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Batman in Bihar Matric Exam hall

बैटमैन इन पटना – एपिसोड 5

बैटमैन परीक्षा हॉल में
बैटमैन यानी ब्रूस वेन सुबह का नाश्ता करने बैठे. सामने एक दिन पहले आयी चिट्ठियां पड़ी थी. ब्रूस ने एक सरकारी मुहर वाली चिठ्ठी उठाई.

‘अल्फ्रेड, ये कल का पोस्ट है क्या?’

‘हाँ, मास्टर ब्रूस…बिहार स्टेट एग्जामिनेशन बोर्ड से भी एक चिट्ठी आयी है…देख लीजियेगा’

वेन साहेब ने वो चिट्ठी खोली. चिट्ठी में उनसे आग्रह किया गया था एक ऐसे एग्जाम सेण्टर का इंचार्ज बनने के लिए जो पिछले साल वहां हुई चोरी और चीटिंग के लिए बहुत प्रसिद्ध हुआ था. राम कृपालु सिंह मेमोरियल कॉलेज, हाजीपुर का एग्जामिनेशन इंचार्ज बनने के लिए सनी देओल जैसा ढ़ाई किलो का हाथ और पांच किलो का जिगर के साथ साथ राजकुमार जानी जैसा स्वैगर भी चाहिए होता था. ब्रूस वेन साहब ने ये चैलेंज स्वीकार करके अपनी सहमति भेज दी. कुछ ही दिनों में एग्जाम का डेट आ गया.

भोरे भोरे ब्रूस वेन अपने गाडी से हाजीपुर के लिए निकल पड़े…अल्फ्रेड के हाथों से दही-चीनी खाकर…एक तरह से उनकी भी परीक्षा थी. उन्होंने अपने जी-पी-एस पे देखा…गांधी सेतु पर भयंकर जाम.

‘बाप रे…इसमें फंसे तो परीक्षा का टाइम मिस हो जायेगा’

तभी उन्हें एक आईडिया आया…नया नया दीघा-पहलेजा घाट पुल बना था…मगर उसमे अभी सिर्फ रेल गाड़ी चल रही थी…रोड का काम अभी ख़तम नहीं हुआ था. परंतु बैटमैन साहब के गाड़ी भी बेजोड़ थी…बैटमैन साहब ‘पाटलिपुत्र’ स्टेशन पहुंचे और सीधे पटरी पर गाड़ी चढ़ा दिए…फिर एक बटन दबाया तो गाड़ी के रबर टायर ऊपर उठ गए और अंदर से स्टील के रेल गाड़ी जैसे छोटे छोटे पहिये पटरी पर फिट हो गए…उनकी गाड़ी अब एक ट्राली में बदल गयी थी…आराम से चलते हुए उन्होंने नए बने पुल की सुंदरता को मापते और गंगा जी को मन ही मन प्रणाम करते हुए पुल पर कर लिया. इस तरफ से कॉलेज और पास ही था…ब्रूस वेन ने गाड़ी पार्क करके अपने रिमोट चाभी पर एक बटन दबाया और उनकी धांसू गाड़ी एक पुराने से सफ़ेद फ़िएट में बदल गयी. उनको पता था की ऐसे देहाती इलाकों में डिज़ाइनर गाड़ी देख कर लोग ज्यादा उत्साहित हो जाते हैं.

परीक्षा शुरू हुई…वो एक रूम से दुसरे रूम में जाकर निरीक्षण करने लगे. चौथे माले पर एक रूम की खिड़की के बाहर लगा की कोई आदमी लटका हुआ है…ब्रूस वेन ने सोचा की कहीं उनके अभिन्न मित्र ‘स्पाइडर मैन’ तो नहीं उनसे मिलने आ गए…खिड़की पर पहुँच कर उन्होंने मुंडी बाहर निकाली. छज्जे पर एक सज्जन खड़े थे.

‘कौन है आप…यहाँ क्या कर रहे हैं?’

नीचे खड़ा आदमी पहले तो घबरा गया और अपना संतुलन किसी तरह संभल कर बोला,

‘जी हम राज मिस्त्री हैं सर…ये छज्जा हम ही बनाये थे…वही टेस्ट करने आये थे की कैसा बना है’

ब्रूस वेन ने चारों तरफ मुंडी घुमाई…लगभग हर छज्जे पर कोई न कोई टंगा हुआ था,

‘यहाँ हर छज्जे का ठेका अलग अलग मिस्त्री को मिलता है क्या?’

‘जी सर…सही पकडे हैं…सामाजिक न्याय का इससे अच्छा उदहारण और क्या होगा…हें-हें-हें’

नीचे खड़े आदमी ने अपने गुटखे से रंगे दांत निपोड़ दिए.

‘रुकिए आपका हम असली सामाजिक न्याय करवाते हैं’ ब्रूस वेन साहब ने नीचे बैठ कर खैनी मल रहे हवलदारों को पीछे जाकर इन ‘राज-मिस्त्री’ को पकड़ कर उनकी अच्छे से ‘इस्त्री’ करने को कहा. जब तक वो वापस खिड़की पर आये सारे ‘मिस्त्री’ फरार.

ब्रूस वेन साहब ने अपना एक फ़ोन टैपिंग गैजेट निकल कर एक्टिवेट कर दिया…वैसे तो एग्जामिनेशन हाल में फ़ोन या ब्लूटूथ लाना मना था, मगर वो जानते थे की आजकल के छात्र और उनके अभिभावक बहुत ही जागरूक थे नयी तकनीक के विषय में . टैपिंग शुरू होते ही उनके यंत्र ने एक चालू कॉल को इंटरसेप्ट किया,

‘पप्पा…दस नंबर का क्वेशचन है…डार्विन के विकासवाद के सिद्धान्त का व्याख्या करें…जल्दी से मेन पॉइंट सब बताइये किताब देख कर’

‘डार्विन…डार्विन…डार्विन…ई किताब में डार्विन तो कहीं नहीं है जी…लेनिन भले है…उसका कोई थ्योरी बताएं?’

‘कौन सा किताब ले आये हैं पप्पा आप? साइंस का है की सोशल साइंस का? आज साइंस का पेपर है’

‘ओह्हो ये सोशल साइंस का है…पप्पुआ एक दम गदहा है..वही रखा था गाड़ी में’

‘किसी और से मांग के लिखवाइए ना’

‘और किस से मांगे…सब तो अपना अपना पुर्जा बनाने में लगा हुआ है…रुको देखते हैं’

तब तक ब्रूस वेन साहब ने अपना तिकडम लगाया और ‘पप्पा’ की आवाज की नक़ल करते हुए शुरू हो गए,

‘अरे मिल गया साइंस का किताब…लिखो डार्विन का सिद्धान्त,

नंबर १- वैसे तो कुछ जीव मनुष्य की तरह दीखते हैं परंतु वो अपने पूर्वज बन्दर से भी गए गुजरे हैं. ऐसे लोगों पर डार्विन की ‘सर्वाइवल ऑफ़ दी फिट्टेस्ट’ की थ्योरी को लागू नहीं होती. किसी विचित्र संयोग से ऐसे जीवों की संख्या हमारे परिवार में बहुत ज्यादा है…लिख लिया?’

‘हाँ पप्पा…आगे बोलिये’

‘नंबर २- डार्विन ने बहुत रिसर्च करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे की ‘नक़ल करने के लिए भी अक्ल चाहिए’…समझे रे बकलोल प्रसाद’

‘पप्पा…एग्जाम के टाइम तो हमको ‘बकलोल’ मत बोलिये…अच्छा नहीं लगता है…रिजल्ट आएगा तो जो बोलना है बोलियेगा’

‘रिजल्ट तो तुम्हारा तब आएगा जब तुम ये एग्जाम दे पाओगे…चलो खड़े हो जाओ’

ये आवाज उस बालक के पीछे से आयी थी…ब्रूस वेन के यंत्र ने ब्लूटूथ को ट्रैक कर लिया था. लड़के ने एक दम स्किन- कलर का ब्लूटूथ लगाया हुआ था.

ब्रूस वेन ने दूसरा शिकार किया था. बाकी के शिक्षक और निरीक्षक, उनसे काफी प्रभावित हुए. कुछ देर बाद ब्रूस वेन साहब प्रकृति की पुकार का जवाब देने शौचालय पहुंचे. अंदर घुसते ही वो दंग रह गए…चारो तरफ चिट-पुर्जे बिखरे हुए. कोई जगह नहीं छोड़ा था…उन्हें समझ नहीं आया वो ‘करें’ कहाँ. शायद बाहर से लोगों ने चिट पुर्जे बना बना कर जंगले से अंदर फेंके थे.

‘बताइये…परीक्षा के पहले सब किताब- कॉपी को प्रणाम करता है और आज ये हालत’

उन्होंने एक पूर्जा उठाया…उत्तर में लिखा था

‘ऊँट रेगिस्तान का हवाई जहाज होता है’

लगता है पूर्जा बनाने वाले ने भी किसी की नक़ल उतारी थी और थोड़ा अपना दिमाग भी लगा दिया था. आगे मनुष्य के पाचन -तंत्र का रेखा-चित्र था…जिसमे पाचन से जुड़े अंगो को छोड़ कर बाकी सब कुछ दिखा दिया गया था…किडनी…फेफड़ा…दिमाग…टॉन्सिल. उन्हें बेचारे छात्र पर दया आ गयी जिसकी मदद करने वाले ऐसे महानुभाव लोग थे.

उन्होंने क्लीनर को बुलाकर सारे कागज़ उठवाये…तभी एक लड़का अंदर आया और ब्रूस साहब और क्लीनर को देखकर ठिठका.

‘कुछ खोज रहे हो क्या?’ वेन साहब ने पुछा.

‘नहीं सर…वो तो ऐसे ही’ बोलकर बालक वापस जाने लगा.

‘जो करने आये थे उसका प्रेशर ख़तम हो गया क्या?’ ब्रूस ने टोका.

‘नहीं सर…अब तो कोई और ही प्रेशर लगा गया है हमारे ऊपर’ बोल कर लड़का वापस अपने सीट पर भागा.

ब्रूस वेन वापस आकर निरीक्षण शुरू कर दिए. एक कमरे में कोने से उन्हें एक चमक आयी…पास गए. लड़का चुप चाप बैठा था.

‘खड़े हो जाओ’

ब्रूस वेन ने लड़के तलाशी ली. जेब से मैग्नीफाइंग गिलास निकला. लड़के का आंसर पेपर झाड़ा तो उसमे से एक छोटा सा पुलिंदा गिरा…उठा कर देखा तो पाया की पूरी की पूरी किताब का ‘माइक्रो ज़ेरॉक्स’ करवा लिया था लड़के ने…बस एक गलती हो गयी की कुछ ज्यादा ही माइक्रो हो गया था…इसलिए मैग्नीफाइंग गिलास. एक और सस्पेंशन.

तभी ब्रूस वेन साहब की नज़र पानी वाले लड़के पर पड़ी. पोकेट में कुछ भर रखा था…रोक कर तलाशी ली तो बहुत सारे चिट पूर्जे निकले. सब पर रोल नंबर लिखा था. पानी वाले ने एक पांच सौ का नोट भी दिया…उसपे भी रोल नंबर लिखा था. ब्रूस वेन को कौतुहल हुआ…रोल नंबर वाले डेस्क पर पहुंचे. एक लड़की बैठी थी चुप चाप. उन्होंने आंसर पेपर उठाया…कोई भी उत्तर नहीं लिखा गया था…सिर्फ एक इमोशनल लेटर लिखा गया था एग्जामिनर के नाम…

‘महोदय/महोदया

मेरी माता को कैंसर है…पिताजी को एड्स है…छोटे भाई को इबोला है और बड़े भाई को वाइन फ्लू…वगैरह वगैरह…ये पाँच सौ रुपये मेरी तरफ से एक प्रार्थना है आपके चरणों में…कृपया मुझे पास कर दीजिये वरना मेरे माता पिता को बहुत सदमा लगेगा…वगैरह वगैरह’

शायद लड़की को सिर्फ बिमारियों के नाम के अलावा उनके बारे में कुछ नहीं पता था. ब्रूस वेन ने वो पांच सौ का नोट उस लड़की को दे दिया. वो जानते थे की उस पांच सौ के नोट से पेपर चेकिंग सेण्टर पे बहुत सारे समोसे और चाय का इंतज़ाम होने वाला था.

ब्रूस वेन को एक बात की तसल्ली थी की कम से कम नब्बे प्रतिशत लड़के लड़कियां शान्ति से अपनी परीक्षा दे रहे थे. साल भर की मेहनत आज रंग ला रही थी…उन्हें किसी चिट पुर्जे की ज़रुरत नहीं थी. मगर ब्रूस वेन को इस बात का दुःख भी हुआ की इन कुछ चोरी करने वालों की वजह से पूरा बिहार बदनाम हो जाता था. आज उन्होंने ने इस चोरी चकारी के चक्र को लेकिन काफी हद तक तोड़ दिया था.