हमारी प्यारी मारुती

 

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बचपन से जो चीज़ें आपके साथ होती हैं, उनसे एक रिश्तेदारी सी हो जाती है. आप उन चीज़ों की रग-रग से वाकिफ हो जाते हैं. वो पुराना डयनोरा टीवी…वो केल्विनेटर का एक सौ पैंसठ लीटर वाला फ्रिज…वो फिलिप्स का कैसेट प्लेयर प्लस रेडियो…वो पहली महँगी वाली टाइमेक्स की घड़ी…इन निर्जीव वस्तुओं से भी आपका मन जुड़ जाता है. वैसे ही हमारा मन जुड़ गया था हमारी पहली मारुती से. इधर हाल में पता चला की उसे एक गेराज वाले को बेच दिया गया…बेचारी बूढी हो गयी थी…जितना चलती नहीं थी उससे ज्यादा बीमारियां लगी हुई थी उसे…तिस पर उसे अब बाहर, कवर करके खड़ा किया जाता था…गेराज में उसकी जगह एक नयी नवेली चेवी ने ले ली थी. मगर जब उसके बेचे जाने का सुना तो लगा बचपन की वो सारी यादें जो उस कार में हमने बनायीं थी…वो भी शायद खरीदने वाले गेराज के मेकेनिकों से आने वाली ग्रीस की गंध  से घुट कर कहीं खो जाएँगी. करीब उनतीस साल वो मारुती हमारे परिवार का हिस्सा रही…उसी के कुछ यादगार पल-
संजय गांधी ने कुल जमा शायद एक अच्छा काम किया था…मारुती सुजुकी नाम की कंपनी बिठा कर. जिन लोगों को नहीं पता की संजय गांधी किस बला का नाम था तो एक हिंट- वो राहुल गांधी के चाचाजी थे. उनकी महानता के बाकी किस्से आप गूगल बाबा से पूछ लें. तो मैं बात कर रहा था मारुती सुजुकी की…हमारे परिवार की पहली गाड़ी…नीली रंग की पूरानी वाली मारुती 800 . आज के नौजवानों को शायद ये सुनकर आश्चर्य हो की मारुती आने के पहले गाड़ी के मामले में सिर्फ दो ऑप्शन होते थे…अम्बेस्डर या फ़िएट…कोई हुंडई, हौंडा, रेनो, टाटा, निसान, टोयोटा या फोर्ड नहीं…सिर्फ दो. सोशलिज्म का दौर था…अगर इम्पोर्टेड गाड़ी का शौक है तो २०० परसेंट टैक्स दीजिये (मतलब गाड़ी का दाम तिगुना). मगर अस्सी के शुरुआत में ये बदल गया…फिर मारुती आ गयी.
जब नयी नयी लांच हुई तो ज्यादातर लोगों ने मुँह बिचका लिए…
‘ये कनस्तर जैसा  गाड़ी…इंडिया के रोड पर एक साल के अंदर दो टुकड़ा हो जायेगा…’
‘इतना छोटा गाड़ी में इंडियन फैमिली कैसे फिट होगा?’
‘इतना हल्का फुल्का कार है…हाईवे पर तो ज्यादा स्पीड में अगर ट्रक पास किया तो उसके झोंके में कहीं सड़क से बाहर ना फेंका जाये’
लोगों ने बहुत सारी खामियां निकल दी. जनरल कंसेंसस यही था की ऐसी पिद्दी सी हलकी फुल्की जापानी गाड़ियां इंडिया की सड़कों पर ज्यादा दिन नहीं टिक पाएंगी. मगर भैया जिसके नाम में बजरंग बली हों…उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता.  मारुती तो ऐसी चली की बाकि दोनों कार कंपनियों का दिवालिया पिट गया. बहुत सारे नए टूल्स और फैसिलिटी से लैस होकर आई थी ये गाड़ी…
‘वाह…विंड-शील्ड भी धोने का इंतेज़ाम है…और इंडिकेटर स्टीयरिंग वापस घुमाने के बाद अपने आप बंद हो जाता है…गज़ब….सीट इंक्लाइन होता है…सो भी सकते हैं इसमें तो’
सबसे मजेदार बात…आवाज बहुत कम करती थी ये गाड़ी…कई बार तो हमलोग को पता भी नहीं चलता की पिताजी आ चुके हैं…टीवी के सामने से भागने का वार्निंग नहीं मिल पाता…मारुती ने बहुत डांट लगवाई है हमें अपने इस शांतिप्रिय स्वाभाव से.

एक समस्या थी डिक्की की. अम्बेस्डर और फ़िएट की डिक्की में तो इतनी जगह होती थी जितनी आजकल बैंगलोर के 1 BHK  में आपको नहीं मिलेगी…मारुती की डिक्की लेकिन छोटी थी…मगर एक सीक्रेट था मारुती के पास…पीछे की सीट गिर जाती थी…और उसको गिराने के बाद तो मारुती नहीं…टाटा चार सौ सात है भाई…जो मर्जी में आये दाल दीजिये…सिलिंडर…गेहूं का बोरा…टीवी.
और गाड़ी हलकी इतनी की क्या कहें…एक बार अँधेरे में एक साइड का चक्का, खुले मेन-होल में चला गया था. पास ही खड़े एक दूध वाले और एक और सज्जन ने मिलकर गाड़ी को उठाकर वापस सड़क पे रख दिया…मानो गाड़ी नहीं साइकिल हो.

एक बार मुजजफ्फरपुर जाते समय हाईवे पर भयंकर जाम मिला…किसी ने हमें एक दूसरा रास्ता बताया जो की हमें जाम को बाईपास करके मुजजफ्फरपुर के पास निकाल देता. वैसे वो कोई रास्ता नहीं था…एक नहर का तट-बांध था. और जाहिर है नहर के तट-बांध छोटी गाड़ियों के लिए तो बनाए नहीं जाते हैं…मगर एक बार आप उसपर चढ़ गए तो फिर वापस जाने का कोई रास्ता नहीं है…चुप चाप चलते जाइये जब तक कोई पुल-सड़क ना मिले. हमारी मारुती ने थोड़ी चोट खायी पर बंद नहीं पड़ी…कूदते फांदते आखिर कर हम तुर्की के पास वापस हाईवे पर निकले. मगर उस एडवेंचर ने कम से कम हमें तो ये यकीन दिल दिया की ये कोई टटपूंजिया गाड़ी नहीं थी. दिखने में भले हलकी फुल्की थी…अंदर लेकिन कलेजा  फौलादी था.

कुछ अर्से बाद हमारी गाड़ी की थोड़ी प्लास्टिक सर्जरी हुई. किसी कारण से उसका शीशे हरे टिंट वाले फिल्म से सजा दिए गए…पीछे डिक्की पर गोल्डन कलर की पट्टियां लगा दी गयी. मुझे लगता है पूरे  पटना में…नहीं, पूरे भारत में…इन फैक्ट पूरे विश्व में ( वो गाड़ी जापान, चीन, पाकिस्तान और अन्य कई देशों में भी बिकती थी) शायद नीली  गाड़ी और हरे शीशे वाले कॉम्बिनेशन की और कोई मारुती नहीं होगी.
अमरीका में बच्चों को आप गोद में बिठाकर गाड़ी में सफर नहीं कर सकते…उनके लिए अलग सीट आती है. जबकि हमलोग का तो सीट ही गोदी था…एक बार तो गोदियाँ कम पड़ गयी थी तो मैं और मेरे फुफेरे भाई लोग पीछे की डिक्की का शीशा खोल कर उसमें बैठ गए थे…पुनाई-चक से कंकरबाग का रास्ता वैसे ही तय किया गया था…रास्ते भर पीछे की गाड़ियों को मुँह चिढ़ाते हुए आये थे.
इसी मारुती पर कार चलाना सीखे…हलकी गाड़ी थी तो आराम से एक आदमी से ही ढकेला कर गेराज से बाहर निकाल जाती थी…बिना स्टार्ट किये…सामने ही पार्क था…उसी में गोल गोल घुमाते रहते.  बहुत इजी था इस गाड़ी को ड्राइव करना…एक तो मस्त पिक-अप था…जबकि इंजन सिर्फ अड़तीस हार्सपावर का था…आजकल तो मोटरसाइकिल इससे ज्यादा पावर वाले आ गए हैं…और छोटी गाड़ी थी टर्निंग रेडियस भी कम. जहाँ मन वहां पार्क कीजिये…जिस गली में घुसाना हो, घुसा दीजिये…

थोड़ा दुःख लगता था जब गाड़ी हमारे गांव जाती थी…आते समय लोग उसमे ड्राइवर के  नीचे की जगह को छोड़ कर बाकी किसी भी अवेलेबल स्पेस में कोई बोरा…थैला..पैकेट ठूंस देते थे…बैठने की परेशानी से ज्यादा गाड़ी पर दया भी आती थी…क्या बीत रही होगी बेचारे की सस्पेंशन पे. उसके ऊपर पटना का अल्बलाहा टाइप से बनाया हुआ स्पीड-ब्रेकर सब. मगर हमारी मारुती सब कुछ चुप-चाप झेल जाती थी. एक बात तो थी उसमे…उसने कभी ऐसी जगह पे धोखा नहीं दिया जहाँ हमें परेशानी हो जाती…कभी गांधी सेतु के बीच में बंद नहीं हुई…ख़राब भी हुई तो शहर के अंदर आकर…हाईवे पर नहीं.

उस गाड़ी ने हमारे कितने खुशियों के पल देखे…मेरी चाचियों को लेबर पेन शुरू हुआ तो उसी गाड़ी में वो शांति राय के हॉस्पिटल गयी…फिर परिवार के नए नवेले सदस्य को लेकर वापस भी उसी गाड़ी में आई. कभी जो सुबह सुबह बारिश होती रहती तो पिताजी गाड़ी से स्कूल छोड़ आते. और भी कई सारे यादगार पल जो हमने अपनी पहली मारुती में बिताए थे.
शायद आप सबने भी ऐसे ही कुछ पल अपनी अपनी मरुतियों में बिताए होंगे. एक बार याद करके थैंक यू ज़रूर बोलिएगा मन ही मन.
– थैंक यू डिअर BPQ 6715 .

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