इस बार, राँची की यादें

दो साल राँची में रहे थे…प्लस टू करने के लिए…डी-ए-वी श्यामली (मेकोन) से. यहाँ ये बताना ज़रूरी है की धोनी हमसे दो साल जूनियर था, उसी स्कूल में . हम उसका वो मॅच लाइव देखे थे हरमू  ग्राउंड में जिसमे उसने एक चालीस ओवर के इंटर -स्कूल मॅच में दो सौ सोलह रन बनाए थे…जी हाँ 216 नोट आउट. अगले दिन प्रभात खबर के लास्ट पेज में उसका वोही स्माइलिंग फेस वाला फोटो छपा था. राँची की और भी कई यादें पेशे-खिदमत-
1. पटना- राँची डिबेट- वैसे तो मेरा अफीशियल ननिहाल मुज़्ज़फ़्फ़रपुर है, मगर नानी-घर के बहुत लोग राँची जाकर बसे हुए हैं. जब किसी मौसी या मामा की शादी में पूरा कुनबा  मुज़्ज़फ़्फपुर में जुटता, तो हमारी राँची के मौसेरे-ममेरे भाई बहनों से खूब  बहस होती की आख़िर पटना और राँची में बेहतर कौन?
‘राँची में है क्या? एक मेन-रोड है बस…उसके एक एंड पर ‘फिरायालाल’ है…ठीक है, माने की उसका सॉफ्टी बेजोड़ होता है…मगर नाम कैसा रखा है…लुडो खेलते हुए रखा था क्या?’
‘तुम लोग के  पटना में तो नाव चलता है रोड पर बारिश के सीज़न में ‘
‘बिसकोमान भवन देखे हो? एकईस तल्ला का है…राँची में चारो तल्ला का है कोई बिल्डिंग?’
‘राँची में अपोलो हॉस्पिटल है’
‘पटना में गोलघर है, कुम्हरार है’
‘रांची के पास हुंडरू, जोन्हा, दशम फाल्स है’
जब पटना के फेवर में सब कुछ फ़ैल हो जाता था तो हम ब्रह्मास्त्र छोड़ते थे,
‘पटना में दुनिया का सबसे लम्बा पूल है…रांची में क्या है…दुनिया का सबसे बड़ा पागलखाना?’
इस बहस का कभी अंत नहीं होता था. वैसे रांची को नीचा दिखने का कोई मौका नहीं छोड़ने वाले इस पटनिया को जब कलकत्ता में किसी ने मजाक में बोल दिया था की ‘रांची में तो सब पागल रहते हैं’, तो उसने भी  कलकत्ता वासियों की तुलना एक बहुत ही ‘मेहनती’ पशु से कर दी थी…बड़ी मुश्किल से पिटाते पिटाते बचे थे.

रांची के स्कूल-
रांची के दोनों बड़े स्कूल नब्बे के दशक में सुपर थर्टी जैसी ख्याति प्राप्त किये हुए थे. भर भर के लड़का लड़की सब आई-आई-टी फोड़ता था DAV श्यामली और DPS से. ऐसा नहीं था की यहाँ के टीचर बहुत बेजोड़ थे जो अपने भयंकर नॉलेज बेस और टीचिंग तकनीक से आपके ज्ञान-चक्षु खोल डालते थे. वो बस इतना करते की क्लास में अटेंडेंस के बाद, स्टूडेंट उनका लेक्चर छोड़ कर अगर ‘ब्रिलियंट’ का असाइनमेंट बन रहा है, तो उस बात से उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती थी. कई टीचर तो पढ़ाने का भी कष्ट नहीं करते थे.
रांची का मेन IITian फैक्ट्री था कोचिंग सब. उस समय एक श्रीनिवासन मैडम थी…आप विश्वास नहीं करियेगा की उनके कोचिंग का अपना JEE  होता था. और DAV जैसा स्कूल उनको अपने प्रेमिसेस में उस JEE को कंडक्ट करने की अनुमति देता था. मैं जब उनसे फॉर्म लेने गया तो बड़े रूखेपन से मुझे बता दिया गया की लास्ट डेट जा चूका है.
जब श्रीनिवासन मैडम के एंट्रेंस एग्जाम का रिजल्ट आया था तो सिलेक्टेड छात्र ऐसे खुश हो रहे थे मानो IIT में टॉप हंड्रेड में रैंक आ गया हो. वैसे वो अलग बात है की उनमे से दो को बाद में टॉप हंड्रेड में रैंक आ भी गया था…एक तो टॉप टेन में था.
मगर रांची के कोचिंग छोटे छोटे थे…मुश्किल से १०-१२ छात्रों का बैच चलता था. पटना जैसा भेड़िया- धसान नहीं होता था कहीं भी. हम एक बार आनन्द सर के नया टोला वाले कोचिंग में गए थे…जब वो लाउडस्पीकर पर क्वाड्रटिक इक्वेशन समझाने लगे तो मुझे बड़ा अचम्भा हुआ था.
रांची में धोनी-
जैसा मैंने पहले बताया की धोनी भले मुझे नहीं जानता हो, मैं धोनी को बहुत अच्छे से जानता था. उसके बारे में और बताये बिना रांची का स्टोरी पूरा नहीं होगा. उसको लोग इंटर- कालोनी की क्रिकेट मैच में बतौर गेस्ट प्लेयर लेकर आते थे, उन दिनों में उसका रेट ज्यादा नहीं था. अशोक-नगर के  ग्राउंड में बहुत बार उसने मेरे मामा लोगों की धुनाई की थी…एक बार तो अगले सिक्सर का डायरेक्शन बता बता कर एक ही ओवर में पांच सिक्सर मारा था.
रांची के घर- अगर आप सबको याद हो, पशुपालन घोटाला का केंद्र-बिंदु रांची ही था. अशोक-नगर और आस-पास के इलाकों में आपको ऐसे ऐसे घर देखने को मिल जायेंगे जिसके सामने दिल्ली का GK या वसंत विहार जैसे इलाकों के घर भी फेल कर जाएं. हम कुछ दिन ऐसे ही एक घर में किराए पर रहे थे…कार्बन का मेटामॉरफोसिस होता है तो वो डायमंड बनता है…भैंस का चारा और गाय का खल्ली का जब मेटामॉरफोसिस होता है तो फुल मार्बल फ्लोरिंग और बाथ-टब वाले बाथरूम से लैस घर बनते हैं. बाकि तो आप समझ ही रहे हैं .
रांची में एडवेंचर-
१.पर्वता-रोहन – घर के पास ही एक छोटी से चिकनी पहाड़ी थी…ऐसा लगता था की बेल का बड़ा सा फल हो…हमलोग जोश में एक बार ऊपर चढ़ गये…बड़ा अच्छा नजारा दिखा था. फिर नीचे उतरते समय हमारी फट गयी थी…पतलून…क्यूंकि हम बैठ कर… हर सेकंड भगवान को याद करते  हुए…धीरे धीरे ससरते हुए नीचे आये थे.
२. ट्रेक्किंग- हमारा NDA के रिटेन में हो गया था. लोगों ने कहा की अब अपना फिजिकल फिटनेस बढ़ाओ…स्टैमिना बढ़ाओ ताकि SSB में सेलेक्ट कर ले. हमने इन सब बातों को बहुत सीरियसली लिया. इसलिए एक बार जब सुबह सुबह पटना से रांची पहुंचे थे…रातू रोड पर बस रोका था. हमने सोचा की अशोक-नगर जो की रातू रोड से शायद दस किलोमीटर की दूरी पर होगा…पैदल ही जायेंगे…ट्रेक्किंग हो जाएगी. कंधे पर भारी बैग भी था. कुछ दूर तो आराम से चले…फिर वो एरिया क्रॉस करना था जहाँ रांची का शमशान घाट है. अगर आप एक मनुष्य हैं जो सुबह सुबह एक बैग टांग कर पैदल जा रहा है तो कुत्ते आपके  इस हेल्थी इनिशिएटिव से  काफी इम्प्रेस होते हैं . इतने इम्प्रेस होते हैं की भौंक भौंक कर आपसे अपनी ख़ुशी का इजहार करने लगते हैं…कुछ कुत्ते तो पास आकर आपकी जांघ  भी थपथपाने की कोशिश करते हैं…अपने जबड़े से. जो कुत्ते मजे में सो रहे थे…वो भी उठकर आपकी वाह-वाही में अपनी आवाज़ बुलंद करने लगते हैं. आपको जो कुछ देर पहले तक हल्का सा प्रेशर मार रहा था…वो अब शायद बड़ी अंतरी से निकल कर आपके लीवर में घुस गया है…आप चुप चाप चल रहे हैं…किस भगवान का नाम लें ये भी समझ नहीं आ रहा…एक बार तो लगता है की ये कुत्ते आपको अपने उत्साह  में सराबोर करके, मिल- बाँट के खा लेंगे फिर यहीं शमशान घाट में क्रिया-करम भी कर देंगे. कम से कम बीस कुत्ता होगा मेरे पीछे…मैं बिना बांसुरी बजाये ही पाईड पाइपर ऑफ़ रांची बन गया था…जिसके पीछे चूहों की बजाय कुत्तों का हुजूम चल रहा था. मगर तभी उनका इलाका खत्म हो जाता है और धीरे धीरे आपकी सांस वापस आ जाती है. तब शायद पहली बार आपको समझ आता है की रद्दी जमा करने वाले गरीब लड़को को कैसा लगता होगा…रोज़.
३. प्रैंक- कॉल्स- ज्यादा टाइम तो पढाई लिखाई ही करते थे…कभी कभार थोड़ी बहुत मसखरी भी कर लेते थे. एक बार घर में सिर्फ बच्चे लोग ही थे. एक बच्चे के पास उसकी कक्षा में पढ़ने वाली एक बहुत ही ‘इंटेलीजेंट’ लड़की का फ़ोन नंबर था. हम थोड़ा मिमिक्री अच्छा कर लेते हैं…सो हमें सोचा थोड़ा प्रैंक कॉल करते हैं-
‘हेलो’
‘हाँ जी हेलो…मैं जतिन बोल रहा हूँ…ज़ी टीवी के प्रोग्राम हेलो ट्रिंग ट्रिंग से…दीजिये एक आसान सवाल का जवाब और जीतिए इनाम…आप रेडी हैं?’
‘हाँ हाँ…पूछिए’
‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा…किस फिल्म का गाना है’
‘१९४२ आ लव स्टोरी’
‘सही जवाब…आपको मिलता है DONEAR  सूटिंग की तरफ से दो हज़ार का गिफ्ट वाउचर…एड्रेस बताएँगे’
उन लोगों ने अपना पूरा एड्रेस चहकते हुए बताया…
‘कब तक आ जायेगा’
‘पंद्रह दिनों के अंदर…आपके पार्टिसिपेशन के लिए धन्यवाद’
वैसे अगर खुदा न खास्ते उस परिवार का कोई अगर ये पोस्ट पढ़ रहा है तो ‘सॉरी’.
रांची तो अब बहुत बदल गया है…धोनी का बहुत बड़ा हाथ रहा है…रांची के एयरपोर्ट के सामने पटना का एयरपोर्ट किसी मीटर गेज लाइन का पुराना स्टेशन लगता है…मस्त स्टेडियम भी बनI दिया है…फाइव स्टार होटल खुल गया है.
पटना में भी बहुत कुछ अच्छा हो रहा है. उम्मीद है दोनों शहर प्रगति पथ पर अग्रसर रहेंगे.
जितना रांची हम देखे…और जितना हमको समझ में आया…पटना और रांची का रिश्ता दो भाईयों का था…पटना..थोड़ा हीरो टाइप…थोड़ा अस्त-व्यस्त…थोड़ा अडवेंचरस…थोड़ा कोन्सेर्वटिव…गवर्नमेंट स्कूल में पढ़ने वाला बड़ा भाई…और रांची…थोड़ा साफ़-सुथरा ड्रेस पहने हुए…बाल अच्छा से सेट किया हुआ…लीक पर चलने वाला…थोड़ा लिबरल…थोड़ा मॉडर्न…कान्वेंट स्कूल में पढ़ने वाला छोटा भाई.

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