पटना की गर्मियां – बिजली और पानी

एक समय था जब पटना में लगभग सभी घर, सप्लाई के पानी पर निर्भर थे.  बहुत काम ही घरों में बोरिंग ये कुआँ की व्यवस्था थी. पटना के हर इलाके में एक ऊंची पानी की टंकी बनायीं गयी थी. नीचे एक बड़ा सा मोटर भी लगा हुआ था. बाकि कालोनियों का तो पता नहीं, कंकरबाग के पि-सी -कालोनी  में किसी एलियन स्पेस-शिप के जैसी खड़ी पानी की  टंकियां, हाथी के बाहर वाले दांतों से भी ज्यादा यूजलेस निकली. सप्लाई करने वाले सीधा पंप का इस्तेमाल करते थे…टंकियों का शायद ही कभी पानी स्टोर करके असली यूज हुआ हो. इसका सीधा मतलब यही निकलता था की अगर बिजली गयी…तो पानी भी गया. ये कष्टदायक समस्या बहुत दिनों तक हमें झेलनी पड़ी थी…जब तक जॉन्डिस के आउट-ब्रेक के बाद, हमारी कालोनी  का हर घर पानी के मामले में आत्म- निर्भर नहीं  हो गया.
पिताजी अख़बार पढ़ते हुए सुबह सुबह अनाउंस करते…’बिजली विभाग का नोटिस आया है…आज दस  से पांच लाइन कटा रहेगा’. पेसू यानि पटना इलेक्ट्रिक सप्लाई अंडरटेकिंग…जिसको लगता है की अंडरटेकर टाइप का लोग सब चलाता था, हर  अख़बार में ये नोटिस यदा-कदा  पब्लिश करता रहता. ये सुनते ही घर में हडकम्प मच जाता…’सब कोई नहाओ जल्दी जल्दी…मोटर चला दो फिर से…सारा बाल्टी,टब,कड़ाही, तसला, लोटा, गिलास , कटोरा भर लो…वाशिंग मशीन भी चला दो…’ पौने दस तक पूरा घर नहा-सोना के पाउडर मार के टाइट…दस बज गए…साढ़े दस…एगारह…पंखा अभी भी पांच पे मजे में नाच रहा है…’लगता है आज नहीं कटेगा…इस एरिया का नाम दिया था अख़बार में?’  सच में  हम को एक बार का भी नहीं याद है जब अख़बार में नोटिस आया हो और उसी दिन लाइन कटा हो. लाइन कटता था दो दिन बाद…’ये नौ बजे सुबह लाइन तो कभी कटता नहीं था?’…’आ जायेगा पांच मिनट में…गलती से काट दिया होगा’ जब एगारह बजे तक लाइन नहीं आता …’जा…पानी तो खत्म…कैसे नहाएंगे अब?’ …’दो दिन पहले जो पानी जमा किये थे उसी से कौवा स्नान कर लो’.
रूटीन से रोज़ लोड-शेडिंग होता था. हर एरिया का टाइम फिक्स. घर में खाना बन कर तैयार रहता था…फिर सब लोग एक बहुत ही अनरोमांटिक सा कैंडल लाइट डिनर करते.
फिर भोरे भोरे चार बजे आंधी आती थी कभी कभार…नींद खुलती थी खिड़कियों की आवाज से…तब तक रूम में एक किलो धुल भर चुका होता. बाहर सोने वाले लोगों पर लेकिन क्या बीतता होगा…एसपशली जो लोग लुंगी में सोते थे. खैर…अगले दिन पता चलता की जहानाबाद में हाई टेंसन वाला टावर गिर गया…अब हफ्ता भर निश्चिंत होकर अठारवीं  सदी के  जीवन का आनंद उठाएं…बिना बिजली के. पानी के लिए चांपा-कल की खोज की जाती और फिर एक वाटर सप्लाई चेन का गठन किया जाता.
मगर उस समय की ये कमियां ही थी जो हमारे परिवारों और पड़ोसियों को एक दुसरे से जोड़ कर रखती थी. अब तो इनवरटर और जनरेटर लगभग हर घर में लग गया है…बिजिली जाने के बाद जो सोशल नेटवर्किंग होती थी वो आजकल फ़ोन/टेबलेट/लैपटॉप पे ही लोग बैठे बैठे ही कर लेते हैं. पर  मई की रात की गर्मी में, आँगन में बेंत वाला कुर्सी पर बैठ कर सिनेमा से लेकर क्रिकेट जैसे टॉपिक पर डिबेट करने में जो मजा आता था, वो शायद पता नहीं फिर कभी आएगा की नहीं.

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