फेमस बॉलीवुड मूवी सीन पे पटनिया तड़का #1

फेमस बॉलीवुड मूवी सीन पे पटनिया तड़का-
१. दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे- क्लाइमेक्स- स्थान- राजेंद्र नगर टर्मिनल प्लेटफार्म # 1
अमरीश पूरी- जा सिमरन जा…इस लफ्फु से ज्यादा प्यार  तुझे कोई नहीं कर सकता…जा ज़ी ले अपनी ज़िन्दगी

काजोल दौड़ के राज के तरफ भागती है…राज अपना हाथ स्ट्रेच करके लटक जाता है…जैसे ही उनकी उँगलियाँ आपस में टच करती…काजोल का पैर एक सो रहे कुत्ते के ऊपर आ जाता है…’काएं-काएं-काएं’ …काजोल का बैलेंस गड़बड़ाता है…वो प्लेटफार्म पे गिर जाती है और ट्रेन राज को लेकर चली जाती है.

लोग भागे भागे आते हैं. काजोल रोये जा रही है…तभी सारा तमाशा देख रहे एक साहब अपना पान पटरी पे थूक कर इनसे मुखातिब होते हैं ‘काहे इतना टेंशन ले रहे हैं…पटना जंक्शन पर भी तो रुकता है बीस मिनट…ऑटो पकड़ के निकलिए जल्दी…धरा जायेगा’
पूरा कुनबा भागा -भागा  स्टेशन के बाहर आता है.
‘ए ऑटो’
‘हाँ सर, हाजीपुर?’
‘जल्दी से पटना जंक्शन पहुंचाओ…पांच सौ देंगे’
ऑटो वाला कुछ सोच कर ‘हज़ार लगेगा सर’
‘छे सौ?’
काजोल पिनक जाती है अब ,’क्या बाबूजी ??? मेरा राज फिर  चला जायेगा..चलो जी तुम’
ऑटो वाला अपने नार्मल पागलपन से थोड़ा ज्यादा पागलपन वाला ड्राइविंग करके करबिगहिया साइड ले आता है, पर्रन्तु फ्लाई-ओवर के नीचे लगे जाम से सिमरन का ट्रेन फिर छूट जाता है.
ऑटो-वाला तेज़ है लेकिन, ‘ मैडम घबराइए नहीं, दानापुर में भी रुकेगा, चलिए पांच सौ और दे दीजिएगा.’
किसी तरह ये लोग दानापुर पहुँचते हैं. ट्रेन प्लेटफार्म पर खड़ी है. सिमरन भागी भागी पूरा ट्रेन छान मारी.
‘राज दिख नहीं रहा, भाई साब आपकी बोगी में एक हीरो जैसा लड़का चढ़ा था…इतना गर्मी में भी लेदर जैकेट पहने हुए था’
‘अच्छा वो हीरो…उसको और उसके गंजे  बाप को तो पटना जंक्शन का फ्लाइंग स्क्वाड पकड़ लिया था. बिना टिकट के था न दोनों और बहुत फुटानी भी बतिया रहा था, फुलवारीशरीफ में ही निकाल के बिग दिया था बोगी से’
सिमरन ने कुछ सोचा फिर अपने बाबूजी से बोली ,’ बाउजी, बहुत जी ली मैंने अपनी ज़िन्दगी…कुलजीतवा को फ़ोन लगाइए…इसके पहले की मन्दिरा के मंदिर के का पुजारी बन जाये’

२. मुन्ना भाई एम.बी.बी.स
डीन अस्थाना- ‘PMCH में आप सभी स्टूडेंट्स का मैं स्वागत करता हूँ. किसी को कुछ पूछना है?’
मुन्ना भाई- ‘हाँ, ये पूछना था की यहाँ कोई भर्ती होने आता है तो उसे नर्सिंग होम वाले दलाल क्यों उठा के ले जाते हैं’
डीन अस्थाना- दांत पीसते हुए  ‘हे-हे-हे-ही-ही-ही-हे-हे-हे…तुम यहाँ कैसे स्टूडेंट बन गए…रंजीत डॉन के हेल्प से आये हो क्या ?’
मुन्ना भाई- ‘अपुन अपना हेल्प खुद करता है मामू…और ये साला रंजीत डॉन कौन है…अपुन के एरिया में नया गोप आया है क्या…ए सर्किट, पता कर’

३. क़यामत से कयामत तक-
आमिर- ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा..
कोई इंजीनियर का काम करेगा…कोई बिज़नेस में अपना नाम करेगा….मेरा तो सपना है इक चेहरा…देखे जो उसको झूमे बहार…’
तभी एक ज़ोर का झापड़ आमिर को पड़ता है.
‘अयला…ये मुझे थप्पड़ किसने मारा’
दिलीप ताहिल ,’ बेहूदा कहीं का…जेल में रहते हुए भी तुमको इतना अच्छा कॉलेज में पढ़ाए…बाकि सब लइका इंजीनियर डॉक्टर बन गया…आ तुमको गालो पे खिलती कलियों का मौसम चाहिए…तो लो खिला दिए हैं मौसम तुम्हारे गाल पर…अब चलो घर…मार बेल्ट के तुम्हारा सब फुटानी निकालते हैं…यही नाम किया है तुम? अब  गिटार तुन्तुना के महावीर मंदिर के सामने भीख मांगना’

४. चक दे इंडिया- सत्तर मिनट
शाहरुख़- ‘तुम्हारे पास हैं सत्तर मिनट…तुम्हारी ज़िन्दगी से सबसे अहम सत्तर मिनट…ये सत्तर मिनट तुमसे ख़ुदा भी नहीं छीन सकता…इन सत्तर मिनट में तुम्हें अपने ऑटो से भिखना पहाड़ी से गांधी मैदान पहुंचना है…तुम्हें ऑटो कैसे चलाना है ये मैं तुम्हें नहीं बताऊंगा…PMCH के अंदर से निकालना है की मखनिया कुआँ से शार्ट-कट लेना है…ये भी मैं नहीं बताऊंगा…तुम सब मुझे बताओगी…इन सत्तर मिनट में फुल बाई में अपना ऑटो चलाकर…वन- वे में घुसकर…रॉंग साइड चलाकर…कम से कम तीन-चार कार में सटाकर…इन  सत्तर मिनट में तुम सब अपना सबसे बौराहा वाला ड्राइविंग करके दिखाओ…जाओ और हर उस पैसेंजर को दिखा दो जिसने तुमपर भरोसा नहीं किया…दिखा दो की तुम भी पटना के मेल  ऑटो ड्राइवर से किसी भी बात में कम नहीं हो’

५. दीवार-
अमिताभ- ‘हमारे पास दो ठो स्कार्पिओ है…नहर पार चार कट्ठा ज़मीन है…हरनिवास में तीन गो  दूकान है…पोस्ट ऑफिस में दस ठो किसान विकास पत्र है…एमवे में डायमंड मेम्बरशिप है…क्या है तुम्हारे पास?’
शशि- ‘मेरे पास माँ…का खाजेकलां से टीक वुड में फ्रेम कराया हुआ फोटो है भाई’

6. शोले – गब्बर सिंह एंट्री-
गब्बर- हम्म्म…कितना भैंसी था.
कालिया- दो सरदार
गब्बर- हम्म्म…भैंसी दो और गाय तीन…फिर भी खाली हाथ वापस आ गए? क्या सोचकर वापस आये…की सरदार आज अपने दूकान में निम्बू का चाय बेचेगा? अरे ओ सम्भा…कितना दूध का खपत है रे रोज़ अपने दुकान का…
सम्भा- पूरे पचास लीटर
गब्बर- पूरे पचास लीटर…वो इसलिए की यहाँ से पचास पचास गज पर जितना ऑफिस और दूकान है…वहां जब सबको औंघि आता है तो बॉस कहता है ‘मत सो बेटा…अभी गब्बर के स्टाल से चाय आ जायेगा’…और ये तीनो आज एक पउआ दूध का भी इंतज़ाम नहीं कर पाये. इसकी सजा मिलेगी…बराबर मिलेगी.
गब्बर जाता है और अपने असिस्टेंट के बैग से पुदीन-हरा टेबलेट का स्ट्रिप निकालता है.
‘कितना गोली है इसमें?’
‘छे सरदार’
‘गोली छे और आदमी तीन…बहुत नाइंसाफी है’
गब्बर आँख मूँद के तीन और टेबलेट निकाल देता है.
‘अब ठीक है…अब इस पत्तर के तीन खानों में भयंकर कड़वाहट वाली गोली है और बाकि सात खाली…अब हम इस पत्तर को इस काले प्लास्टिक में डाल दिए…अब कहाँ कसैला स्वाद और कहाँ नहीं…हमको नहीं पता…हमको कुछ नहीं पता…देखे किसको क्या मिलता है’
पहला आदमी प्लास्टिक के ऊपर से एक स्लॉट पर ऊँगली रखता है…खाली. ‘बच गया सला’
दूसरा आदमी भी खाली स्लॉट चुनता है…’ये भी बच गया’
‘तेरा क्या होगा कालिया’
‘सरदार मैंने आपका हाजमोला खाया है’
‘तो अब पुदीन हरा खा’
मगर कालिया भी खाली स्लॉट ही चुनता है.
‘कमाल हो गया…तीनो के तीनो बच गए…तीनो हरामज़ादों को पुदीन हरा का गोली नहीं चबाना पड़ा…हा हा हा हा हा ‘
सभी हंसने लगते हैं…तभी गब्बर मुड़ता है और अपने तीनो आदमियों के मुंह में एक एक पुदीन हरा का गोली डाल देता है.
‘जो निगल गया समझो नेक्स्ट  उसके मुँह में छिलका सहित कटहल गया’

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