पटना का फ़ूड सीन

आजकल पटना में बड़ा बड़ा रेस्टोरेंट खुल गया है…डोमिनोस से लेकर के-ऍफ़-सी…हल्दीराम से लेकर पिज़्ज़ा-हट…बहुत सारा चॉइस हो गया है पटना वासियों को. एक तो घूमने वाला भी रेस्टोरेंट खोल दिया है…खाते वक़्त तो उतना पता नहीं चलता…जब बिल लाता है तो ज़रूर आपका माथा घूमने लगता है. जब हम पटना में थे, उस समय उस समय इतना चॉइस नहीं था…फिर भी हमारे जैसा ‘फूडी’ अपना काम चला लेता था. उसी का एक परिचय-

पटना के रेस्टोरेंट –  सबसे फेमस रेस्टोरेंट में था ‘बसंत विहार’…’राजस्थान’…’मेफेयर’…’पॉल’…’मक्रॉनल्ड’…सब में कम से कम एक बार तो चक्कर लगा ही था. बसंत विहार में लेकिन ज्यादा बार दर्शन दिए थे…जू से लौटने के रास्ते में भी पड़ता था. ऊपर से अगर मौर्या लोक में घुमते घुमते भूख लगा गया और ऐ-सी में बैठ के खाने की इच्छा है तो टहलते हुए पहुँच जाइये. मस्त डोसा खिलाता था….एक बार हम अपने कुछ दोस्त लोग के साथ चले गए थे. एक मित्र की फरमाइश पर हम सब ने शायद ज़िन्दगी में पहली बार ‘पेपर मसाला डोसा’ आर्डर किया था. अगर आपने ये डोसा नहीं खाया है कभी, तो मैं इसे आजमाने की हिदायत नहीं दूंगा. जब लेकर आया तो हमें अपनी गलती का एहसास हुआ…कम से कम चार फ़ीट का लम्बाई होगा डोसा का….राकेट लांचर के जैसा. हमलोग के टेबल पर गिलास रखने का भी जगह नहीं बचा था. रेस्टोरेंट में बैठे बाकी लोग हमारी और देखकर मजे ले रहे थे…’ज्यादा तेज़ बन ने चले थे, खाओ अब’ . फिर हमने भी लोक-लाज की चिंता छोड़ कर उस पेपर डोसे को बिस्कुट की तरह तोड़ तोड़ कर सांभर और चटनी में बोर-बोर के खाना शुरू कर दिया.
जब पहला बार वेटर कटोरा में गरम पानी और निम्बू लेकर आया था हमारे लिए…तो हम उससे चीनी मांगते मांगते रह गए थे. हमको लगा था की शायद पचाने के  लिए गरम पानी का नीम्बू शरबत लाकर दिया है. एक मित्र की थोड़ी शहरी वातावरण से अनभिज्ञ चाची ने तो वेटर से अनुनय भी कर दिया था… ‘अब ई न पीयम’…जब बाकि लोगों की हंसी थमी तब उन्हें बताया गया की ये हाथ धोने के लिए दिया है.

स्ट्रीट फ़ूड- हम कंकरबाग में रहते थे…इसलिए उसी एरिया का स्ट्रीट फ़ूड पे ज्यादा फोकस रहेगा.

चाइनीज फ़ूड- राजेंदर नगर ओवर-ब्रिज के कंकरबाग वाले एन्ड से पश्चिम के तरफ, एक फ़ास्ट फ़ूड वाला बहुत दिनों से डेरा जमाय हुए है. उसका नाम ‘हंगरी हॉप’ है या ‘हंगरी’स  होप’ ये क्लियर नहीं है…पर इतना पता है की भले ही आप कितना ही हंगरी क्यों न हों, इसके खाना से ज्यादा होप मत रखिये. उसके लिए चाइनीज का मतलब है खूब सारा सोया सॉस और कॉर्न-फ्लौर. फिर भी चूँकि उस समय इस एरिया में और कोई चाइनीज फ़ूड वाला नहीं था, हमलोग मन मार के इसी के यहाँ पहुँचते थे. घर में कोई स्पेशल ऑकेजन हुआ, और मम्मी लोग को गर्मी में खड़ा होके नॉन-भेज बनने का मूड नहीं है, तो हम लोग को दौड़ा दिया जाता था. हंगरी हॉप के ठेला पर भी लोग चाउमिन बनते हुए ऐसे गौर से देखते जैसे कल उन्हें अपना ठेला भी लगाना हैं.  वैसे उसका बोनलेस चिकन असल में चिकनलेस भी होता था…कॉर्न-फ्लौर के बॉल के अंदर कभी कभार गलती से डाला हुआ चिकन मिलने पर हमें लगता था की पैसा वसूला गया. भागते भूत की लंगोटी आपको भले पकड़ा जाये (वैसे आप दुसरे की लंगोटी का करियेगा क्या?) मगर कॉर्न-फ्लौर के गोले के अंदर चिकन का टुकड़ा मिलना आपके पिछले जनम के अच्छे कर्मों पर निर्भर करता था. ऊपर से ये ओपन- एयर फ़ूड स्टाल था…आप का साथ देने के लिए कुछ बिन बुलाए मेहमान भी पहुँच जाते थे…कुत्ते…वो भी मोटे- तगड़े. वो आपसे कोई आग्रह नहीं करते थे…बल्कि हक़ से मांगते थे…मानो आप प्रिया गोल्ड बिस्किट खा रहे हों. ऐसे घूरते रहते, मानो कह रहे हों  ‘चुप-चाप, दो पीस गिरा दो नीचे…नहीं तो ऐसा हबकेंगे की ये  लइकियन सब के सामने फोर्क से नूडल्स खाना भूल जाओगे’.

लिट्टी-चोखा- बिहार का लोकल स्नैक्स…बहुत ही स्वादिष्ट और हेल्थी फ़ूड. कंकरबाग टेम्पो-स्टैंड पर एक चौकी-छाप दुकान में मस्त लिट्टी बेचता था…लिट्टी से ज्यादा स्वादिष्ट उसका चना का सब्जी रहता था. फ्रेसर रोड में भी टाइम्स ऑफ़ इंडिया के नीचे एक ‘पतली’ सी दुकान थी…उसका भी लिट्टी-चोखा फेमस था.

चिनिया-बादाम-  ठेला पर लेकर रोज़ शाम में टुन्न -टुन्नाते हुए सब पहुँचता था. हम लोग तो मूंग-फली से ज्यादा उसके साथ मिलने वाले काला-नमक का लालच रहता था. ऊपर से अगर सौ ग्राम खरीदाया तो मम्मी को हम दोनों भाईयों में बराबर बांटने का असम्भव प्रयास करना पड़ता था ,’ उसको ज्यादा मिला है…काउंट करो तो…तुम्हारा वाला सब ज्यादे बड़ा बड़ा है’…परेशां होकर सौ ग्राम के जगह, दोनों भाई लोग के लिए पच्चीस पच्चीस ग्राम का अलग पैकेट बनता खरीदते समय ही. और अगर ‘लाइन’ कटा हुआ में अँधेरा में खा रहे हैं और कोई ख़राब वाला मूंग-फली फांक लिए…तो उसका वो सड़ा हुआ कसैला स्वाद फिर तीन गिलास पानी और बॉर्न्विटा फांकने पर भी नहीं जाता था.

जूस वाला- हमको आजतक एक बात समझ में नहीं आया…संतरा काफी महंगा मिलता था…करीब साठ-सत्तर रुपये किलो जब तक हम थे वहां. एक किलो में सात-आठ संतरा आता था…मगर जो जूस बनाता था वो भी कम से कम पांच-छे संतरा यूज़ करता था…मगर एक गिलास का सिर्फ पंद्रह-बीस रूपया चार्ज करता था. बाद में सुनते थे की सब इंजेक्शन से पानी घुसा देता है…फिर समझ में आया की ये ठेला सब नर्सिंग होम सब के पास क्यों लगाता है. कम्पाउंडर – नर्स सब आके नारंगी पर ही सुइया देने का प्रैक्टिस कर लेते होंगे…विन-विन सिचुएशन.

फोकचा वाला – काफी रिसर्च और ट्रायल एंड एरर करने के बाद, कोई बढ़िया फोकचा वाला पकड़ाता था…जिसका फोकचा का साइज…आलो-मसाले की मात्रा और इमली पानी का स्वाद…तीनो पैरामीटर टॉप नौच हो. वैसे गज़ब का स्किल था फोकचा वाला सब में…हम लोग फिजिकल केमिस्ट्री में एक कांसेप्ट पढ़े थे ‘आईटेरशन’…जिसमे  अलग अलग अनुपात में केमिकल मिला कर, सलूशन की एसिडिटी पता किया जाता था. लगभग उसी कांसेप्ट का इस्तेमाल होता था इमली पानी के खट्टापन और तीखापन  को रेगुलेट करने में…जो की ये फोकचा वाला सब गज़ब का कंट्रोल के साथ करता था. एक ग्रुप बोलता ‘पानी खट्टा नहीं  लगा रहा है’…दूसरा ग्रुप बोलता ‘थोड़ा और  तीता कीजिये’…फोकचा वाला एक दम सही मात्रा में सामग्री दाल कर ऐसा सलूशन बनता की सब लोग खाते खाते गिनती भूल जाते और पांच रूपया का दस के जगह…आठे फोकचा खाकर टाइट हो जाते. फिर लास्ट में सूखा वाला फोकचा…अगर नहीं खाये तो समझिए की आगरा घूम लिए और ताज़े महल नहीं देखे.
मगर जिन लोगों को हाइजीन का कीड़ा था उनके लिए तो फोकचा खाना किसी टार्चर से कम नहीं होगा…फोकचा वाला उसी हाथ से बर्तन धोता…आलू -मसाला बनाता…पानी को मिलाता…फिर फोकचा फोड़ के…हड़िया  में हाथ घुसा कर आपके ‘रीसाइकल्ड’ पत्तल के दोंगे में एक पानी टपकाता हुआ फोकचा पेशे-खिदमत कर देता. आप यही उम्मीद करते की शायद उसकी बासी आलू के कीड़े और उसके गंदे पानी के कीड़े  आपस में लड़ कर मर जायेंगे और आपको कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा.

क्या कहें…इतना मजेदार मजेदार चीज़ सबके बारे में लिखकर मुँह में पानी आ गया है…शायद आपके मुँह में भी आ गया हो. इस वीकेंड पिज़्ज़ा-बर्गर के जगह, कहीं पपड़ी-चाट और बेल का शरबत मार के आइएगा…अपने शहर का असली स्वाद कभी नहीं भुलाता  है.

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