इनफ़ोसिस कैंपस अगर पटना में होता

इनफ़ोसिस कैंपस अगर पटना में होता:

स्थान – कंकरबाग, पंच मंदिर.
समय- सुबह सात बजे.

कुछ लोग शर्ट पैंट टाई पहन के, कन्धा पे झोला टांगले बाकि स्कूल के बच्चा के साथ खड़े हैं. बचवा लोग अपना गप्प में मस्त है…इधर एक हीरो का ऑनसाइट कॉल शुरू हो चूका है. वो अपना ब्लूटूथ वाला झुमका निकाल के लगा लेता है और अंग्रेजी में चालू हो जाता है.
‘यस श्रीनि…आई हव आलरेडी सेंट एस्टीमेट फॉर आवर डेवलपमेंट एंड टेस्टिंग एफर्ट….’
बाकी लोग थोड़े इम्प्रेस्सेड अथवा थोड़े अन्नस वाले भाव से उसको घूरते रहेंगे.
कुछ लोग ये सोचते हुए, ‘वाह क्या अंग्रेजी बोल रहा है दना-दन…काश हम भी ऐसा अंग्रेजी झाड़ पाते’
कुछ लोग, ‘ढेर अंग्रेजी पेल रहा है पब्लिक में…कभी अकेले भेंटएगा तो सब अंग्रेजी भुला देंगे’
तभी भोरे भोरे मंदिर में माथा टेकने आई एक नव-युवती को देखते ही हमारे ऑफ-शोर लीड का बोलने का वॉल्यूम तेज़ हो जाता है…
‘सॉरी टू इंटरप्ट, दिस इस विशाल फ्रॉम पटना….अगेन…जस्ट वांटेड टू थैंक ऑनसाइट टीम फॉर देयर सपोर्ट’
अब भाई इतना अंग्रेजी आता है तो बाकी अच्छे लोगों को भी ये पता चलना चाहिए…और उसी बहाने अगर आपका नाम भी तो मशहूर हो गया.
उधर बाकि लोग अपने अपने फ़ोन का वॉल्यूम कंट्रोल खोजने लगते हैं.
छोटे बच्चे अपना मस्त हैं…मगर ये बड़े बच्चे बार बार उचक उचक कर अपने बस की झलक पाने के लिए बेक़रार हैं.
बस आती है…बच्चे भागते हैं…विशाल बाबू फिर आगे आकर सिचुएशन को सँभालते हैं…
‘अरे तुम लोग कहाँ घुस रहा है…ये इनफ़ोसिस का बस है…जाओ वापस खड़ा हो जाओ’
सारे बड़े बच्चे इनफ़ोसिस के बस में बैठ जाते हैं. बस हनुमान नगर की तरफ बढ़ती है….तभी बस में प्याज की तेज़ गंध फैल जाती है…धत्त आज फिर प्रशांतवा अंकुराया मूंग का नाश्ता लाया है…कटा हुआ प्याज और मिर्च मिक्स करके.
बस धीरे धीरे सरकते हुए बाईपास पकड़ती है और कुछ समय बाद इनफ़ोसिस कैंपस में एंटर करती है.
लोग उतर कर अंदर जाने लगते हैं…तभी चील जैसे आँखों वाले गार्ड विशाल को रोकते हैं,
‘सर आप फॉर्मल शूज़ नहीं पहने हुए हैं…सैंडल इज़ नॉट आल्लौद…दो सौ रूपया फाइन…अपना एम्प्लोयी आइडी बताइए’
‘कहाँ रहते हैं आप मंडल जी?’
‘हम तो पोस्टल पार्क में हैं सर’
‘तब तो आपके यहाँ सब सूखा सूखा होगा…हम हाउसिंग कॉलोनी में रहते हैं…घुटना भर पानी में हेल कर आये हैं…और आपको शूज़-सैंडल का पड़ा हुआ है’
‘ठीक है सर जाइये’

सब लोग ‘स्वाइप-इन’ करके अंदर आते हैं. कैंपस में ही बहुत सारे फ़ूड-कोर्ट हैं….कहीं कचौरी और आलू-चना का सब्ज़ी…कहीं ब्रेड-ऑमलेट,….कहीं सत्तू का गिलास…और लास्ट में एक पान का गुमटी भी है. लोग खा पी कर वापस अपने अपने सीट पर जा रहे हैं,
‘सर…सर…प्लीज़ पान थूक के अंदर जाइये’
‘अरे, अभिये तो खाये हैं जी…डोंट वरि, बहार ही आके थूकेंगे’
‘नहीं सर…फैसिलिटी वाला से आर्डर आया हुआ है…आप लोग टॉयलेट का बेसिन और इहाँ तक की कमोड भी घिना के रख देते हैं पान थूक थूक कर…प्लीज़ थूक के अंदर जाइये’
‘अच्छा भाई…तुम तो टेंशन ले लिए…लो थूक दिया’
काम शुरू होता है…एगारह बजते बजते लोग कैफेटेरिया में जमा होने लगते हैं…कंपनी द्वारा सप्लाई की गयी फ्री कॉफ़ी पीने के लिए. कुछ पुराने लोग कम्प्लेन करते…
‘यार ये क्या कप्पूचीनो और एस्प्रेसो का मशीन लगाए हुए है…इतना कड़वा कॉफ़ी में पांच पांच पैकेट चीनी मिलाना पड़ता है…फ्री में डायबिटीज हो जायेगा…इससे अच्छा तो एगो सॉसपैन , दूध और चाय-पत्ती रख देता. हम लोग अपने बना के पी लेते. ‘
फिर माइक्रोवेव पर कुछ लोगों का पारा हाई हो जाता…
‘माइक्रोवेव में किसका सामान है…कौन छोड़ के चले गए हैं….कोई तरीका नहीं है यहाँ….’
‘मेरा सामान है’
‘ओह्ह निहारिका…हम पहचाने नहीं बॉक्स से….हैं हैं हैं ….क्या हाल है…वाह कितना अच्छा हलुआ लायी हो…हे हे हे ‘
‘हलुआ नहीं है’
‘जो भी है बहुत ही अच्छी खुशबू आ रही है’

मीटिंग रूम के लिए मारा- मारी
‘आप लोग का हो गया है क्या? हम ये रूम बुक किये हुए थे अभी से , एक घंटा के लिए’
‘नहीं हमारा नहीं हुआ है…कहीं और चले जाओ’
‘क्यों?’
‘चिह्न्ते नहीं हो हमको…इस ऑफिस के सीनियर मोस्ट मैनेजर के गोतिया हैं हम…जो बोल रहे हैं सो करो…जाके कहीं और मीटिंग कर लो…ज्यादे त्रिंग-ब्रिंग करोगे तो अगला प्रोजेक्ट सीधे त्रिवेंद्रम वाले कैंपस में दिलवा देंगे. फिर आते रहना छठ में चार चार ट्रेन बदल के ”

ऑफिस में पार्टी-
‘देख, उधर पिज़्ज़ा पार्टी हो रहा है…पता नहीं किस टीम का लोग है’
‘चलो न, सबको कंगरचुलेशन बोलते हुए घुसो और एक एक स्लाइस उठा के कटो…एक ठो पेपसिया भी उठा लेना’

सुट्टेबाज लोग अपने स्मोकिंग -जोन में धुआं उड़ाते हुए पॉलिटिक्स बतियाते रहेंगे…तभी बगल से भैंस का झुण्ड गुजरेगा.
‘फिर भैंस लाके छोड़ दिया है…ये अपने डी-सी हेड (सीनियर मोस्ट एम्प्लोयी ) का भी हेड ख़राब हो गया है?’
‘डी-सी हेड अप्प्रोव किये हैं भैंसी सब को?’
‘हाँ यार, उनका फंडा है की भैंसी सब आके घास चर लेता है तो लैंडस्केपिंग का कॉस्ट बच जाता है…जो गोबर करता है उससे खाद का काम हो जाता है और लास्ट में सबका दूध निकाल के सीनियर मैनेजमेंट के लिए रोज़ शाम को स्पेशल चाय’

अप्र्रैसल मीटिंग
‘देखो विशाल, तुम बहुत अच्छा परफॉर्म किये हो…बट तुम्हारा पोटेंशियल देखते हुए हम लोग तुमसे ज्यादा एक्सपेक्ट किये थे…तुमको थोड़ा अपने से भी इनिशिएटिव लेना चाहिए आगे से’
‘क्या रेटिंग दिए हो सर’
‘इस बार भी ‘स्ट्रांग कन्ट्रीबुटर’…हे हे हे.’
‘और रमेश को फिर से एक्सीलेंट?’
‘वो हम नहीं बता सकते हैं’
‘हम सब समझ रहे हैं…खूब कस्टिजम करिये आप लोग’
‘देखो, रमेश को ठीक से अंग्रेजी बोलने आता नहीं है…उसके बदले तुमको ऑनसाइट भेजने का डिसिशन हुआ है…तो ये बस थोड़ा बैलेंसिंग हुआ है’
‘सर आप यही ऑनसाइट का गाजर हर साल लटका देते हैं…हमारे पूरा फैमिली में हल्ला हो जाता है…अब तो सब चिढ़ाने भी लगा है की अभी तक यहीं हो?…इस बार नहीं भेजिएगा तो बगले में विप्रो का कैंपस बन रहा है…तड़प के चल जायेंगे के उ पट्टी’

टीम बिल्डिंग एक्सरसाइज-
‘धत, फिर से संजय गांधी जैविक उद्यान ले आया है टीम बिल्डिंग के नाम पर…कोई और जगह नहीं मिलता है ये लोग को?’
‘यार, बसवा में तो कम से कम सौ लोग को ठूंस के लाया था…यहाँ तो बीस भी नहीं है’
‘कुछ लोग झील में बोटिंग करने निकल गया है…कुछ लोग जानवर ताकने गया है…और कुछ लोग तो ‘विक्रम’ पकड़ के वापस घरे चला गया’

उम्मीद करते हैं नॉन-आई टी वालों को भी ये पीस पसंद आया हो. ये भी आशा करते हैं की सच में पटना में जल्दी ही कुछ बड़ी बड़ी इनफ़ोसिस जैसी कंपनी सब आ जाए.

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