जब दो भारतीय हंटरों ने चार पाकिस्तानी सेबर जेट की शिकस्त दी-

अल्फ्रेड कुक अपने ‘हंटर’ विमान के साथ.

 

सन्न पैसठ का भारत पाकिस्तान युद्ध- पूर्वी मोर्चा
स्थान- भारतीय वायु सेना का कलाईकुंडा एयर फाॅर्स स्टेशन. सात सितंबर, १९६५

सन्न पैंसठ के युद्ध में ऐसे कई मौके आये जब पाकिस्तानियों ने पहले वार किया…चोट पहुंचाई…मगर भारत की फ़ौज ने उस पहले वार की चोट को नज़रअंदाज़ करके ऐसा जवाबी हमला किया की पाकिस्तानियों को उनकी अभी तक भारत में ही बसी नानी याद गयी. ऐसा ही एक वाकया हुआ था पश्चिम बंगाल में खड़गपुर के पास स्थित कलाईकुंडा एयर फाॅर्स स्टेशन पर.

छे सितंबर को भारत की फ़ौज ने पश्चिमी मोर्चे पर  अंतराष्ट्रीय सीमा को लाँघ दिया था. उसके पहले कश्मीर के छम्ब -जौरियाँ सेक्टर में  नियंत्रण  रेखा पर भयंकर लड़ाई चल रही थी, जिसमे पाकिस्तान का पलड़ा भारी होने लगा था. पाकिस्तानी फ़ौज अखनूर पर कब्ज़ा करके पूरे जम्मू कश्मीर का भारत से संपर्क काटने का इरादा लेकर चली थी. अखनूर पर दबाव कम करने के लिए शास्त्री जी की अगुवाई में भारत ने युद्ध के दायरे को बढ़ाने का फैसला लिया. इस फैसले में पूर्वी मोर्चे* पर कोई भी कार्यवाई न करने की हिदायत दी गयी थी. भारत एक साथ दो दो मोर्चे नहीं खोलना चाहता था. (*उस समय बांग्लादेश, पूर्वी पाकिस्तान हुआ करता था.)

पूर्वी एयर कमांड के सीनियर कमांडर्स ने शायद सरकार के आर्डर को ठीक से नहीं पढ़ा था…इसलिए कोई कार्यवाई न करने के आदेश के बावज़ूद, सात सितंबर की सुबह कलाईकुंडा से दो कैनबेरा बमवर्षक विमान ने उड़ान भरी. उनका निशाना था चिट्टगांव बंदरगाह. एक बात गौर करने की है यहाँ की हमारी सेनाएं अपने स्ट्राइक मिशन पहले से ही प्लान और प्रैक्टिस करके रखती है. हमारी सेनाएं ‘भोज के समय कोंहड़ा नहीं रोपती’…जैसा की बिहार में कहावत है…कोहंड़ा रोपा के…तैयार होके, कटा के रखा रहता है…लड़ाई शुरू होने पर बस उसका तीखा सब्ज़ी बनाके दुश्मन के मुँह पे…

युद्ध शुरू होने के बाद ज्यादातर टैक्टिकल यानी सामरिक प्लानिंग होती है…दुश्मन के मूवमेंट के अनुसार. जैसे की भारतीय आर्मी की किसी टुकड़ी को हवाई मदद चाहिए (जैसा की लोंगेवाला में हुआ था). इसलिए चिट्टगांव पर की गयी इस बमबारी की योजना पहले से बनी हुई थी. सात सितंबर की सुबह उसे कार्यान्वित कर दिया गया.

दोनों कैनबेरा बमवर्षक विमान अपना मिशन पूरा करके सकुशल वापस कलाईकुंडा आ गए. मगर जिस समय दोनों विमान लैंड करने के बाद अपने हैंगर की तरफ जा रहे थे, चार पाकिस्तानी सेबर-जेट विमानों ने कलाईकुंडा एयर फाॅर्स बेस पर हमला कर दिया. हुआ ये था की ये चारो सेबर जेट, ढाका के ऊपर ‘कैप’ यानी कॉम्बैट-एयर- पैट्रॉल की ड्यूटी पर थे. कॉम्बैट एयर पैट्रॉल एक ऐसी नीति है जो हर वायु-सेना युद्ध के समय अपने महत्वपूर्ण ठिकानो के ऊपर लागू करती है. फाइटर- इंटरसेप्टर यानी लड़ाकू विमानों की एक टोली, हथियारों  से लैस, हवा में एक निश्चित ऊँचाई पर गोल गोल चक्कर काटती रहती है. इससे किसी भी हमले से निपटने में लगने वाली समय सीमा कम हो जाती थी. वरना, कम से कम दो से चार मिनट लगते थे पायलट को अपने बंकर से निकल कर, विमान को स्टार्ट कर के टेक-ऑफ के बाद दुश्मन को चुनौती देने में. हवाई हमलो में हर सेकंड की बहुत कीमत होती है. और चूँकि हवाई हमले उन दिनों, ज्यादातर या तो बिलकुल सवेरे (डौन) अथवा गोधुली बेला में  (डस्क) में होते थे, कॉम्बैट एयर पैट्रॉल भी इसी समय एक्टिवेट किये जाते थे.
ढाका के ऊपर सर्किट में घूम रहे इन चारो सेबर जेट को पाकिस्तानी एयर फाॅर्स कण्ट्रोल ने भारतीय बमवर्षकों की जानकारी दी. इन चारो विमानों ने तुरंत वापस लौट रहे भारतीय विमानों पर हमला नहीं बोला..बल्कि चुप चाप उनके पीछे पीछे कलाईकुंडा पहुँच गए. कलाईकुंडा एयर बेस पर किसी को इस हमले का कोई अंदेशा नहीं था. यहाँ तक की विमान -भेदी (एंटी एयरक्राफ्ट) तोप के कवर भी नहीं हटाये गए थे. पाकिस्तानियों ने आते ही इस उनींदे से एयर बेस को जबरदस्त तरीके से नींद से जगाया. सेबर जेट की ‘एम् थ्री ब्राउनिंग हैवी मशीन गन’ की गूँज से पूरा एयर बेस दहल उठा. हर सेबर जेट में ऐसी छे मशीन गन होती हैं…ठीक उसकी ‘नोज’ पर. पाकिस्तानियों ने सबसे पहले तो चिट्टगांव से वापस आये कैनबेरा विमानों को अपना निशाना बनाया.  फिर कतार में खड़े, हथियारों और ईंधन से लैस, वैम्पायर हलके बमवर्षक विमान उनका शिकार बने. चार वैम्पायर विमान पूरी तरह ध्वस्त हो गए. पाकिस्तानी विमानों को कोई चुनौती नहीं देने वाला नहीं था…वो आराम से घूम घूम कर बमबारी करते रहे…फिर जब उनके मशीन गन में गोलियां नहीं बची तो चारो पाकिस्तानी विमान वापस ढाका के बाहर स्थित अपने बेस, तेजगाँव लौट गए.

भारतीय वायु सेना के अधिकारी और टेक्निकल स्टाफ जो अब तक ‘ट्रेंच’ में छुप कर तबाही का वो मंज़र देख रहे थे, अब धीरे धीरे बाहर आये. उन्होंने एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला…जितनी आसानी से पाकिस्तानियों ने मौके का फायदा उठाया…वो ज़रूर वापस आएंगे. ढाका वापस जाकर, ईंधन और हथियारों से लैस होकर वापस आने के समय का हिसाब लगाकर ये अंदाज़ लगाया गया की अगली पाकिस्तानी रेड, साढ़े दस बजे के आस पास होनी चाहिए…और लीजिये…पाकिस्तानी दस मिनट पहले ही आ धमके…ज़ख़्मी कलाईकुंडा को पूरी तरह नेस्तनाबूत करने.

परंतु इस बार भारत के एयर डिफेन्स राडार ने इन घुसपैठियों की पहचान कर ली थी. दमदम, कलकत्ता के ऊपर दो ‘हंटर’ लड़ाकू-बमवर्षक विमान, कॉम्बैट एयर पैट्रॉल पे थे. लीड पायलट थे फ्लाइट लेफ्टिनेंट अल्फ्रेड कूक और उनके विंगमैन थे फ्लाइंग अफसर ममगैन.

अल्फ्रेड कुक और ममगैन.

दोनों पायलट्स को तुर्रन्त ही कलाईकुंडा की तरफ जा रहे पाकिस्तानी विमानों को मार गिराने का आदेश दिया गया. कलाईकुंडा की तरफ तेज़ी से आते हुए अल्फ्रेड कूक ने महसूस किया की उनके विंगमैन और उनके बीच का फासला बढ़ता जा रहा था. शायद ममगैन थोड़े नर्वस हो गए थे…वो सिर्फ दो थे…दुश्मन चार. एक बात गौर करने की यहाँ पर ये है की हमारी सेनाओं के अफसर और जवान भी साधारण मनुष्य ही है…उनके भी परिवार हैं…बच्चे हैं…मौत का भय उन्हें भी होता है. मगर उच्च स्तर की ट्रेनिंग और अनुशाशन से वो उस भय को दबा कर अपना फ़र्ज़ निभाने की हिम्मत जागते हैं. कूक ने ममगैन को उसी ट्रेनिंग और अनुशाशन की दुहाई देते हुए बहुत ही साफ़ शब्दों में कहा की उनके ‘घर’ पर हमला हो रहा है…इस हमले को रोकना और हमलावर को मुंहतोड़ जवाब देना उनका फ़र्ज़ है. ममगैन अपने साथी की बातें सुनकर वापस जोश में आ गए.

जब ये दोनों विमान कलाईकुंडा पहुंचे तो इन्होंने देखा की पाकिस्तानी जेट आराम से ‘रेस-कोर्स’ सर्किट में बमबारी कर रहे थे. रेस-कोर्स सर्किट का मतलब वो एक सीधी रेखा में एयरबेस के ऊपर से गुजरते फिर बाएं मुड़ कर वापस जाते,  दो और बाएं मोड़ लेकर वापस एयरबेस के ऊपर…मानो प्रैक्टिस कर रहे हों.

रेस-कोर्स

कुक और ममगैन ने पहुँचते  ही इस सर्किट को तोडा. अपने अपने शिकार पहचान कर ये उसके पीछे लग गए.  उन दिनों बहुत ही कम विमानों में मिसाइल की सुविधा होती थी. आजकल के विमान में गाइडेड मिसाइल होते हैं…राडार लॉक करके फायर कर दीजिये और भूल जाइये…नहीं तो हीट-सीकिंग यानी इंजन की गर्मी की तरफ आकर्षित होने वाले मिसाइल. उन दिनों कम से कम भारत के पास ऐसा कोई लड़ाकू जहाज़ नहीं था जो मिसाइल के जा सके. हंटर जैसे विमान अपने खतरनाक मशीन गन का इस्तेमाल करके दुश्मन का खात्मा करते थे. उन दिनों असली डॉग-फाइट होती थी…आपको दुश्मन के पीछे जाकर, उसे अपनी गन-साइट की  रेंज में लाकर ट्रिगर दबाना होता था.

यही काम अब दोनों भारतीय पायलट करने में लगे हुए थे. अल्फ्रेड कुक का हंटर विमान एक सेबर जेट के साथ बहुत ही कम ऊँचाई पर एक बेहद तीखे मोड़ वाली लड़ाई में लगा हुआ था. उनके विमान ज़मीन से सौ फ़ीट से कम की ऊँचाई पर एक ‘टर्निंग’ डॉग फाइट में एंगेज्ड थे.

पाकिस्तानी सेबर जेट

हंटर और सेबर जेट लगभग बराबर की क्षमता  के विमान थे. अल्फ्रेड कुक ने सेबर जेट के रेंज में आते ही ट्रिगर दबाया. उनके एडेन थर्टी एम्-एम् कैनन से गोलियां निकल कर सेबर जेट से जा टकराई. परंतु सेबर जेट को कोई नुक्सान नहीं हुआ. अल्फ्रेड कुक को थोड़ा विस्मय हुआ…असल में उनके विमान में नार्मल मशीन गन अम्मुनिशन की जगह गलती से प्रैक्टिस अम्मुनिशन लोड कर दिया गया था. अल्फ्रेड कुक अपने दुश्मन के और पास गए…इतने पास की उन्हें पाकिस्तानी पायलट का हेलमेट और चेहरा दिखने लगा था…उन्होंने फिर ट्रिगर दबाया…इस बार दूरी इतनी कम थी की प्रैक्टिस अम्मुनिशन ने भी उस सेबर जेट के पंखों के परखच्चे उड़ा दिए. ज़मीन से इतनी कम ऊँचाई पर हो रहे इस हवाई युद्ध के पराजित योद्धा को कोई मौका नहीं मिला अपने विमान से ‘इजेक्ट’ होने का…आग की लपटों में घिरा वो सेबर तुर्रत ही ज़मीन से टकरा कर नष्ट हो गया…अफ़ज़ल खान नाम के उस पाकिस्तानी पायलट ने अपने मुल्क के लिए सबसे बड़ी शहादत दे दी. पहले शिकार को निपटा कर कुक एक और सेबर के पीछे लगे और उसको भी उन्होंने अचूक निशानेबाज़ी करते हुए उस सेबर को भी काफी नुक्सान पहुँचाया…वो सेबर लड़ाई छोड़ कर वापस पूर्वी पाकिस्तान की सीमा की तरफ निकल पड़ा…बाद में पता चला की वो पूर्वी  पाकिस्तान की सीमा के अंदर क्रैश कर गया था.
दो दो सेबर निपटा कर कुक अब इस हवाई युद्ध से निकल सकते थे…उनकी गोलियां भी ख़तम हो चुकी थी. मगर उन्होंने एक सच्चे विंगमैन की तरह अपने साथी की मदद करने का निश्चय किया. ममगैन एक सेबर के पीछे लगे थे…मगर उनके ठीक पीछे एक दूसरा सेबर लगा था. अल्फ्रेड ने तुर्रन्त उस सेबर का पीछे अपने विमान को लगा दिया…अब उस सेबर को तो नहीं पता था की कुक के विमान में गोलियां नहीं थी…अपने ठीक पीछे हंटर को पाकर उस सेबर ने ममगैन का पीछा छोड़ दिया और वापस पूर्वी पाकिस्तान की तरफ भाग निकल. ममगैन ने फिर अपने शिकार को बिना कोई मौका दिए भून कर रख दिया.

इधर कलाईकुंडा एयरबेस के अफसर और टेक्निकल स्टाफ इस लड़ाई का लाइव टेलीकास्ट देख रहे थे…चारो पाकिस्तानी विमानों की दुर्दशा होते देख उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. भारत के शूरवीरों ने अपनी वीरता और कौशल से दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए थे.
सन्दर्भ – ‘दी हिमालयन ईगल’, एयर मार्शल भरत कुमार.
जय हिन्द.

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