फ़ोन आया की निगाहों में चमक जाग उठी…

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बताइए…ज़माना कैसे बदल जाता है. आजकल लोग हर छौ महीना पर फ़ोन चेंज करते हैं…मानो उस फ़ोन की ‘स्मार्टनेस’ सिर्फ छे महीने में ही एक्सपायर कर जाती हो. जो लोग अफ़्फोर्ड कर सकते हैं उनके परिवार में हरेक  ‘वार्तालाप के  योग्य’ सदस्य के पास एक फ़ोन रहता है. चलिए आज आपको उस ज़माने में ले चलते हैं जब पूरे कॉलोनी में किसी एक घर में फ़ोन हुआ करता था…काले रंग का…गोल डायल…सिर्फ एक रिंग-टोन….ट्रिंग-ट्रिंग…कोई एस-एम-एस या एम-एम-एस का लफड़ा नहीं. कैमरा और फ़ोन दो पृथक वस्तुएं होती थी…फ़ोन जनरली ड्राइंग रूम में रखा रहता और कैमरा बच्चों से बचाकर अलमारी में…
कालोनी का कांटेक्ट नंबर- एक समय था जब फ़ोन जैसी सुविधाजनक वस्तु को भी सरकार एक लक्ज़री के तौर पर देखती थी…फ़ोन के लिए नंबर लगता था और काफी सालों बाद लोगों के घर में दूरभाष देवता अवतरित होते थे. चूँकि ये ज़माना काफी तंगी का था…जिन लोगों के घर फ़ोन लग जाता उनका रुतबा बढ़ जाता. कालोनी वाले आपका फ़ोन नंबर अपने रिश्तेदारों में बंटवा देते. हमारे घर में भी काफी किराएदार लोग था…पहले कॉल में एक रिक्वेस्ट डाली जाती…’कंकरबाग से बोल रहे हैं ना? थोड़ा बंटी की मम्मी को बुला दीजिएगा…हम दस मिनट बाद फिर फ़ोन करेंगे’
बंटी की मम्मी को फौरन खबर की जाती…पता चला की वो आटा सान रही थी…वैसे ही दौड़े दौड़े आ गयी…फ़ोन का इंतज़ार करते हुए थोड़ी गप्पे भी हो गयी हमारे घर की लेडीज के साथ.
अब बंटी की मम्मी तो उस ज़माने की थी जब लोग ‘ट्रंक’ कॉल करते थे…फ़ोन पर चिल्ला चिल्ला कर बात करना पड़ता  था…अगर कुछ सीक्रेट बात करना  है तो चिट्ठी लिखिए…फ़ोन पर तो पूरा दुनिया सुन लगा.  बंटी की मम्मी का वो आदत गया नहीं था और भी कई महानुभावों की तरह …जितना देर वो फुल वॉल्यूम पर फ़ोन में चिल्लाती रहती , हम लोग उतना देर बुक क्रिकेट खेल के टाइम काट लेते थे.
फर्स्ट अप्रैल को हर बार हमने उनको बेवकूफ बनाया था…फ़ोन रिसीव करने नीचे आई तो ‘अप्रैल फूल’.

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एस-टी-डी बूथ- नब्बे के दशक में लगभग हर दस मकान पर एक एस-टी-डी बूथ खुल गया था. ज्यादातर वो ही लोग थे जिनके माँ-बाप को ये समझ आ गया था की इनके पढाई लिखाई में पैसा बर्बाद करने से कोई फायदा नहीं. उन दिनों बहुत कम ही लोगों के घर में फ़ोन था (फ्लॉप-शो का एक बहुत ही मजेदार एपिसोड भी है फ़ोन विभाग पर…जसपाल भट्टी अमर रहे. ) और उनमें भी बहुत ही कम लोगों ने अपना एस-टी-डी अनलॉक करवाया हुआ था…एक तो उसको अनलॉक करवाना भी कोई आसान काम नहीं था. बहुत जगह चढ़ावा चढ़ाना पड़ता था.
खैर…रात के नौ बजते ही इन बूथों पर लाइन लग जाती थी (रेट हाफ हो जाते थे). ज्यादातर बूथ में कोई केबिन नहीं होता था…तो आपकी बात सभी मजे लेकर सुनते थे. कुछ लोग सामने लगे इलेक्ट्रॉनिक मीटर को भी देखते रहते…’वाह..सौ रूपया ठेका दिया…गज़ब’. (उस समय सौ के नोट की थोड़ी बहुत  औकात हुआ करती थी )

एक बार का याद है, कोई बंगाली दादा बैठे बात करने. उन्होंने बंगाली में कुछ ऐसे ऐसे शब्दों का प्रयोग किया की उसे सुनकर ही हमारे जैसे बच्चों की हंसी छूट गयी…’देखो न, क्या दो बोल रहा है बार- बार… ‘भउंजोमनी’ क्या होता है? हे हे हे ‘.

वैसे, बिहार में वो समय थोड़ा वन्य-जीवन के लिए  ज्यादा अनुकूल था.  उस समय अगर आप किसी एस-टी-डी बूथ पर ज्यादा पैसा झाड़ कर निकले…रात के समय…तो शायद उसी बूथ से  फिर आपकी फिरौती के डिमांड का भी फ़ोन आ सकता था.

के-बी-सी क्रेज- और कोई करोड़ पति बना हो चाहे नहीं…अमित जी तो ज़रूर बन गए इस लीजेंडरी कार्यक्रम को होस्ट करने के बाद. इस कार्यक्रम ने बहुत लोगों के घर का एस-टी-डी अनलॉक करवा दिया था. क्यूंकि इसमें भाग लेने के लिए आपको फ़ोन करके रजिस्टर करना पड़ता था…फिर सवालों के जवाब भी देने होते. इसलिए बहुत लोगों के घर में  डायल वाले फ़ोन भी अपग्रेड होकर बटन वाले बन गए थे…ताकि सही ऑप्शन वाला बटन आप टीप सकें.
मेरे एक मित्र के चाचाजी तो कैजुअल लीव लेकर दिन भर घर में बैठ कर ट्राई करते रहते जिस दिन ‘लाइन्स’ ओपन होती थी. किस्मत वालों का ही टाँका भिड़ता था.
फिर जब स्टार प्लस वालों को लगा की उन्होंने बहुत सारे एडल्ट्स को अपने इशारों पर नचा लिया है…तो शुरू हुआ जूनियर के-बी-सी.

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हमारे एक चचेरे भाई की उम्र और नौलेज दोनों इस प्रोग्राम में पार्टिसिपेट करने लायक थी…दिन में जब बहुत बार कोशिश करने पर ‘सभी लाइने व्यस्त हैं, कृपया कुछ देर  बाद डायल करें’ वाला मन्त्र सुनने की मिला…तो रात में दो बजे उठकर कोशिश की गयी…इस बार लगा गया…भाग कर लड़के को गहरी नींद से उठाया गया…सवाल था ‘इनमें से कौन रावण का भाई था’…ऑप्शन में ‘सी- कुम्भकरण’ था…औंघिअयल बच्चे ने पता नहीं नींद में कौन सा बटन टीपा…स्टार प्लस ने वापस कॉल नहीं किया.

ब्लेंक- कॉल्स- आजकल तो तुर्रंत पता चल जाता है किस नंबर से कोई फ़ोन आया था. एक समय था जब ये सुविधा उन पुराने फिक्स्ड लाइन फ़ोन में मौजूद नहीं थी. इस बात का फायदा कुछ असमाजिक तत्त्व बखूबी उठाते थे. वैसे असमाजिक तत्त्व कहना थोड़ी नाइंसाफी होगी…क्यूंकि कुछ बेचारे ‘FOSLA ‘ (फ्रुस्ट्रटेड वोन  साइडेड लवर्स एसोसिएशन ) के मेंबर भी थे जो सिर्फ अपने सपनों की रानी की मधुर आवाज सुनना चाहते थे…मगर जब उस सपनो की रानी के बजाय घर का कोई और सदस्य फ़ोन उठा लेता तो उनकी घिग्गी बंध जाती थी.
हमारे घर भी कभी कभी ब्लेंक कॉल्स आते थे. एक बार मैंने आजीज होकर उस व्यक्ति से बहुत ही लॉजिकल बात की…
‘ऐसा है की तुम  कुछ बोल तो रहे नहीं हो…तो सुनो…अगर तुम कोई लड़के हो तो भैय्या ऐसा है की इस घर में कोई भी उस उम्र की लड़की नहीं है जिसके लिए ब्लेंक कॉल्स किया जाये…सिर्फ  शादीशुदा एवं बाल-बच्चेदार लॅडीस लोग हैं…और अगर तुम कोई लड़की हो तो ऐसा है की मैं अभी अभी उन्नीस साल का हुआ हूँ…इंजीनियरिंग की पढाई कर रहा हूँ…देखने में बुरा नहीं हूँ…कहो तो मिलते हैं…मगर ये ब्लेंक कॉल का लफड़ा खत्म करो’
यकीन मानिए, इस घटना के बाद हमारे घर में कभी ब्लेंक कॉल्स नहीं आये.
उन पुराने फोनों का अपना ही मजा था. सोचिये अगर वो फ़ोन नहीं होते तो ‘हेरा-फेरी ‘ में बाबू भैया के स्टार गराज पर कबीरा का फ़ोन कैसे आता. बाज़ीगर में जॉनी लीवर वो  बेजोड़ कॉमेडी पीस कैसे कर पाते.
समय के साथ चीज़ें एडवांस्ड होती जाती हैं..तभी तो आज आप ‘पुराने वाले फ़ोन’ के बारे में लिखे गए इस लेख को अपने स्मार्टफोन पे पढ़ रहे हैं…है की नहीं.

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