थोड़ी सी भागलपुर की यादें

अपने  छोटे से जीवन में  से  मैंने करीब चालीस घंटे भागलपुर में बिताए होंगे. मगर उन चालीस घंटो में जितना देखा, वो मन-मष्तिस्क में एक मधुर सी स्मृति छोड़ गया. उसी स्मृति को टटोल कर, शब्दों में पिरो कर आप सब के सामने रख रहा हूँ.

आप सब जानते होंगे की बिहार की मेडिकल और इंजीनियरिंग की परीक्षा BCECE बोर्ड कंडक्ट करता है. बाकि एंट्रेंस एग्जाम में आपको सेंटर चुनने की आज़ादी होती है…यहाँ नहीं. BCECE  बोर्ड जानता है की बिहारी अभिभावक अपने बच्चों के करियर को लेकर अपने जान पर खेल जाने का दम-ख़म रखते हैं. इसलिए,  एक फंडामेंटल रूल बन के रख हुआ है…छात्र ने जहाँ से भी इंटरमीडिएट या प्लस टू किया हो…उसके दो सौ किलोमीटर के दायरे के बाहर सेंटर मिलेगा उसको. बिहार बोर्ड के एडमिट कार्ड आने तक किसी को पता नहीं होता सेंटर कहाँ मिला है. एडमिट कार्ड आने पर सेंटर वाले  शहर में किसी रिस्तेदार या जान-पहचान वालों की खोज शुरू हो जाती. हमारा भी ऐसा ही हुआ जब भागलपुर सेंटर पड़ा…सबौर हाई स्कूल. भागलपुर सुनकर पिताजी खुश हो गए…वहां तो बहुत अच्छी और गाढ़ी पहचान वाले डॉक्टर झा का पुस्तैनी घर था.

एक तो हमको ये नाम ‘भागलपुर’ सुनकर बड़ा अजीब लगता…वैसे ‘पटना’ भी कोई ऐसा नाम नहीं है जिसके पीछे कोई बहुत ऐतिहासिक या सांस्कृतिक महत्व हो. मगर ‘भागलपुर’ नाम सुनकर मन में चवन्निया मुस्कान ज़रूर छा जाती. सोचता ज़रूर किसी पुराने ज़माने के राजा/जमींदार ने गुस्से में ये नाम रखा होगा-
‘ यहाँ किसी के घर मिलने जाइये तो वो  कभी मिलता ही नहीं है…सब पता नहीं कहाँ भागल रहता है…इस जगह का नाम ‘भागलपुर’ रख देते हैं’
खैर…नाम में क्या रखा है…हमारा एग्जाम का डेट आ गया…सिर्फ एक ट्रैन जाती थी पटना से भागलपुर…मगध-विक्रमशिला एक्सप्रेस. चूँकि  हमारा प्लस टू रांची से था, परन्तु हम  पटना से चढ़ रहे थे…ज्यादा भीड़ नहीं थी. वरना बिहार कंबाइंड एग्जाम के एक दिन पहले ट्रेवल करना बिहार में काफी रोमांचक अनुभव होता है…उतनी भीड़ और मारा-मारी देख कर तो मुंबई के लोकल वाले भी हाथ जोड़ दें.
शाम के छे बजे के आसपास भागलपुर पहुंचे. स्टेशन पर लोग पहुंचे हुए थे लेने के लिए. रिक्शा पकड़ के ‘खंजरपुर’ के लिए  रवाना   हुए. घबराइए मत,  इतना खतरनाक नाम वाले इलाके के लोग  बड़े स्नेहपूर्ण एवं आत्मीयता से भरे हुए थे. पहुँचते ही कचौड़ी-भुजिया सामने रख दिया गया जो हम छे घंटे के भुखायल…दो मिनट में सफाचट कर दिए. आधे घंटे बाद घर के मुखिया देखने आये की कौन लड़का आया है पटना से. बातों बातों में हमने अपने दादाजी का नाम बताया जो सुनकर उनकी बाछें खिल गईं.
‘आप तिवारी जी के पोता हैं…ओ -हो-हो…रहिये, हम आते हैं’
दादाजी के अच्छे कर्मों का फल आज उनके  ज्येष्ठा पौत्र को मिलने वाला था. मुझे ऊपर परिवार के डाइनिंग हॉल में बुलाया गया. फिर सामने एक पता नहीं कितना ‘खण्डों’ वाली थाली रख दी गई. आलू- परवल की मसालेदार सब्जी के साथ ओलिंपिक के रिंग जैसी सजा के रखी कचौड़ियां…हमने किसी तरह उनके स्नेह और सत्कार का आदर करते हुए वो थाली साफ़ कर दी. मगर तभी थाली के दोनों साइड में दो कटे हुए दूधिया मालदह आम लेकर रख दिए गए. अगर आपने कभी दूधिया मालदह आम नहीं देखा तो बस इतना समझिए की इस आम को शायद ये ग़लतफ़हमी है की वो आम नहीं कटहल है…कम से कम साइज के मामले में. मैंने थोड़ा सा विरोध किया…
‘जी अब ये आम नहीं खा सकते हैं…जगह नहीं हा पेट में’
इस नीचे वाले वाक्य को कृपया भगलपुरिया एक्सेंट में पढ़ें…हल्का सा सुर और रस मिलाकर-
‘संकोच काहे करते हैं…आप तो जवान लड़का हैं जी…आपको नै पचेगा तो किसको पचेगा…हमलोग जब आपके जितना थे तो ऐसा दस-दस आम खा जाते थे और डकारो नै लेते थे’
हमने दोनों आम खा लिए.
अगले दिन एग्जाम था. सुबह सुबह दही-चूड़ा खा के निकले. रास्ते में एक बड़ी आलिशान इमारत दिखी. पूछने पर पता चला की ये JNMCH की बिल्डिंग थी. इतनी सुन्दर ईमारत…एक बार तो इच्छा हुई की आज फिजिक्स-केमिस्ट्री–मैथ के साथ बायो भी दे ही डालते हैं…फिर यहाँ आकर पढाई करेंगे.
हमारा ‘विक्रम’ आगे बढ़ा…एक और कॉलेज…’भागलपुर कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग’. साथ में जो चाचाजी थे उन्होंने हंस कर कहा-
‘देखिये हो सकता है यहाँ एडमिशन हो जाए आपका’
मैंने देखा…एक पतली से सड़क…जिसके दोनों तरफ पानी से लबालब मैदान…सड़क जाकर एक बड़े से ईमारत पर खत्म होती थी…जो की दूर से देखने पर टापू के जैसा लगता था.
‘बाप रे, यहाँ पढ़ने के लिए तो पहले तैरना सीखना पड़ेगा’
सेंटर पर पहुंचे. पहला पेपर फिजिक्स का था…ठीक ठाक हुआ. दूसरा केमिस्ट्री का था…पेपर देखते ही मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा…बीस में से उनीस सवाल बनते दिख रहे थे…लगभग दस सवाल कर लिए होंगे तभी लगा की पेट में कुछ हल-चल हुई. धीरे धीरे वो हलचल आक्रामक रूप धारण करने लगी…बीती रात जो भरी भरकम ‘चेक’ हमने अपने पाचन-तंत्र बैंक में जमा किया था…उसके  क्लीयरेंस का समय हो गया था…फुल लिक्विडेशन के साथ. हम अपने केमिस्ट्री के सवालों को सॉल्व करते हुए अपनी बड़ी अन्तरि के रैपिड-फायर राउंड को भी किसी तरह हैंडल कर रहे थे…किसी तरह पेपर खत्म हुआ…भागे- भागे बाहर आये मगर किसी को टॉयलेट का लोकेशन पता नहीं…सब तो बाहर के ही लोग थे वहां. टीचर लोग तो पेपर जमा करके चम्पत हो गए थे.

तभी एक रांची के ही मित्र ने पुदीन हरा की एक पट्टी पकड़ा दी…दो गोलियां खाईं…पेट के अंदर लगा जैसे किसी उपद्रवी भीड़ पर अश्रु-गैस का गोला छोड़ दिया गया हो…कुछ ही देर में शान्ति छा गयी. अभी मैं आराम से बैठा ही था की चाचाजी टिफिन लेकर आ गए. बेचारे वो तो अपने तरफ से जितना बन पड़ रहा था उससे ज्यादा कर रहे थे…इसलिए मैंने उनसे टिफिन ले लिया…फिर अपने रांची से आये दोस्तों को सुपुर्द कर दिया, चाचाजी के जाने के बाद.

एग्जाम तो ठीक ही गया…इसी एग्जाम के फल-स्वरुप फिर हमने बाद में BCE पटना में एडमिशन भी पाया था. वापस खंजरपुर पहुंचे…अब कोई टेंशन नहीं था…तो अपने एक हम-उम्र युवक से साथ घूमने निकल गए. एक बड़ी अच्छी बात नोटिस की हमने…खंजरपुर में सड़क पर हमारे साथ और लड़कियां भी टहल रही थी…पटना में लड़कियां सड़क पर नहीं टहलती थी उन दिनों.  वो या तो कोचिंग अथवा मार्किट के लिए ही घर से निकलती ही. सड़क पर बेवजह भटकने का जिम्मा हमारे जैसे निहायती शरीफ लड़कों का था. पूछने पर हमारे लोकल युवक ने एक महत्वपूर्ण कारण बताया…’भागलपुर के युवक क्या करेंगे वहां…सब या तो पटना या दिल्ली जाकर कोचिंग/पढाई कर रहे हैं’
ये विडंबना तो पूरे बिहार को अपनी चपेट में लिए हुए है. राजनेता लोग तो अपने बच्चों को पास में रखने के लिए उनको मिनिस्टर/एम-एल-ऐ बना लेते हैं…बाकि लोग क्या करेंगे…पढाई फिर नौकरी, बिहार के बाहर ही होगी.
हमलोग वापस उनके घर पहुंचे…बिजली चली गयी…छत पर फिर काफी गप्पे चली…बड़े ही निश्छल उत्साह के साथ मुझे ये बताया गया की उस  छत से  एस- एम महिला कॉलेज दीखता था. भगलपुिया  टोन में गप्प करने में कुछ ज्यादा मजा आता है.
खैर, अगले दिन हमारी वापसी थी…फिर से विक्रमशिला पकडे…जनरल टिकट लेकर आराम से स्लीपर में बैठे थे. टी-टी साहब आये…सामने बैठे एक लड़के के पास टिकट नहीं थी…मैंने सोचा शायद जल्दी में होगा…मगर बड़ा मजेदार वार्तालाप हुआ उसका टी-टी साहब के साथ…
‘टिकट क्यों नहीं लिए जी’
‘पप्पा को सैलरी नहीं मिला है छौ महीना से’
‘अच्छा…टिकट के लिए पैसा नहीं था…तब ये  नया नया जूता कैसे खरीद लिए’
‘ अब सैलरी नै मिलेगा तो क्या हम लंगटे घूमेंगे’
टी-टी बाबू समझ गए की इस हाजिर-जवाब भगलपुरिया छात्र से बहस बेकार है…वो आगे बढ़ गए.
और मैं विक्रमशिला की शयन-यान श्रेणी में हिलता डुलता वापस पटना पहुँच गया.
मौका लगा तो फिर से चक्कर मारूंगा…और ज्यादा अच्छे से देखूँगा असली भागलपुर को. वहां के जितने लोगों से इंटरेक्शन हुआ है कम से कम उस बेसिस पर तो यह कह ही सकता हूँ की जिस जगह के लोग इतने स्नेहशील और विनोदपूर्ण हैं…वो जगह भी उतनी ही आनंददायक होगी.

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