असली कीमत

martyrs-day

रामचंदर बाबु ने गमछे से अपना माथा पोंछा. उम्मस भरी गर्मी में सफर करना आसान नहीं होता.  नाव में तो कहीं छाया का भी इंतज़ाम नहीं हो सकता था. बस गंगा जी के ऊपर बहने वाली थोड़ी ठंडी बयार से हल्का सुकून मिल रहा था. उनकी नाव अब मंझधार में थी. बिसुनपुर दियारा से पटना शहर के महेन्द्रू घाट पहुँचने में करीब चालीस मिनट लगते थे. आज सुबह सुबह ही रामचंदर बाबु अपने गांव से निकले थे…पटना में ‘बैंक’ का काम था.
नाव में  और यात्री भी थे…ज्यादातर वही लोग जिनको पटना में कोई ऑफिसियल काम था. कुछ किसान भी थे जो अपनी पैदावार पटना बेचने ले जा रहे थे.
सामने रखी दौड़ी में ताज़ा खीरा और ककड़ी देख कर रामचंदर बाबु को थोड़ा लालच आ  गया. दौड़ी के मालिक को वो निजी तौर पर जानते भी थे.
‘क्या जी अमरेश…बहुत बढ़िया लग रहा है ककड़ी  तुम्हारा…क्या भाव दे रहे हो’
‘रामचंदर बाबु…आपसे हम क्या मोल-भाव करेंगे…ये लीजिये सबसे बढ़िया वाला है…नमक लेकिन नहीं होगा मेरे पास’
अमरेश ने रामचंदर बाबु की तरफ एक चटक हरा   ककड़ी  बढ़ाते हुए कहा. उसका परिवार रामचंदर बाबु को बहुत दिनों से जानता था. जब वो ऑक्ट्रॉय ऑफिस में कार्यरत थे. उन्होंने कभी किसी व्यपारी अथवा किसान से एक पैसा रिश्वत का नहीं लिया था…चाहे वो कितना ही मोटा या पतला असामी क्यों न हो. एकदम पक्का और फटाफट काम करते थे.
‘नहीं अमरेश…ऐसे थोड़े ही…ये लो दो रूपया का सिक्का’
रामचंदर बाबु ने अमरेश से ककड़ी ली…सच में, तेज़ धुप में ठंडी ककड़ी चबाने का एहसास लिख के नहीं बताया जा सकता.
रामचंदर बाबु महेन्द्रू घाट से सीधे जी-पी-ओ के लिए रिक्शा पकडे. रामचंदर बाबु ने यहाँ कुछ किसान विकास पत्र खुलवा रखे थे. बड़े बेटे विजयशंकर की लाइफ इन्शुरन्स से पांच लाख रुपये मिले थे…फ़ौज के हर सिपाही का जीवन बीमा होता है…सरकार प्रीमियम भरती है. पांच साल पहले कश्मीर  में विजयशंकर ने अपने जान की बाजी लगा कर अपने पूरे आर्मी कैंप को आतंकवादी हमले से बचा लिया था. अपनी आखरी सांस तक उसने आतंकवादियों को कैंप के चेक-पॉइंट पर ही रोके रखा…जब तक बाकि के गार्ड्स ने आकर उन तीनो फिदायीन आतंकवादियों को क्रॉस-फायर में भूंज के ना रख दिया.
बेटे के इस बलिदान के बदौलत उसे सरकार ने शौर्य चक्र से सम्मानित भी किया था. गांव में भी एक छोटी सी प्रतिमा लगवा दी गयी थी.
रामचंदर बाबु का रिक्शा जब गाँधी मैदान के पास बने कारगिल शहीद स्मारक के पास से गुजरा तो ज़मीन में धंसी राइफल और उसपे टिके मिल्ट्री हेलमेट को देखकर उनकी आँखें नम हो गयी. सबसे बड़ा बेटा…सबसे होनहार…बस पढाई में थोड़ा हल्का…मगर खेल-कूद और फिजिकल फिटनेस में सबसे अव्वल…उनसे सबसे ज्यादा मार भी उसी ने खाई थी. जिस दिन दानापुर कैंट से रिक्रूटमेंट लेटर लेकर वापस आया था, रामचंदर बाबु का सीना दस इंच चौड़ा हो गया था.. परिवार से कोई पहला था जो फ़ौज में जा रहा था…बाकि लोग या तो खेती-बारी नहीं तो छोटी मोटी  सरकारी नौकरी से ही संतुष्ट थे. कुछ ने तो विरोध भी किया था. मगर बेटे का उत्साह देखकर रामचंदर बाबु उसे रोक नहीं पाए. जब घर आता उनके लिए महंगी वाली शराब लेकर आता.
‘टैक्स फ्री है बाबूजी…ज्यादे स्वाद आएगा इसका…बिना सोडा-पानी के’
रामचंदर बाबु वैसे तो ज्यादा पीते नहीं थे…कभी कभी सर्दियों में एक आध गिलास मार लेते थे. उसके सभी दोस्त लोग उसके आने की बात जोहते रहते. किसी को ‘भी-आई-पी’ का बड़का वाला अटैची  लेना रहता..कोई साल भर का साबुन तेल का लिस्ट बना कर रखता…ये लोग फिर दानापुर कैंट का एक चक्कर ज़रूर लगवाते उसे. फिर हर घर में रात के खाने का न्योता…किसी के यहाँ भात -मटन…किसी के यहाँ ‘कॉन्टेसा’ के साथ मछली फ्राई.
उसकी शादी की बात लगभग तय हो ही गयी थी…फिर उस रात…मंटुआ घर पर आया…वो गांव का एक मात्र एस-टी-डी बूथ चलाता था.
‘चच्चा…आपके लिए फ़ोन आया हुआ है’
‘किसका है? विजय किया है क्या? इतना रात में तो कभी नहीं करता है?’
‘नहीं चच्चा…कोई और है…मदरासी जैसा बात कर रहा है’
रामचंदर बाबु को अजीब सी बेचैनी महसूस हुई. विजय का कंपनी कमांडर मेजर कन्नन, तमिल नाडु से था. मंटुआ के पीछे पीछे वो उसकी दूकान पर पहुंचे. कांपते हुए हाथों से उन्होंने फ़ोन उठाया. मंटू ने कुर्सी लगा दी.
‘जी हम विजयशंकर के फादर बोल रहे हैं…सब ठीक तो है ना’
मेजर कन्नन ने उन्हें धीरे धीरे पूरी जानकारी दी…कैंप पर हुए हमले के बारे में…बताया की कितनी बहादुरी से विजय शंकर अकेले तीन तीन आतंकवादियों को गेट के बाहर रोके रखा…ज़ख़्मी हुआ…सीने में गोली लगी थी…मगर उसने अपने मशीन गन से गोलियों की बौछार रुकने नहीं दी. फिर एक आतंकवादी ने राकेट वाला ग्रेनेड दाग दिया उसके बंकर पे. मेजर कन्नन इतना कहकर चुप हो गए.
रामचंदर बाबु का ह्रदय उनके सीने के अंदर धंसता चला जा रहा था. उन्होंने किसी तरह हिम्मत करके फिर से पुछा…’वो ठीक तो है ना’
मेजर कन्नन ने भरे गले से कहा,
‘जी उसने आज फ़ौज की  सर्वोच्च  परंपरा का पालन करते हुए अपने साथियों की प्राण  की रक्षा के लिए अपने प्राण का बलिदान दिया है…पूरे बिहार रेजिमेंट को आपके बेटे पर गर्व है.’
रामचंदर बाबु के हाथ से फ़ोन छूट गया. आँख से झर-झर आंसू बहने लगे.
पांच साल पहले घाटी इस घटना को याद करके रामचंदर बाबु का मन उदास हो गया.

इधर रिक्शा धीरे धीरे हिलता डुलता जी-पी-ओ पहुंचा.पूछते -पाछते वो उस काउंटर पर पहुंचे जहाँ किसान विकास पत्र का भुगतान होता था. क्लर्क अपने कंप्यूटर पर पता नहीं क्या कर रहा था. पांच मिनट तक चुप चाप खड़े रहने के बाद रामचंदर बाबु का धैर्य  टूट गया,
‘ऐसा कौन ज़रूरी काम कर रहे हो की सामने खड़ा कस्टमर नहीं दिख रहा है तुमको’
क्लर्क बाबु की आँखें स्क्रीन से हटकर रामचंदर बाबु की आँखों से मिली. उन आँखों में सेवा की भावना तो दूर, अभी सिर्फ नाराज़गी छाई हुई थी.
‘बोलिये…क्या बात है?’
‘मेरा किसान विकास पत्र अकाउंट है यहाँ. उसमे से कुछ पैसा निकलना था’
‘अच्छा…अकाउंट नंबर बताइये’
अकाउंट नंबर लेकर सारे डिटेल्स देखने के बाद क्लर्क बाबु ने रामचंदर बाबु को काउंटर के पीछे आने का इशारा किया.
रामचंदर बाबु पीछे गए…फाइलों से घिरे एक छोटे से टेबल पर आमने सामने दोनों बैठ गए.
‘कितना निकलवाना है आपको’
‘अभी तो पचास हज़ार’
‘कर तो हम देंगे…मगर  हम कैसे मान ले की आप जो बोल रहे हैं, वो हैं? आप ही का अकाउंट है, ?’
‘कागज़ दिखाए न आपको हम…पहचान पत्र भी दिखाए’
‘वो सब ठीक है…मगर हम कैसे मान लें पहचान पत्र आप ही का है?’
रामचंदर बाबु को धीरे धीरे समझ में आने लगा इशारा किस ओर था.
‘तब कैसे मानियेगा? किसका सर्टिफिकेट आपको मान्य है?’
‘देखिये…इतना बड़ा, गुलाबी रंग का पहचान पत्र आता है…उसपर गाँधी जी की तस्वीर होती है…वैसा पांच  पहचान पत्र का इंतज़ाम कर दीजिये…हम एक घंटे में आपको चेक काट के दे देंगे’
रामचंदर बाबु जल्दी गुस्साते नहीं थे. बहुत कुछ देखे हुए थे अपने लंबे जीवन में.
‘देखो..हम भी सरकारी नौकरी में ही थे…बड़ा बाबु होकर रिटायर हुए…मगर कभी इस तरह का गलत काम नहीं किये की किसी ज़रूरतमंद आदमी का फायदा उठायें’
‘तभी तो आपका ये हालत है…पचास हज़ार रूपया के लिए इतना परेशां हो  रहे हैं…हमको ज्यादे ईमानदारी झाड़ के आपके जैसा नहीं बनना है’
रामचंदर बाबु ने सोचा…ठीक ही तो कह रहा है…अगर दो-नंबर का काम करते तो पचास हज़ार के लिए किसान विकास पत्र तो नहीं तुड़वाते फिरते.
क्लर्क बाबु ने इस बार मुस्कुराते हुए कहा,
‘देखिये चचा, आपको सर्विस चाहिए तो उसका कीमत भी तो अदा करना पड़ेगा न. ‘
‘बाबु, जो कीमत हम अदा कर चुके हैं उससे ज्यादा अब क्या दे सकते हैं…बड़ा बेटा शहीद हुआ था कश्मीर में…उसी के बीमा का पैसा से ये किसान पत्र अकाउंट खोले थे…अब उसमे से पैसा निकलने के लिए भी कीमत चुकाना पड़ेगा, ये कभी नहीं सोचे थे’
‘चचा, इतना भारी भारी डायलॉग मारिएगा तो कैसे होगा…आपका बेटा कश्मीर में शहीद हुआ तो उससे हमको क्या मतलब?…हमको क्या मिला? हम तो आज तक कश्मीर गए भी नहीं हैं….इतना इमोशनल मत होइए…प्रैक्टिकल बात कीजिये’
रामचंदर बाबु को समझ नहीं आया वो क्या जवाब दें.
क्लर्क, श्री अमर कुमार ने अपनी बात आगे बढ़ायी,
‘अच्छा, आप गाँधी जी वाला पहचान पत्र छोड़िये…आपको तो अभी भी कैंटीन में खरीदारी करने  देता होगा…दो बोतल ‘रॉयल स्टैग’ ले आइये…आपका काम हो जायेगा.आप तो जानते ही हैं, जब से शराब-बंदी हुआ है कितना मुश्किल हो गया है…लीजिये हज़ार से कम में आपका काम हो गया’

‘माने बिना कुछ लिए दिए हमारा काम नहीं होगा?’
‘देखिये चचा, ये सब काम में बहुत अड़चन आ सकता है…हम चाहे तो कुछ भी बोल के आपको टरका सकते हैं…सिस्टम डाउन है…आपका अकाउंट में कुछ गलती निकल के उसको फ्रीज़ कर सकते हैं…अब आप चाहते की वो सब हमसे ना हो, तो आपको भी तो कुछ करना पड़ेगा’
रामचंदर बाबु समझ गए की और बहस करने से कोई फायदा नहीं…एक कैंटीन तो सी-एस-डी ऑफिस में भी था…वहां से दो-तीन किलोमीटर दूर. एक घंटे में वापस आ जायेंगे.
रामचंदर बाबु निकल पड़े. कैंटीन में सामान लेकर पेमेंट कर ही रहे थे की पीछे से किसी ने टोका,
‘प्रणाम चच्चा…आप यहाँ?’
अरे, ये तो मनोज है…विजय के साथ ये भी बिहार रेजिमेंट की एक ही बटालियन में था. दोनों में गाढ़ी दोस्ती थी..उसका गांव बगल वाले ज़िले में पड़ता था.
‘ऐसे ही थोड़ा काम था…तुम ठीक हो…परिवार में सब खुश? छुट्टी पर आये हो?’
‘नहीं चचा…ऑफिसियल छुट्टी नहीं है…ट्रेनिंग पर आये हुए हैं…आप कुछ परेशां दिख रहे हैं…कुछ  बात है क्या?’
रामचंदर बाबु अपने अंदर दबी दुःख और क्रोध की भावना पर अब और नियंत्रण नहीं रख सकते थे. उन्होंने सारी बात मनोज को बताई. सुनते हुए मनोज की मुट्ठी कसती चली गयी.
‘चचा, आपको हम अपने मोटरसाइकिल पर वापस छोड़ आते हैं…हमको भी थोड़ा काम है जी-पी-ओ में’
रामचंदर बाबु और मनोज दोनों वापस जी-पी-ओ पहुंचे. रामचंदर बाबु ने मनोज से प्रार्थना की थी की वो कहीं गुस्से में कोई झगड़ा न मोल ले ले. इसलिए मनोज ने रामचंदर बाबु को अपना काम निपटाने दिया और उनके जाने के बाद उसने आकर किसान विकास पत्र वाले काउंटर पर बैठे श्री अमर कुमार की तस्वीर अपने फ़ोन में उतार ली. फिर मनोज ने कुछ फ़ोन कॉल किये और वापस अपने कैंप चला गया.
साढ़े चार बजे श्री अमर कुमार अपनी कुर्सी से हिले…नीचे, काले प्लास्टिक बैग में रखे दोनों बोतलों को  अपने बैग में अंदर छुपा कर रखा. फिरस्टेशन के सामने से ऑटो पकड़ने के लिए पैदल निकल पड़े. जैसे ही वो मैन-गेट से बाहर आये…पास खड़ी एक सफ़ेद वैन का इंजन चालू हो गया. धीरे धीरे वो वैन सरकती हुई श्री अमर कुमार के बराबर आ गयी…रुकी…एक आदमी ने अपना सर बाहर निकाला,
‘ये एड्रेस बता देंगे क्या?’
अमर बाबु आगे आये…एड्रेस पता नहीं किस भाषा में लिखा था…तभी पीछे का स्लाइडिंग डोर खुला…दो मजबूत हाथों ने अमर बाबु की पतली सी कलाई को पकड़ा और एक ही झटके में वैन के अंदर खींच लिया.
‘अरे…कौन…क्या कर रहे हो….अरे छोड़ो’
अमर बाबु ने थोड़ा विरोध किया…तभी उनकी नाक पर किसी ने एक रुमाल डाल दिया और कुछ सेकंड में ही वो नींद की दुनिया में खो गए.
बड़ा मीठा सा सपना देख रहे थे की तभी उन्हें लगा की कोई उनके चेहरे पर पानी छिडक रहा था. उनकी आँखें खुली…बंद कमरा…वो ज़मीन पे पड़े थे…दोनों हाँथ बहुत टाइट से बाँधा हुआ था. कोने में एक ‘जीरो’ वाट का बल्ब जल रहा था. उसी की रौशनी में अमर बाबु ने आसपास का जायजा लिया. तीन और लोग थे उनके साथ…बाकि तीनो के सर पे काले कपडे का बैग था. सबके हाथ बंधे हुए.
‘कहाँ फँस गए भगवान’
उन्होंने थोड़ा हिम्मत करके आवाज निकली,
‘देखिये आपको लगता कुछ मिस्टेक हो गया…हम कोई मारवाड़ी या डॉक्टर नहीं है की आप हमको किडनैप कर लिए…हम तो मामूली क्लर्क हैं सर’
उनकी आवाज सुनकर कोई उस कमरे में आया…लंबा कद…साधारण कपडे…मगर चेहरा कपडे में छुपा रखा था…और कंधे पर ए-के- 47 .
लंबा आदमी झुक कर अमर बाबु के बराबर आया,

‘हम कैसे मान ले तुम  जो बोल रहा है, वो है? हमारे हिसाब से तो तुम इस राज्य के होम-मिनिस्टर का साला है.’
‘नहीं सर, आपको बहुत बड़ा गलतफहमी हुआ है. हमारा कोई जीजा मिनिस्टर नहीं है…हमारा तो कोई जीजा भी नहीं है…सबसे बड़ा भाई हम है और हमारा तो अभी शादी भी नहीं हुआ है’
लंबे आदमी ने खींच के एक झापड़ मारा अमर कुमार की कनपट्टी पे. आठवी कक्षा में संस्कृति से महा-पंडित श्री दामोदर पांडे की हाथों से खाये थप्पड़ के बाद अमर बाबु ने आज पहला थप्पड़ खाया था. कान झन्ना गया उनका…
‘साला, इतना ज़ोर से कोई थप्पड़ भी मार सकता है?’
इसके पहेल की वो संभल पाते, लंबे आदमी ने ए-के-47 की ठंडी नाल अमर बाबु की गर्दन पर रख दी.

‘एक लफ्ज़ और बोले तो हम नहीं, हमारा बन्दूक जवाब देगा तुमको…तुमको हमलोग पैसा के लिए नहीं लाये हैं…हमारा काम है इस देश की जनता के मन में खौफ डालना…मौत का खौफ…तबाही का खौफ…और उस काम में हम तुम्हारा इस्तेमाल करेंगे…अब चुप चाप बैठे रहो यहाँ ‘
लंबा आदमी वापस चला गया. दुसरे कमरे में और भी लोग थे. अमर बाबु ने नोटिस किया की दीवार काफी पतली थी और वो उस तरफ चल रही बातें सुन सकते थे,
‘हर घंटे एक को मारते जाओ…लाइव स्ट्रीमिंग के साथ’
‘शुरुआत उस मिनिस्टर के साले से करते हैं…सुवर की तरह गर्दन काट के टांग देंगे उसकी…अच्छी पब्लिसिटी मिलेगी’
‘हाँ पहले उसी का नंबर है’
इधर अमर बाबु की घिग्गी बांध गयी…पहले उन्ही का नंबर था. टी-वी पर आने का और मशहूर होने की दिली तमन्ना तो थी उन्हें…मगर इस तरह नहीं.
बचपन से लेकर आज तक की सारी बातें याद आने लगी उन्हें. कुछ आंसुओं  की बूँदें न जाने कब आँखों से निकल कर गालों पर ठहरी हुई थी. अमर बाबु ने आज हुई बातों को भी याद किया…उन्होंने एक शहीद जवान के पिता से रिश्वत मांगी थी…एक शहीद की शहादत को व्यर्थ बताया था. शायद उसी का…
लंबा आदमी वापस आया…साथ में दो लोग और थे…उन्होंने एक कॅमेरा फिट किया…एक आदमी चमड़े के बेल्ट पर एक बड़ा सा चाक़ू ‘पजा’ (तेज़ करना) रहा था. अमर बाबु हाथ जोड़े बैठे हुए थे. तभी अचानक ज़ोर का धमाका हुआ…किसी ने शायद बगल वाले कमरे का दरवाज़ा तोड़ दिया था…फिर कैमरा फ़्लैश से भी तेज़ रौशनी की चमक आयी…
असली गोली चलने की आवाज बॉलीवुड सिनेमा में दिखाए जाने वाले ‘डीचक्यों-डीचक्यों ‘ से बहुत अलग होती है…दुसरे वाले कमरे में लगा जैसे कोई सोडे की बोतल खोल रहा हो…’पॉप’…’पॉप’…दो भारी शरीरों के ज़मीन पर गिरने की आवाज.
इधर इस कमरे में बाकी तीनो बंदूकधारियों ने अलग अलग पोजिशन ली हुई थी और उनकी बंदूकें अंदर आने वाले एकमात्र रास्ते पर टिकी हुई थी . दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं आ रही थी. तभी कुछ गोल सा लुढ़कता हुआ उस कमरे के बीच में आकर रुक गया…चट्ट…मिर्ची-बम की आवाज के साथ फटा और एक अत्यंत ही तीव्र प्रकाश में पूरा कमरा नहा गया…अमर बाबु की आँखें तो बंद थी, फिर भी वो चमक इतनी तेज़ थी की कुछ सेकंड के लिए उनकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया. अचानक कुछ क़दमों की आहट हुई, फिर तीन  ए-के 47 एक साथ गरज उठे. करीब दस सेकंड तक तो उस छोटे से कमरे में भयंकर कोलाहल होता रहा…अमर बाबु तो साष्टांग ज़मीन पर लेट गए थे…उन्होंने लेते लेते ही ज़मीन पर कुछ और लोगों को गिरते हुए महसूस किया था.
दस सेकंड बाद सब कुछ शांत हो गया. अमर बाबु ने अपना सर अपने हाथों के बीच से निकाला…सामने कोई लेटा था…सर पे काला बैग…नहीं काले बैग वाले तो वहां कोने में दुबके हुए हैं…बाकी तीन बंदूकधारी भी अपने अपने जगह पर गिरे हुए थे….फिर ये कौन है…
अमर बाबु को याद आया…इंडियन आर्मी के कमांडो भी काले कपडे और सर पे काला कपडा लपेट कर मिशन पर जाते हैं. अमर बाबु से दो फ़ीट दूर, ज़मीन पर स्थिर पड़ा वो शरीर भी किसी कमांडो का ही था. तभी उस कमांडो के सर के नीचे से एक पतली सी खून की धारा बह कर  अमर बाबु की तरफ आने लगती है. अमर बाबु सिहर जाते हैं…उनके प्राणों की रक्षा के  लिए किसी के बेटे…किसी के भाई…किसी के पति…किसी के दोस्त ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे. वो उसके पावन रक्त को अपने कृतघ्न और निर्लज्ज शरीर से स्पर्श नहीं पाने देंगे.अमर बाबु किसी तरह सरक सरक कर दीवार की तरफ गए.
उन्होंने देखा अब कमरे में और भी लोग आ रहे थे. एक ने अमर बाबु को सहारा देकर उठाया.
‘आप ठीक हो?’ उस जवान ने अमर बाबु से पूछा.
‘हाँ सर , अब बिलकुल ठीक हैं…वो अंदर में जो गिरे हुए हैं उनको देखो आप’
‘उनको दुसरे लोग देख लेंगे…आप आओ बाहर’
कोठरी के बाहर आते ही उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा…वो एक परेड ग्राउंड के बीच में खड़े थे…मैदान के छोर पर बहुत सारे सैन्य अधिकारी बैठे थे.
‘ये क्या है सब?’ अमर बाबु सकपका के पूछे.
तभी कोठरी के अंदर से निकले लांस नायक मनोज यादव…वही जो कुछ देर पहले अमर बाबु के सामने गिरे हुए थे.
‘अमर कुमार…आप आज इंडियन आर्मी की बिहार रेजिमेंट के घातक प्लाटून द्वारा आयोजित इस एंटी-टेररिस्ट ट्रेनिंग का एक हिस्सा थे…आपने आज एक शहीद जवान के पिता से पूछा था की उसकी शहादत से आपको क्या मिला? आपने इस देश की फ़ौज पर सवाल खड़ा किया था…क्या आपको जवाब मिला? आपके आंसू देखकर तो लगता है की शायद मिल गया’
अमर बाबु ग्लानि और लज्जा की भावना में डूबे हुए थे. उन्होंने अपने आप को संभाल और मनोज को सलूट करते हुए बोले,
‘सर जब तक खुद पे नहीं बीतती है, तब तक बहुत लोगों को समझ नहीं आता…आप लोग बॉर्डर पर लड़ते हो…हम यहाँ शहरों में अपना ज़िन्दगी जीते हैं…कभी ये नहीं सोचे की आप लोग वहां सर्दी गर्मी बरसात में खड़े हो…जान की बाजी लगाकर…ताकि हम अपने ऑफिस में बैठ कर आराम से दिन भर स्टॉक ट्रेडिंग कर सकें…बहुत बार जो चीज़ें आदमी खुद से देखता या महसूस नहीं करता है, तब तक उसे वैल्यू समझ नहीं आती…आज आपने मुझे अपनी ट्रेनिंग का हिस्सा बनाकर ये दिखा दिया की आपका काम कितना खतरनाक है…कैसे आप बाकि देशवासियों के लिए बिना सोचे, अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हो’
‘ठीक है अमर बाबु…अब इतना भारी भारी डायलॉग बोलियेगा तो कैसे चलेगा. वैसे जान के साथ साथ थोड़ा पैसा भी दांव पर लगाना चाहते हैं…स्टॉक ट्रेडिंग का कुछ टिप्स ज़रूर आपसे जानना चाहेंगे’
मनोज ने माहौल हल्का करने के लिए कहा. अमर बाबु के चेहरे पर फाइनली एक छोटी सी मुस्कान आ गयी. आज उन्हें पता चला था की उनके एक नार्मल रूटीन लाइफ जीने की एक बड़ी कीमत थी…वो असली कीमत जो हमारे तीनो सेनाओं और पैरामिल्ट्री फोर्सेज  के जवान और अफसर अपनी बहादुरी और निष्ठां से अदा करते हैं.

-Jai Hind

 

 

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