पटना का फेफड़ा- संजय गांधी जैविक उद्यान

पटना का फेफड़ा- संजय गांधी जैविक उद्यान
संजय गांधी के बारे में आपके जैसे भी विचार हों, उनके नाम से सजने का सौभाग्य पाने वाले इस जैविक उद्यान का उल्लेख होने पर पटनावासियों के मन में सकारात्मक एवं प्रसन्नता के भाव ही प्रकट होते हैं. पटना में अगर आप पले बढे हैं तो कम से कम दस बार तो चक्कर मारे ही होंगे…उम्र के अलग लग पड़ाव पर…अलग अलग ग्रुपिंग के साथ.
लोकेशन- पटना का प्लानिंग सच में किसी महापुरुष ने ही किया होगा…सामान्य लोगों की बस की बात नहीं है ऐसे कॉम्बिनेशन बनना….सेंट्रल जेल के सामने रेलवे स्टेशन…एशिया के सबसे बड़े सूखे तालाब में एशिया की सबसे बड़ी कॉलोनी…और एयरपोर्ट के ठीक बगल में ‘चिड़ियाघर’. जी नहीं…ज़मीन की कोई कमी नहीं थी…कमी थी शायद प्लानिंग करने वालों के दिमाग में ‘ग्रे-मैटर’ की. खैर जो कर दिया सो कर दिया…अब हमको समझ में आया की जानवर सब ऐसा निढाल क्यों दिखता था…जंगल के शान्ति में रहने वाले जानवर के माथा पर से आप हर घंटे, पांच पांच हवाई जहाज निकालिएगा तो क्या ख़ाक सोएगा वो सब.

जानवर – गेट # १ से अंदर घुसते ही सबसे पहले लकर-बग्घा का पिंजरा था…जब देखे तो सब पिंजरा में इधर से उधर मार्च करते हुए दिखता…जैसे अपने देर से घर आने वाले नालायक बेटा का इंतज़ार कर रहा हो. उसके बगल में ‘शर्मीली बिल्ली’ का पिंजरा था…जो कुछ ज्यादा ही शर्मीली थी…हमको एक बार भी नहीं दिखी. एक-दो बार हम सोचे भी की अच्छा आईडिया है…शर्मीले जानवरों का एक जू बनते हैं…शर्मीला बाघ, शर्मीला गैंडा, शर्मिला घड़ियाल…कोई जानवर किसी को दिखेगा नहीं…फिर लगा की हो सकता है कस्टमर भी शर्मीले होकर दिखे ही ना.
आगे बंदरों का पिंजरा था..यहाँ हमेशा भीड़ होती…बन्दर कुछ ना कुछ तमाशा कर रहे होते. मुझे पिंजरे के ज्यादा पास ना जाने और जानवरों को खाना ना देने की सीख, बड़े प्रैक्टिकल एक्सपीरियंस से मिली थी. हमारे हाथ में ‘मिल्क-बिकिस’ का खुला पैकेट था…बड़े दानवीर वाले भाव से उस पैकेट में से एक-दो बिस्किट निकल कर हमने बंदरों को दिया…फिर किसी कारण ध्यान बंट गया…अचानक लगा की किसी ने हाथ पे झप्पट्टा मारा…मुड़ के देखा तो मिल्क बिकिस का पैकेट लेकर एक बन्दर चम्पत हो चुका था…मन दुखी हो गया…हाथ पर थोड़ी सी खरोंच भी आई…मगर जब एक दुसरे बन्दर ने मेरे हमलावर से वो पैकेट छीन लिया तो मन को थोड़ी सांत्वना प्राप्त हुई.

उसके थोड़ा सा आगे शेर का पिंजरा था. बड़ा कमजोर टाइप का शेर सब था. मगर था सब बदमाश…कुछ पहचान के हीरो लोग एक बार पिंजरे के पीछे चले गए थे…शेर उधर ही कोने में आराम से पड़ा झपकी ले रहा था…ये लड़के उसे गालियां निकलने लगे ,’ उठ जा बे, इतना दूर से आये हैं…तनी चल के दिखाओ…का पड़ल हो अजगर जैसा’…शेर ने कुछ देर तो उन्हें इग्नोर किया…फिर धीरे से उठा…घूमा…और अपनी पूँछ उठा कर उन लड़कों को अपनी गुर्दामृत से पवित्र  कर दिया. अगले कुछ दिनों तक उन लड़कों के कालोनी की बिल्लियां, वैसे ही  उनके आसपास मंडराने लगी थी.
शेर के बाद बाघ का नंबर आता है. इनको दर्शकों के ज्यादा पास लाने के लिए एक छोटा पिंजरा बनाया हुआ था…जिसमे इक्का दुक्का बाघ शान से बैठे रहते . एक बार हम भी अपनी हीरोपंती में रेलवे ट्रैक फॉलो करते करते बाघ पे पिंजरे के पीछे चले गए थे. तभी सामने जो दिखा वो देखकर हमारी सारी हीरोगिरी कुछ सेकंड के लिए फुस्स हो गयी थी. एक बाघ को पीछे नहलाया जा रहा था…पतली से चैन से बाँध कर. हम तो ये देखते ही ‘स्टेचू’ बन गए थे. फिर उस बाघ के हैंडलर ने हमें थोड़ा गुस्से से ही धीरे धीरे खिसक लेने का इशारा किया…हम धीरे धीरे सरक लिए, मगर उन कुछ पलों में तो हमारा ह्रदय उसी तरह धड़क रहा था जैसे हार्दिक पंड्या का धड़का होगा बांग्लादेश  वाले मैच के लास्ट ओवर में.
इसके बाद आता था सांप घर. वहां भी कांच के बने बॉक्स में से आधे में तो कोई सांप दिखता भी नहीं….जो दीखते वो चुप चाप पड़े रहते. मुझे तो अभी भी शक है की सब नकली सांप का मॉडल बना के डाले हुए था.
सबसे मस्त मुझे मगर-मच्छ लगते थे. मुँह फाड़ के  धूप सेंकते रहते…क्रिश के ‘जादू ‘की तरह.  कोई टेंशन नहीं लाइफ में.

चिड़ियाघर के मेहमान/दर्शक – वैसे तो आप चिड़ियाघर में ज्यादातर बच्चों और उनके गारजियन को चहलकदमि करते पाएंगे. मगर यहाँ जानवरों के प्रणय-क्रीड़ा के साथ साथ आप  मनुष्यों की भी प्रणय क्रीड़ा का आनंद उठाने का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं. पटना में और कोई ‘सेफ’ स्पॉट बचा ही नहीं जहाँ कोई जान पहचान वाला भेंटाने की प्रोबेबिलिटी कम हो. ऊपर से लड़का लोग का पैसा भी बहुत बचता था…मौर्या लोक ले गया तो बसंत विहार में चालीस रूपया का डोसा खिलना पड़ता…नहीं तो बंजारा फ़ास्ट फ़ूड का बोनलेस चिकन विथ हाका नूडल्स…ऊपर से विंडो शॉपिंग के बहाने, असली शॉपिंग भी हो जाती थी कभी कभी…चिड़ियाघर में ऐसा कोई खतरा नहीं था. ज्यादा से ज्यादा ‘मयूर’ रेस्टोरेंट का दो दिन पुराना, चार बार छना चुका समोसा खिला के काम चल जाता था .

सबसे तबाही लेकिन न्यू ईयर डे पे होता था. पटना में एक यही कायदे का पिकनिक स्पॉट था…सो पटनावासी पूरा झोला-झंडा लेकर पहुँचते थे….कुकर, तसला, चिकन,स्टोव…खाना भी यहीं बनता था…अब आप सोचिये की ये जानवर सबका सूंघने का क्षमता हम लोग से कितना गुना ज्यादा है…इन लोगों के तो भेजा में शार्ट-सर्किट हो जाता होगा भूंजल प्याज, गरम मसाला और बासमती चावल के सुगंध के ताबड़-तोड़ हमले से. हर साल यही सीन  चलता था….ज़रूर जानवर सबको गैस-मास्क पहना के रखता होगा.
फर्स्ट जनवरी के अलावा चिडियघर का खटिया खड़ा होता था जब कोई रैली या रैला होता था पटना में. लाखों के संख्या में आये लोगों को ठहरने के लिए चिड़ियाघर से बेहतर क्या होगा. ज़िन्दगी भर गाय-भैंस- बकरी देखने वाला सबको को फ्री में गैंडा और हिप्पो देखने को मिल जाये तो उससे बेहतर सामाजिक न्याय क्या होगा…उसके ऊपर अंदर में एक रेलवे पटरी भी है और बड़ा सा तालाब भी.

वैसे हम और भी बहुत जगह का चिड़ियाघर देखे हैं. पर पटना का चिड़ियाघर हर मायने में परफेक्ट है…इतना ही बड़ा है की आप चलते चलते मैनेज कर लेंगे. अब तो और भी नया नया जानवर सब आ  गया है तो और मजा आता होगा. सुने थे की रेल नेटवर्क का एक्सपेंशन भी हुआ था. वैसे मुझे इस चिड़ियाघर से विशेष लगाव इसलिए भी है क्यूंकि हमारे नानाजी फारेस्ट सर्विस में थे….कंजर्वेटर साहेब…वैसे मेरी पर-दादी जी उन्हें कुछ ज्यादा ही स्नेह के साथ ‘कनगोजर साहब’ बुलाती थी. उनके रहते हुए, हमें थोड़ा वि-आई-पि ट्रीटमेंट मिलता था…चिड़ियाघर शाम को बंद हो जाने के बाद, हम लोग वन-विभाग की गाडी में कई बार चक्कर मारे हैं पूरे जूलॉजिकल गार्डन का. एक बार तो बाघों के अंदर वाले पिंजरे में भी गए थे. सब बाघ आराम से बैठ कर कूलर का हवा खा रहा था. मगर ऐसी ‘बघाइन’ गंध थी उस कमरे में…आज तक मेरे नाक की नसों में बसी हुई हैं.

पटना में तो अब और भी नए पार्क और मनोरंजन के नए साधन बन गए हैं. पर्रन्तु इस जैविक उद्यान की अपनी एक जगह है हर पटनावासी के दिल में…आशा करते हैं की वो जगह बनी रहेगी, नयी पीढ़ी के दिलों में भी.

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