मेरा गांव, मेरा क्रेज़

 
 
भारतवर्ष गावों का देश है…करीब पांच लाख गांव हैं यहाँ…उन्हीं में से एक है ‘धोबघट्टी-बाजितपुर’…हमारा गांव. पटना मुजजफ्फरपुर रोड के दोनों किनारे बसा ये गांव, पटना से करीब पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर है. एक तरफ हाईवे, दूसरी तरफ हाजीपुर- मुजजफ्फरपुर रेलवे लाइन. बहुत सारी खट्टी मीठी यादों की फसल बोई और काटी गयी है यहाँ…उन्हीं यादों की खलिहान में आज आपको लेकर चलता हूँ-
रोड-ट्रिप-
गांव जाना हमेशा ही एक मजेदार रोड ट्रिप होता था…हमारी वही प्यारी नीली मारुती में. उन दिनों गांधी सेतु के सारे के सारे ‘दांत’ सलामत थे (हाल में दो केंटिलीवर स्पैन तोड़ दिए गए हैं). यकीन मानिए दस मिनट के अंदर, इस पार से उस पार. मगर उसके बाद दो रेलवे क्रासिंग आते थे. आपकी किस्मत/ जतरा पे निर्भर करता था की दोनों खुली मिलेंगी अथवा दोनों गुमटी पर ट्रक के एग्जॉस्ट से निकलने वाला हानिकारक पर्रन्तु अत्यन्त ही ‘नशीला’ डीजल का धुआं फांकना पड़ेगा. एक फायदा होता था लेकिन गुमटी बंद मिलने का…छिमिया केला…रामदाना लाई…भूंजा इत्यादि के ‘सेल्स-मेन’ आपके गाड़ी के आसपास मंडराने लगते थे. किसी एक आइटम की खरीद आपने कर ली तो फिर बाकी लड़के भी आकर…’सर, एक ठो हमसे भी ले लीजिए न’. सब लगभग मेरी ही उम्र के लड़के…अपने गरीब माँ- बाप की मदद करते हुए.
फिर हाजीपुर जेल के पास एक छोटी सी दूकान में बड़े स्वादिस्ट ‘पेड़े’ मिलते थे. हलवाई का लगता है अपना ‘कंट्रोल’ का दूकान भी होगा…क्यूंकि जितनी चीनी वो उस पेड़े में डालता था, वो अगर एक सामान्य हलवाई डालेगा, तो दो दिन में दिवाला पिट जायेगा. उसके पेड़े खा कर जो ‘शुगर-हाई’ होता था हमें…हम भी कुछ समय के लिए ‘उड़ता बिहार’ बन जाते थे.
आजकल दोनों रेल क्रासिंग पर फ्लाई-ओवर का काम चल रहा है.
अब तो सारा ट्रैफिक ऊपर ही ऊपर निकल जायेगा.
गांव की ‘पार्टियां’- भोज-भात-
गांव सब में बुफे सिस्टम नहीं होता…अगर किसी ने कोशिश भी की होगी तो पक्का दो-तीन सर्वर सब पिटाया होगा और पब्लिक, डोंगा सहित खाना गायब कर दिया होगा. गांव में तो ज़मीन पर चादर बिछा के…केला के पत्ते पर अथवा ‘पत्तल’ के प्लेट पर भोज होता था…खाने की सामग्री को एक एक कर ‘चलाया’ जाता था. पहले कचौरी सब्जी…फिर चावल…लास्ट में मिठाई या चूड़ा- दही.
एक अनाउंसमेंट लेकिन लगभग हर भोज में सुनने को मिलता था…’आराम से खाइयेगा…घी आ रहा है’…मगर आप कितनो आराम से खाइये घी ‘चलाने’ वाला मनुष्य, आपसे ज्यादे आरामतलब था लगता है. शायद ही किसी भोज में घी असल में सर्व किया होगा टाइम पे.
खाना चलाने वाला लोग भी दनादन काम करते थे. हमको गांव के भोज में बनने वाला आलू-दम बहुत पसंद था. परन्तु उसमे आलू के साथ साथ सामान्यतः परवल भी रहता था. परोसने वाले को बार बार ‘सिर्फ आलू दीजिएगा ‘ कहने के बावजूद, वो जो कलछुल में आया वो डाल के चल देता था…भोज खत्म होते होते मेरे पत्तल में आलू दम के ग्रेवी का झील बन चुका होता था…जिसमे परवल रुपी बोट इधर उधर उपलाते रहते.
हम भी अपने घरों के भोज में खूब चावल-कचौरी- ओल का आचार चलाये हैं…सबसे मजा आता था पानी चलाने में. हम थोड़ा ज्यादे तेज़ बनके चिल्लाते थे ‘एच-टू-ओ’ चाहिए…अब गांव में कितने लोगों को पता होगा की ‘डै-हाइड्रोजन ऑक्साइड’ का सामन्य नाम क्या है…कुछ बूढ़े लोग पूछते…’ई कौन शरबत है बउआ? तनी हमरे लोटा में भी दीजिये’.
फिर किसी शरबत की जगह पानी पाकर अपनी नाराज़गी भी प्रकट कर देते ‘ई तो पानी है जी…धत्त’
वैसे एक बात तो है…गांव का पानी शरबत से काम नहीं था…चंपा-कल से निकला हुआ ठंडा पानी का मिठास…शायद राहु-केतु को भी ऐसा ही स्वाद आया होगा अपनी गर्दन कटने से पहले.
हमारे परिवार में मेरे जनरेशन में छे लड़के हैं…सबका जनेऊ एक साथ किया गया था…गांव में ही. खूब भीड़ जुटी थी. हमारे लिए तो सबसे इम्पोर्टेन्ट मोमेंट था जब हमें शाहरुख़ खान वाले ‘लुक’ से अनुपम खेर वाले ‘लुक’ में आना था. चूँकि मैं और मेरा भाई सबसे बड़े थे…नाई के उस्तरे की धार सबसे पहले हमारी खोपड़ी पे अपना कमाल दिखाई. मगर नाई था बड़ा दुष्ट किस्म का आदमी. उसने दोनों भाइयों की पीछे तो टिक्की छोड़ी ही, सामने की तरफ थोड़ी सी चुड़की छोड़ दी…पैसों के लिए. अब हम दोनों भाई खड़े हैं…अमरीश पूरी की किस बी-ग्रेड फिल्म वाली लुक के साथ…सारे गांव वाले हंस हंस के लोट-पोट हुए जा रहे हैं…ऊपर से वीडियो-ग्राफी करने वाले को भी और कुछ नहीं दिख रहा था फोकस करने लायक. पीछे पिताजी खड़े हैं तो हम नाई को कोई उच्च-स्तर की गाली अथवा धमकी से डरा भी नहीं सकते. चुप-चाप सर झुक कर खड़े रहे…फिर जब पिताजी की वॉलेट से दो सौ सौ के नोट निकले तो हमारे खोपड़ी को पूरी तरह से सफाचट किया गया…आज भी गांव में लोग उस बात को याद रखे हुए हैं.
 
गाँव के लोग-
हर गांव की तरह मेरे गांव में भी एक से एक करैक्टर सब हैं / थे. अपने आप को तीस मार खान से काम नहीं समझता था कोई.
इधर हाल में ही पता चला की गांव से जो रेलवे लाइन जाती है उसका ‘इलेक्ट्रिफिकेशन’ हो गया है. गनीमत है की ये काम होने से पहले वहां बिजली आ चुकी थी…वर्ना ज़रूर कोई महानात्मा पच्चीस हज़ार वोल्ट वाले तार में अपना टोंगा फंसाता…’बिजिलिए न है जी…तनी ज्यादे लाइट फेंकेगा बल्ब से …उससे ज्यादा क्या होगा?’
 
गांव के किस्से-
गांव में भूत के किस्से तो ज़रूर सुनने को मिलते…पोखर (pond) वाले पीपल के पेड़ पर दो -दो भूत रहता था. एक बात लेकिन आज तक हमको समझ नहीं आई की ये भूत सब सिर्फ पीपल के पेड़ पर ही क्यों रहता था? वहां का किराया काम था क्या? इससे अच्छा तो केला के पेड़ पर रहो…भूख लगा तो केला तोड़ के खा लिए…गर्मी लगा तो पत्ता तोड़ के पंखा ‘झल’ लिए.
गांव से रेलवे लाइन भी जाती थी…बहुत मस्ती काटे हैं उसपर…पहली बार जब दुसरे बच्चों को पटरी पर पत्थर लाइन से लगते देखे थे तो हम डर के दूर भाग गए थे…लगा था की पक्का ट्रेन डी-रेल हो जायेगा. फिर जब ट्रेन आई और उन पत्थरों का पाउडर बन कर चली गयी, तब से ये हमारा फेवरेट गेम बन गया. बहुत सारा एक रूपया का सिक्का भी वेस्ट किये हैं फ्री में चुम्बक बनने के चक्कर में.
हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘खूबसूरत’ में रेखा जी ने एक शब्द का प्रयोग किया था ‘निर्मल आनंद’…उन्होंने उसकी बहुत अच्छी व्याख्या भी की थी. वैसे तो हृषिकेश मुखर्जी की एक दो फिल्मों को छोड़ दें, तो बाकि फिल्में भी ‘निर्मल आनंद’ की अनुभूति कराती हैं. वैसा ही निर्मल आनंद मुझे प्राप्त हुआ था अपने ही आम के ‘गाछी’ (बगान) से एकदम ताज़ा ‘सुक्कूल’ आम चूस कर. गांव के दुसरे बच्चे तो फटाक से ऊपर चढ़ गए…हम नीचे खड़े कैच कर के जमा किये…फिर पटरी पर बैठ के निर्मल आनंद का रस-पान किया गया. वैसे स्वाद क्या कोई अल्फांसो दे पाएगा.
एक बार गांव के लड़को के साथ कब्बड्डी का मैच हो गया. हमारी टीम जीत रही थी…दुसरे पाले में सिर्फ एक छोटा-दुबला सा लड़का बचा था…हम ताल ठोक के घुसे…लड़का अपने पाले में और अंदर गया…हमने सोचा ,’ वाह…डर रहा है हमसे इसलिए और पीछे जा रहा है ‘ हम भी उसके साथ अंदर बढ़ते गए…वो लड़का तो असल में अपने शिकार को जाल के और अंदर आने को फुसला रहा था…अचानक से रुका और फिर सर झुक कर भागता हुआ आया. इसके पहले की हम कुछ कर पाते, उसने हमारे घुटने पकड़े और जो दांव मारा की हम घोलटनियां मार के चारों खाने चित्त. उत्तर बिहार के मैदानी इलाके में हिमायल की गोद से बहने वाली नदियों ने जो हज़ारों सालों से अल्लुवीउम सॉइल डिपाजिट किया था…उसका स्वाद और टेक्सचर दोनों हमने बड़े कष्टदायक तरीके से महसूस किया था. खेतों में कुल्हाड़ी चलाने वाले शरीर के सामने टेनिस बॉल क्रिकेट खेलने वाला शरीर भला कहाँ से टिकता.
आज भी गांव जाते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है. सबकुछ बहुत ही पावन- शुद्ध. शहर की आपा-धापी..धुल-धुएं..गन्दगी-कीचड़..भीड़-भाड़ से अलग. मेरा क्रेज अभी तक कम नहीं हुआ है लकड़ी के चूल्हे पर लोहे की कड़ाही में बने आलू की भुजिया और पराठों के लिए…फिर अगर डिनर में पास के खेत से पकड़ी गयी ‘मांगुर’ मछली और ‘उसना’ भात हो तो सोने पे सुहागा. वैसे आजकल तो गांव में भी गैस चूल्हा लग गया है…पर स्वाद में कोई कमी नहीं आई है.
आशा करता हूँ इस पोस्ट ने आपके यादों के खलिहान में भी थोड़ी सुगबुगाहट पैदा की होगी. मैं मानता हूँ की मेरे गांव में सब कुछ भला-चंगा नहीं है…पर जैसा भी है, है तो हमारा ‘घर’ ही. है की नहीं?

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