे से अपने पैरों की तरफ इशारा करते हुए कहा ‘जोंक'(leech)
विशाल ने ध्यान से देखा…एक पतली सी जोंक ने अपूर्वा की सबसे छोटी पैर की उंगली पर अपनी दावत का इंतेज़ाम कर लिया था.
‘हटाओ ना उसको जल्दी से’
‘कितना क्यूट सा है…अभी तो बेचारा चिपका ही है…थोड़ा सा तो खून चूस लेने दो उसको’
‘इतना ही क्यूट लगा रहा है तो अपने नाक पे लगा लो उसको…जल्दी करो’
अपूर्वा ने गुस्से से कहा.
‘ये नमक लगा लीजिए उसपे, हट जाएगा’
अपूर्वा के बगल में बैठी गोरी सी लड़की ने एक पूडिया उनकी तरफ बढ़ा दी.
जोंक को हटा कर बाहर फेंकने के बाद विशाल ने रघु से कहा,
‘देखा, आदमी से भी ख़तरनाक जानवर था वो…सीधा जीप में ही घुस आया था’
सुनकर अपूर्वा को छोड़, बाकी पॅसेंजर हंस पड़े.
जीप लगभग दो काइलामीटर अंदर आई होगी, तभी पीछे खड़े लड़कों ने रघु को रुकने के लिए कहा,’ राइट साइड में…उधर बड़े वाले पेड़ के नीचे देखो’
चीतल हिरणों की पूरी फॅमिली वहाँ मौजूद थी.
जीप वहाँ करीब तीस सेकेंड रुकी, सबने अपने अपने कॅमरो में उन हिरणों को क़ैद कर लिया. वहाँ से आगे बढ़ते ही एक तेज़ ढालाव आया सड़क में…विशाल ने देखा की ढलाँव के अंत में कीचड़ का एक बड़ा सा तालाब बना हुआ था.
रघु ने एक बार मुड़ कर विशाल को देखा ,’ देखिए अब फोर बाइ फोर का कमाल…पीछे खड़े भाई लोग, थोड़ा संभाल के’
उसने गाड़ी फर्स्ट गियर में डाली और 4X4 वाले स्विच को ऑन कर दिया. गाड़ी कीचड़ में घुसी…एक बार तो लगा की अब फँस ही गयी…मगर चारों चक्कों में पॉवेर थी…गाड़ी लहराती…थोड़ी बाल खाती…कीचड़ से निकल आई.
‘वाह, बहुत बढ़िया ड्राइविंग’ विशाल अपने आप को रोक नहीं पाया.
अब वो लोग जंगल के बीचो-बीच पहुँच गये थे. रोशनी काफ़ी कम हो गयी थी…फिर भी रघु अपने मेहमानों को हर स्पॉट पे ले गया जहाँ दिन में उसने किसी ना किसी जंगली बाशिंदे को देखा था. अभी तक उनकी किस्मत में कुछ लंगूर और चीतल हिरण ही लिखे थे. जीप धीरे-धीरे एक तीखे मोड़ पे पहुँची…मोड़ के दूसरी तरफ भद्रा नदी पर बनी छोटी सी पुलिया थी. रघु ने जीप धीमी करके मोड़ा तो सामने से सड़क गायब…सिर्फ़ पानी.
और वो भी ऐसा वैसा पानी नही…एकदम मटमैला…तेज़ बहाव वाला…पुलिया के पतले पतले रेलिंग सिर्फ़ पानी के उपर दिख रहे थे. ये मंज़र देख कर कुछ देर तो जीप में चुप्पी छाई रही. शायद रघु भी बाकी लोगों जितना ही अचंभित था.
‘ये हमेशा ऐसा ही रहता है क्या?’ विशाल ने पूछा.
‘नहीं…यहाँ एक पुल है…शायद डॅम से पानी छोड़ दिया है’ रघु ने निराशा भारी आवाज़ में कहा.
भद्रा टाइगर रिज़र्व से करीब 5-6 km उत्तर में, भद्रा हयद्रोएलकट्रिक डॅम था. अच्छे मान्सून के चलते उसके रिज़र्वायर में ज़रूरत से ज़्यादा पानी हो गया था. डॅम से पानी छूटता रहता था…और जो पानी छोड़ते थे उनको ये पता था की भद्रा टाइगर रिज़र्व में चार बजे के बाद कोई गतिविधि नहीं होती थी. ये बात रघु भी समझ रहा था की डॅम वालों की कोई ग़लती नहीं थी…पर अभी उसके ज़िम्मे आठ लोग थे, जिनको सकुशल जंगल से बाहर पहुँचाना उसका मुख्य लक्ष्या था.
‘क्या करूँ…निकालने की कोशिश कर सकता हूँ…फुल आक्सेलेटर…फर्स्ट गियर…4X4…हो सकता है, खींच ले’ रघु ने मन ही मन सोचा.
‘वापस नहीं जा सकते क्या, जिधर से आए हैं?’
अपूर्वा ने पूछा.
‘जी उधर भी जो कीचड़ वाला तालाब था ना, वो भी एक धारा ही है इसी नदी की…उसमे भी अब तक पानी आ गया होगा…और वहाँ तो पुल भी नहीं है’
‘ये डॅम वालों को इनफॉर्म करके पानी छोड़ना चाहिए ना…आपको पता था इनका शेड्यूल’ अपूर्वा के बगल में बैठी लड़की ने पूछा.
रघु को समझ में नहीं आया की वो क्या जवाब दे…फिर कुछ सोच कर उसने निर्णय ले ही लिया…
‘देखिए वापस जाने से कोई फ़ायदा नहीं. इसी में निकालते हैं, फुल आक्सेलेटर पे…खींच लेना चाहिए’ रघु की आवाज़ में वो आत्म-विश्वास नहीं था, जो उसने पहले प्रदर्शित किया था.
विशाल को अब वो सारे वीडियोस याद आने लगे जिसमें लोग उफनती हुई नदी के बीच में कार की छत पे फँसे रहते हैं…यहाँ तो कोई फायर ब्रिगेड भी नहीं आएगा बचाने.
‘कोई और रास्ता नहीं है क्या?’ उसने पूछा.
‘ये जंगल है सर, कोई बंगलोर नहीं, की ब्रिगेड रोड में नो-एंट्री हो गया तो आप रिचमंड रोड पकड़ लिए…बस एक यही पुल था इस नदी पे…सिर्फ़ एक ऑप्षन और है की यहीं बैठे रहें, जब तक पानी कम नहीं हो जाता’
पच्चीस-तीस बाघों और ना जाने कितने तरह के साँप-बिछुओं से भरे जंगल में रात बिताने की बात सुनकर लोगों के रोंगटे खड़े हो गये. किसी को भी इन जानवरों के लिए विशेष रात्रि-भोज का मुख्या आकर्षण बनने की कोई लालसा नहीं थी.
‘कितनी देर में पानी नीचे होगा?’ बाहर खड़े लड़कों में से एक ने पूछा.
‘कुछ पक्का नहीं…कभी कभी तो रात भर पानी छोड़ते हैं’ रघु ने जवाब दिया.
विशाल ने अपना फोन निकल के देखा…एक भी नेटवर्क बार नहीं.
‘किसी के भी फोन में नेटवर्क आ रहा है क्या?’ उसने ऊँची आवाज़ में पूछा. निकट-तम आबादी से करीब पचास किलोमेटेर दूर, पहाड़ों के बीच में नेटवर्क कहाँ से मिलता किसी को. सभी ने ‘ना’ में ही जवाब दिया.
‘निकाल दो रघु…कहीं पानी बढ़ गया तो और भी ख़तरनाक हो जाएगा’ बाहर खड़े लड़कों के लीडर ने रघु से कहा.
‘ठीक है…आपक लोग नीचे बैठ जाओ और कुछ ना कुछ पकड़ लो…थोड़ा झटका लगेगा’ रघु ने बुदबुदा के कोई मंत्र पढ़ा और गाड़ी को फर्स्ट गियर में डाला. बाकी लोग भी अपने सबसे विश्वसनीय देवताओं को याद करने लगे. गाड़ी में बैठा दूसरा जोड़ा शायद मुसलमान था…उनके हाथ दुआ में फैले हुए थे.
जीप धीरे धीरे पानी में उतरी…शुरू के दस-पंद्रह फीट तक तो कुछ पता नहीं चला…पुलिया करीब चालीस मीटर लंबी थी. जैसे ही वो मंझधार में पहुँचे, जीप ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगी और धारा के बहाव की तरफ झुकने लगी…यहाँ पानी थोड़ा और गहरा और सबसे तेज़ बहाव वाला था….रघु ने स्टियरिंग उल्टी दिशा में घुमा दिया. गाड़ी में बैठे लोगों की हालत पुख़्ता होने लगी थी…अपूर्वा के नाख़ून विशाल के कंधे मे धंसते चले गये…विशाल खुद इतना डरा हुआ था की उसे दर्द का एहसास भी नहीं हो रहा था. जीप खिसकते हुए रेलिंग से जा टकराई…पतली से रेलिंग ने जीप के वजन को संभाल लिया जो किसी चमत्कार से कम नहीं था…शायद किसी की प्रार्थना का असर हो ही गया था. जीप अभी भी चल रही थी और धीरे धीरे उस उफनती हुई नदी से लड़ते हुए दूसरे किनारे की तरफ बढ़ रही थी. मुश्किल से दस मीटर का फासला रह गया होगा, तभी जीप की आगे के दोनो पहिए झटके के साथ पानी में गहरे धँस गये…शायद नदी के बहाव ने सड़क को थोड़ा काट दिया था…जीप के बोनट तक पानी आ गया. इसके पहले की रघु कुछ कर पाता, जीप का एंजिन हवा के लिए तड़प्ता हुआ..दो तीन झटके मार कर बंद पड़ गया. रघु ने सेल्फ़ में चाभी को ज़ोर से घुमाया…कोई रेस्पॉन्स नहीं.
‘हे भगवान, अब क्या होगा?’ अपूर्वा की चीख निकल गयी.
विशाल ने अपूर्वा के हाथों को अपने हाथों में लेकर उसे शांत कराने की कोशिश की.
जीप में एक डरावनी सी चुप्पिं छाई हुई थी. रघु ने आकसेलेटर पंप करके फिर से चाभी घुमाई…मगर एंजिन कोमा में जा चुका था.
‘हम सब को इस जीप से बाहर निकलना होगा…अब हम कभी भी धार में बह सकते हैं’ विशाल ने कमान संभालते हुए कहा.
‘मगर हम दोनों को तैरने नहीं आता’ जीप में बैठे हुए दूसरे दंपति ने अपनी मजबूरी जताई.
‘आप बाहर जो पानी का बहाव देख रहे हैं उसमे माइकल फेल्प्स भी फेल हो जाएगा. तैरने वाला पानी नहीं है ये. वैसे यहाँ 3 फीट से ज़्यादा नहीं लग रहा है…जीप के सहारे धीरे धीरे निकल सकते हैं हम लोग’
‘मैं पहले निकलता हूँ’ रघु ने अपना दरवाज़ा खोलने की असफल कोशिश की.
‘अनलॉक्ड तो है, फिर खुल क्यूँ नहीं रहा?’
रघु दरवाज़े से लड़ता रहा.
‘नहीं खुलेगा…बाहर पानी का प्रेशर है…खिड़की से निकलना होगा सभी को’
विशाल ने रघु को समझाया. फिर उसने कार्गो स्पेस में सहमे से खड़े लड़को को ढाढ़स बढ़ाते हुए उनसे पहले उतरने की गुज़ारिश की.
‘भाई आप लोग तो मुश्टंडे हो..इतना डरने का क्या बात है…ह्यूमन चैन बना के निकल जाएँगे…आप लोग पहले उतरो और हम लोग को खिड़की से निकलने में मदद करो’
पाँचों लड़के धीरे धीरे जीप की साइड में उतरे फिर खिड़की के दोनों तरफ खड़े होकर अंदर बैठे लोगों को एक-एक करके निकालने में मदद की. अब सब लोग कमर तक पानी में खड़े थे. सबने एक दूसरे के हाथ ज़ोर से पकड़ लिए और धीरे धीरे किनारे की तरफ बढ़ने लगे. पानी भी ठंडा ही था…अपूर्वा को बह जाने से ज़्यादा डर, जोंक से लग रहा था…ना जाने कितने सारे होंगे इस नदी में.
किसी तरह गिरते-संभालते सभी लोग किनारे पहुँचने ही वाले थे की सबसे पीछे चल रहे लड़के ने ज़ोर से चीखा ‘साँप’
मटमैले पानी में एक मोटा काला सा साँप बहता चला आ रहा था…ठीक उनकी तरफ. सबके कदम तेज़ हो गये…पर्रंतु बहाव में बहता हुआ साँप अब पीछे वाले लड़के के काफ़ी करीब आ चुका था…कम से दस फुट लंबा होगा…किंग कोबरा.
उस लड़के से अब और रहा नहीं गया, वो हाथ छुड़ा कर आगे भागने लगा. उसके ग्रूप के लीडर ने उसे रोकने की कोशिश की ‘नो, वेंकट…डोंट रन मॅन’…पर्रंतु वेंकट तो अपने जान-प्राण लिए किनारे की ओर भागने लगा…मगर दो कदम बाद ही लड़खड़ा कर पानी में गिर गया…उधर वो मोटा सा काला साँप शायद भाँप गया था वेंकट के मन का डर…पानी की एक लहर ने साँप को वापस वेंकट की तरफ मोड़ दिया. वेंकट ने जैसे ही पानी में से सर निकाला…सामने कोबरा…जो धीरे से आकर उसके गले में लिपट गया. दोनो लड़कियों की एक साथ चीख निकल गयी ये भयावह मंज़र देख कर. वेंकट बिल्कुल बुत बन चुका था…कोई मूव्मेंट नहीं. बाकी लोग भी सन्न रह गये. तभी विशाल ठहाका मार कर हंस पड़ा.
‘हा-हा-हा…आज तो भोले बाबा के साक्षात दर्शन हो गये’
अपूर्वा अचंभित होकर विशाल को देखने लगी. तभी विशाल ने खुलासा किया,
‘अरे साँप मरा हुआ है…ध्यान से देखो’
वाकई साँप बेजान सा लटका हुआ था…बेचारे वेंकट में भी साँप जितनी ही जान बची थी अब. रघु ने आगे बढ़कर साँप को पूंछ से पकड़ा और हल्के से वापस पानी में छोड़ दिया. ‘कोबरा ही था…शायद फीमेल’
‘चल वेंकट, तब तो उसने तेरी फोटो उतार ली होगी…उसका बाय्फ्रेंड आएगा तुझसे मिलने…बोलना की हम तो बस गले मिले थे..उससे ज़्यादा कुछ नहीं हुआ’ ग्रूप लीडर श्रिनि ने अपने दोस्त से मसखरी की.
‘तेरे गले में अटकता ना तो तेरी भी बड़ी प्यारी फोटो आती सृिणी’ वेंकट अब समान्य अवस्था में आ गया था शायद. उसने ह्यूमन चैन में वापस अपनी जागेह पकड़ ली.
धीरे धीरे सारे लोग पानी से बाहर आ गये. कुछ देर बैठने पर सबके साँस में साँस आई. अब तो बस रघु उनका सहारा था.
‘रेस्ट हाउस करीब दो किलोमेटेर होगा यहाँ से, जल्दी चलिए…पहाड़ो में अंधेरा एकदम अचानक से होता है’
रघु ने समझाया.
‘वैसे एक बात बताओ रघु, हम तो नदी को पार करके दूसरी तरफ आ गये, पर रेस्ट हाउस तो उसी तरफ था? कोई और पुल है क्या?’
विशाल ने एक वज़िब सावला उठाया.
‘घबराईए नहीं…वो काफ़ी उँचा है, उस तक पानी पहुँचना मुश्किल है…अच्छा एक और ज़रूरी बात जो हम लोग शायद भूल गये इस हंगामे में…हमारे साथ इस जंगल में करीब तीस बाघ हैं…कहाँ हैं, ये किसी को नहीं पता…पर उन्हें हमारी गंध ज़रूर मिल गयी होगी’
सच में, सभी लोग इस बात को भूल गये थे वो हैं कहाँ…रघु के बात ने वापस वास्तविकता के धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया सबको…श्रीणी ने पूछा,’पहले कभी अटॅक हूआ है क्या?’
‘नहीं अटॅक तो नहीं हुआ पर दो-तीन नीम- जवान बाघ हैं जो कभी कभी जीप का काफ़ी देर तक पीछा करते हैं…शायद भाई-बहन हैं तीनों…और हम अभी उन्हीं के इलाक़ों से गुजरने वाले हैं’
‘तुम अपने पास कोई गन नहीं रखते?’ अपूर्वा ने रघु से पूछा.
‘जी, गन रखना मना है…सिर्फ़ एंटी-पोचिंग फोर्स को वेपन रखने की इज़ाज़त है…इस जंगल में आदमी की जान से ज़्यादा कीमती बाघ की जान है…ये टाइगर रिज़र्व है…ह्यूमन रिज़र्व नहीं’
विशाल ने काफ़ी सारे टीवी प्रोग्राम देखे थे सुंदर-बन के रॉयल बंगाल टाइगर के बारे में. उसे याद आया की कैसे सुंदर-बन में रहने वाले लोग सर के पीछे मुखौटा लगा के चलते थे…क्यूंकी बाघ हमेशा पीछे से हमला करता है.
इस महत्वपूर्ण जानकारी को उसने ग्रूप के साथ शेयर किया…जिसके प्रकाश में ग्रूप ने रघु को सबसे आगे और विशाल और श्रीणी को पीछे रखकर चलने का निर्णय लिया.
जैसा की रघु ने कहा था…अचानक ही जंगल में रात ने दस्तक दे दी. उनके चारों तरफ झींगुरों की सामूहिक गायन प्रतियोगिता शुरू हो गयी…बीच बीच में अंजान जानवरों की आवाज़, उनके दिलों की धड़कन तेज़ कर जाती.
‘ये लाइयन टेल्ड लंगूर की आवाज़ थी…शायद किसी को रिझा रहा है’ रघु ये सब बता कर वातावरण को थोड़ा हल्का रखने की कोशिश कर रहा था. वैसे उसे भी कोई कम डर नहीं लग रहा था.
तभी एक गहरी सी गुर्राहट की आवाज़ आई…पास से ही. रघु रुक गया…वो जानता था की बाघ के गुर्राने की आवाज़ कैसी होती है. ये शायद उन्हीं तीन भाइयों में से एक था. उसने सबको चुप रहने का इशारा किया. सामने ही एक बड़ा सा पेड़ था…उसने इशारों में सबको धीरे धीरे उसपे चढ़ने को कहा.

दो लड़के उपर चढ़ गये और बारी बारी से बाकी लोगों को सहारा देकर उपर खींचने लगे. रघु सबसे आखरी में उपर आया. विशाल ने सोचा जितनी आसानी से वो लोग उपर आ गये थे…बाघ तो नींद में चलते हुए आ जाएगा.
लोग सांस थामे बैठे हुए थे. एक बार फिर से गुर्राने की आवाज़ आई…इस बार ज़्यादा पास से. सबसे नीचे वाली डाल पर अपूर्वा और विशाल बैठे हुए थे…एक दूसरे को ज़ोर से पकड़े हुए…अपूर्वा डरी तो हुई थी पर्रंतु इस अपनी परिस्थिति देखकर उसे ‘वो कौन थी’ फिल्म का वो विस्मरणीय गीत याद आ गया ‘लग जा गले…की फिर हँसी रात हो ना हो…शायद अब इस जनम में मुलाक़ात हो ना हो’
वो लोग पता नहीं कब तक उस पेड़ के आश्रय में बैठे रहे. गनीमत से बंदर नहीं थे वहाँ, वरना मुश्किल हो जाती. अब बिल्कुल अंधेरा हो चुका था. जंगल का अंधेरा थोड़ा ज़्यादा गहरा होता है…चाँद निकालने में अभी समय था और तारों की रोशनी पेड़ों की घनी परतों को भेद पाने में असक्षम थी. कुछ देर तक तो हाथ को हाथ नहीं दिख रहा था. फिर धीरे धीरे सबकी आँखें अंधेरे के अनुकूल हुई…और पेड़ की जड़ की तरफ टिक गयीं.
उनके पेड़ पे चढ़ने के कुछ समय तक तो बाघ की गुर्राहट सुनाई देती रही…उस गुर्राहट का जवाब दूर से कोई और बाघ भी दे रहा था. मगर करीब दस मिनिट से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी.
अपूर्वा को अब ये लगने लगा की शायद वो बाघ कहीं और चला गया था. तभी उसकी नाक में एक विचलित कर देने वाली गंध ने दस्तक दी. उसने दुपट्टे से अपने नाक को ढक कर नीचे देखा…उसके ठीक नीचे दो जोड़ी चमकती हुई आँखें…अपूर्वा को लगा जैसे उन आँखों में कोई सम्मोहन की शक्ति थी…एक अजीब से लालसा…एक पाशविक भूख. उसे लगा जैसे वो अद्भुत जानवर अपनी उन आखों से अपूर्वा को टेलिपाथी के ज़रिए उसके पास आने का संदेश दे रहा था.
विशाल ने भी उनके ठीक नीचे खड़े बाघ को देख लिया था. उसने अपूर्वा के हाथ को ज़ोर से पकड़ लिया, जिससे अपूर्वा का ध्यान टूट गया…उसने अपना हाथ छुड़ा कर अपने मूँह पे रख लिया…ताकि वो चीख ना सके.
विशाल अपना अगला कदम सोच ही रहा था की उसके पीछे अचानक एक तेज़ रोशनी चमकने लगी…रघु था…हाथ में एक छोटी सी मशाल, जो शायद उसने अभी ही तैयार की थी. विशाल ने प्रश्न भरी निगाह रघु पे डाली तो उसने मुस्कुराते हुए अपनी जेब से एक लाइटर निकाल कर दिखाया. मशाल की रोशनी में अब बाघ की काया साफ साफ दिखने लगी थी…बड़ा सा सर…सुडौल कंधे और बाहें…बड़े बड़े पंजे, जिनके एक वार से वो इन मनुष्यों के दो टुकड़े कर सकता था. उस बाघ ने पेड़ पे चढ़ने की कोशिश की…विशाल और अपूर्वा आपस में सिमट गये…विशाल ने सोच लिया था की अपने मोटे सोल वाले वुडलॅंड के जूतों से एक किक तो ज़रूर लगाएगा उस बाघ को…जब मरना ही है तो लड़ का मरो.
तभी रघु नीचे की ओर बढ़ा…मशाल के साथ…बाघ पीछे हट गया. रघु अब विशाल के बराबर बैठा था…पेड़ के दूसरे तरफ…बाघ नीचे खड़े होकर अपने डिन्नर बफे के डरे-सहमे आइटमों को निहार रहा था. उसने एक बार फिर उपर आने की कोशिश की..तेज़ी के साथ…रघु ने लपक कर बाघ की आँखों में मशाल झोंकने की कोशिश की…मगर उसका संतुलन बिगड़ गया और वो मशाल के साथ बाघ के समक्ष गिर गया.
उपर बैठे सभी लोग सन्न रह गये. उन्होने सोचा नहीं था की बाघ को शिकार करते हुए भी देख लेंगे…लाइव…वो भी एक आदमी का.
गनीमत से रघु को ज़्यादा चोट नहीं आई थी…इसके पहले की बाघ कुछ कर पाता, रघु ने मशाल दुबारा पकड़ी और बाघ की ओर लहराने लगा. तभी रघु को किसी पीछे से ज़ोर का धक्का मारा…वो निढाल होकर ज़मीन पर गिर गया. दूसरा बाघ अपने भाई का निमंत्रण स्वीकार करके भोज-स्थल पर पधार चुका था.
दो बाघ…उनके बीच एक निढाल सा…पतला दुबला और ज़ख़्मी इंसान…उपर बैठे लोग बिल्कुल असहाए…करें तो क्या?
अचानक दोनो बाघों के बीच एक चौकोर सी चमकती हुई चीज़ आ गिरी…और इस जंगल की वादियों में शायद पहली बार ‘आ अन्ते अमलापुरम’ गाने की धुन सुनाई दी होगी. श्रीणी ने अपने फोन पे ये गाना लगाकर नीचे फेंक दिया था…शायद इस कोशिश में की बाघों का ध्यान बाँट जाए और उसका फायेदा उठा कर रघु वापस उपर आ जाए.
दोनो बाघ पहले तो घबरा गये…फिर एक धीरे धीरे आगे आकर फोन को सूंघने लगा. उसकी नाक से टच-फोन पे कोई बटन दब गया…और स्क्रीन पे आ गये सूपर-स्टार रजनीकांत… फर्रटेदार तमिल में कुछ डाइयलोग बोलते हुए…दोनों बाघ थोड़े व्याकुल होकर फोन के आस-पास मंडराते रहे…रघु अगर बेहोश नहीं रहता तो शायद बच कर निकल सकता था. पर दूसरे बाघ के दाहिने पंजे ने उसकी पीठ पे गहरा घाव कर दिया था.
रजनीकांत का डाइयलोग चल ही रहा था की एक तेज़ धमाका हुआ…बंदूक की आवाज़…दोनो बाघ अंधेरे में गुम हो गये.
पेड़ पे छुपे लोगों को गोली की आवाज़ समझ नहीं आई. श्रीणी को तो लगा की रजनी सर के प्रभाव से ही शायद बाघ भाग खड़े हुए थे…’बिना बात के ही लोग उनकी पूजा नहीं करते’ उसने सोचा.
तीन लोगों की एक टीम, कैमोफ़लाज वाले कपड़ों में…बंदूकों से लैस उनके पेड़ के नीचे आकर खड़ी हो गयी…एंटी-पोचेर स्क्वाड के गार्ड्स.
उनमें से एक ने टॉर्च की रोशनी मारी रघु के चेहरे पर.
‘ये तो रघु है..अपना ड्राइवर…साँस तो चल रही है’
सुनकर पेड़ पे बैठे लोगों को विश्वास हो गया की ये अच्छे लोग थे…पोचर्स नहीं.
‘जी हम लोग उपर हैं..यहाँ पेड़ पर…रघु पे एक बाघ हमला किया था.’ विशाल ने आवाज़ दी.
तीन टॉर्च एक साथ उनक तरफ मुखातिब हो गयीं.
‘आप लोग कौन हैं?’
‘जी हम तो सफ़ारी के लिए आए थे…पीछे जीप नदी में फँस गयी…तो पैदल वापस जेया रहे थे’ विशाल ने खुलासा किया.
‘आप लोग संभल कर नीचे आइए’
टॉर्च और मशाल की रोशनी में सभी आठ लोग नीचे आए. तब तक फोरेस्ट गार्ड की उस टोली ने एक मेक-शिफ्ट स्ट्रेचर तैयार कर दिया था रघु के लिए, जो अभी भी बेहोश था.
‘आपके पास कोई जीप वग़ैरह नहीं है क्या?’ वेंकट ने पूछा.
‘नहीं, हम पैदल ही पेट्रॉल्लिंग करते हैं…वैसे हमे शॉर्ट-कट पता है…आइए’
चलते हुए विशाल ने पूछा
‘आप लोग नहीं आते तो हमारा तो बहुत बुरा हाल होने वाला था…पर आपने हमें ढूँढ कैसे लिया इतने घने जंगल में’
‘भाई इतने घने जंगल में आप अंधेरे में पेड़ की उँचाई पे रोशनी करोगे तो दूर से ही दिख जाती है…हम तो आपको ढूँढने भी नहीं आए थे…हमने तो सोचा की कोई पोचर्स का ही ग्रूप है…पास आए तो ‘आ अन्ते अमलापुरम’ बजता हुआ सुनाई पड़ा…उसकी आवाज़ से भी आसानी हुई आप लोगों तक पहुँचने में’
पूरी टोली, जंगल के बीच से होते हुए करीब तीस मिनिट बाद रेस्ट-हाउस पहुँच गये. वहाँ पहुँच कर सबने अपने अपने भगवान के साथ साथ उन फोरेस्ट गार्डों को भी धन्यवाद दिया जो उन्हें सही सलामत वापस ले आए थे.

रघु को वन विभाग की स्टेशन वॅगन में रख कर हॉस्पिटल ले जाने की तैयारी हो रही थी. भगवान की कृपा से उसे होश भी आ चुका था. सबने बारी बारी से उसका धन्यवाद किया और बहादुरी की दाद दी.
विशाल आखरी में गया ‘रघु भाई…सच कहूँ तो जब मैने आपको पहली बार देखा तो लगा की ये दुबला पतला निरीह सा आदमी क्या कर पाएगा…मगर आपने दिखा दिया की आपकी जीप की तरह आप भी एकदम फोर बाइ फोर हो…किसी भी सिचुयेशन से निकालने में माहिर…आप कभी बंगलोर आओ…तो हमारे घर ज़रूर आना..ये मेरा कार्ड, आडड्रेस पीछे लिखा है’
रघु ने सर हिला कर वचन दे दिया.
लोगों ने श्रीणी के हाजिर दिमाग़ की भी तारीफ की. एक एक करके सबने वहाँ से विदा ली…सबका बोरिंग सा टूर अपने आप ही जीवन पर्यंत याद रहने वाला किस्सा बन गया था.