पटना की दुर्गा पूजा

 

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पटना की दुर्गा पूजा-

कलकत्ता के बाद हमको लगता है पटना का दुर्गा पूजा सबसे धूम-धाम से होता है. लास्ट टाइम दुर्गा पूजा में पटना में कब थे ये भी याद नही…actually दुर्गा पूजा का नंबर होली और दीवाली के बाद ही आता है बिहारी लोग के कॅलंडर में…छुट्टी लेना है तो बीस दिन बाद दीवाली का ले लेंगे…दुर्गा पूजा में कौन घर जाएगा…दुर्गा पूजा का क्रेज़ स्टूडेंट लाइफ में ज़्यादा था…एक तो दबा के छुट्टी मिलता था स्कूल-कॉलेज में…उसके उपर घूमने-फिरने की पूरी आज़ादी…

घर में पूछा जाता- ‘कहाँ जा रहे हो?’

‘आ रहे हैं राजेंदर नगर रोड # 6 से ‘देवी’ का दर्शन करके’

‘अच्छा जाओ लेकिन बाहर का अल-बल ज़्यादे मत खाना’.

हमारे कॉलोनी में भी पुरानी पानी टंकी पे, दुर्गा जी का पंडाल लगता था…’पटेल युवा मंच’ के होनहार पर्रंतु बेरोज़गार नौजवानो द्वारा…खूब चंदा उगाही होती थी…

‘क्या दादी, डॉक्टर का घर है..सिर्फ़ एकावने रुपैया’.

‘एकावन रुपया कम है जी…बाकी घर से भी लो जाके’.

साल-दर-साल दुर्गा जी का पंडाल भी बड़ा होता गया और पटेल युवा मंच का encroached land पे बनाया हुआ ‘ऑफीस’ भी. ज़्यादा-तर नौजवान लोग ‘F.O.S.L.A.’  (‘फ्रसट्रेटेड ओने साइडेड लवर’स एसोसिएशन’)के मेंबर थे, इन सब रांझानाओ की ‘सोनम कपूर’ सब खूब सज-धज के निकलती थी अष्टंमी या नवमी को. पटना में उस समय, लड़किया सिर्फ़ पढ़ाई करने घर से निकलती थी…विदाउट मेक-उप, नॅचुरल ब्यूटी में…दुर्गा पूजा में मगर उनको चान्स मिलता था ‘तैयार’ होके निकालने का. सारे FOSLAs की मानो-कामना पूरी हो जाती थी इस त्योहार में.

दुर्गा पूजा वैसे तो नौ दीनो का त्योहार है, मगर असली शुरुआत होती है शुरुआत होती है छठे दिन जब पाट खुल जाता है…समझदार लोग सप्तमी तक ही सजावट देख लेते थे और फिर परिवार के बाकी लोगो को गाइड करते ‘अलंकार की देविजी मत मिस कीजिएगा..असली जेवर डाले हुए..प्यूर गोल्ड का…और आर-ब्लॉक के सामने तो पूरा बंगाल फेल है’….अष्टमी और नवमी को शाम में घूमने की हिम्मत जिगर से बीड़ी जलाने वाले ही कर पाते थे…उन दो दिनो में पटना के सेटिलाइट टाउन्स से बहुत भीड़ आती थी…पटना का car owning मिड्ल क्लास फिर रात को चम्गादर के जैसे घूमने निकलता….मुझे याद है…हुमलोग शायद 6th में होंगे तो फर्स्ट टाइम 2 बजे उठ के घूमने निकले थे…कोई ट्रॅफिक नही…आराम से सब पंडाल घूम लिए थे…फिर वो ट्रेंड इतना पॉपुलर हो गया की दो-तीन साल में ही अष्टमी के रात के 2 बजे नाला-रोड, डाक-बंगलो, स्टेशन रोड…सब पे भयानक जाम

DAKBANGLAW KE PASS PANDAL KE PASS SARDHALUAN KI BHIR

खैर…तो मैं बता रहा थी की कैसे हम लोग भी भक्त बनके ‘देवियों’ का दर्शन करने जाते थे. भीड़ में ऐसे ही ‘अरे मनोज…अरे बिनोद’ चिल्ला के टाइम पास करना…कभी कभी मुझे लगता की सेम आदमी हर पंडाल में जाके ‘हार्दिक अभिनंदन करता है और करता ही रहेगा’ अनाउन्स करता रहता था…या शायद कोई रेकॉर्डेड टेप मिलता होगा..बस उसके आगे अपने समिति का नाम रेकॉर्ड कर दीजिए और लूप पे चला दीजिए…

किसी किसी पंडाल में क्लोज सर्किट कैमरा के साथ टीवी रखे रहता था जिसमे सामने से गुजरने वाली भीड़ का लाइव टेलीकास्ट होता रहता. उस टीवी में दिखने के लिए लोग परेशां रहते. वापस घूम के आते और किसी आरंगुटान की तरह हाथ पैर हिलाते रहते.
‘दिखे क्या? हमारा ही हाथ है ना…अरे हटिये न महाराज सामने से…फोटो आ रहा है हमारा कैमरा में’
‘काहे धक्का दे रहे हैं…एगो आपको ही फोटो खिंचाना  है टीवी में…हम का यहाँ मुँह ताके आये हैं?’
फिर कहीं कहीं किसी बदनसीब परिवार का बच्चा खो जाता जिसका अनाउंसमेंट पंडाल वाले जब तब करते रहते,
‘एक बच्चा जो पीला शर्ट और लाल पेंट पहने हुए है…और अपना नाम बंटू बताता है…पिता का नाम ‘पप्पा’ और माँ का नाम ‘बंटू की माए’…उसके माता पिता से अनुरोध है की कृपया आकर इसको यहाँ से ले जाए…साउंड बॉक्स का तार नोच रहा है’

सबसे मशहूर दुर्गा जी थी कारपोरेशन और उसके सामने की पतली सी अमरूदी गली की . अमरूदी गली में हर साल कोई स्पेशल मटेरियल की दुर्गा जी लगती हैं…कभी खोवा की…कभी मख्खन की…कभी ब्लेड की. उनको  देखने के लिए उस दस फ़ीट चौड़ी जगह में हज़ार लोग कोँचाये रहते. भीड़ केतनो रहे भाई घुस के दर्शन तो करना है एक बार. कॉर्पोरेशन के सामने से घुसिए और डॉक्टर उत्पल कान्त के क्लिनिक के सामने निकालिये. फिर रामकृष्ण  मिशन आश्रम.

पैदल चलते चलते कहाँ से कहाँ चले जाते थे हमलोग….कंकाड़बाग से मौर्या लोक कोई नॉर्मल दिन में पैदल चला जाएगा क्या…पर उस दिन…’डाक-बंग्लॉ चौराहा पे टाइटॅनिक डूबने वाला सीन दिखा रहा है रे’…’चल चल’…फिर चाट-फूचका-चोवौमेन की दुकाने…आप ऑर्डर कुछ किए….आ गया कुछ और…पर आप इतना भूखाए हुए हैं चल-चल के की आप ‘don’t care’ मोड में आ चुके हैं…उसके उपर ठेले wale के मरकरी पे नाचते हुए कीड़े…मूँह में जो ‘कच’ से किया वो बड़ी-एलाईची था या….खैर प्रोटीन ही है, निगल लो…कमिंग बॅक टू दा पॉइंट ऑफ ‘देवी-दर्शन’, एक बड़ी अच्छी चीज़ हो गयी हमारी कॉलोनी में…प्रजापिता ब्रह्माकुमारिस का एक ब्रांच था पास में ही…वो लोग लड़कियों को बिठाने लगे दुर्गा जी बना के…बस भीड़ लग गयी

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हम तो लोकल थे…बस शाम को जाके वहाँ बैठ जाया करते थे…कहीं भटकने की ज़रूरत नही है…पटना के सारे ‘अच्छे लोग’ आप के पास आ जाते थे ‘असली देविजी’ का दर्शन करने…किसी दोस्त ने प्रजापिता वालो से ‘महिषासुर’ बनने का क्वालिफिकेशन भी पूछा था…पता चला की हमलोग ‘ओवर-क्वालिफाइड’ थे. पटना उन दिनो एक बहुत ही गंदा, कंजेस्टेड, धूल-धुआँ, ट्रॅफिक से चोक्ड शहर हुआ करता था…ये कुछ पर्व ही थे जिनमे लगता था की ये शहर भी नहा-धोवा के, सज-धज के खुश हो गया है…मुस्कुरा रहा है…उमीद है वैसे दिन अब इस ‘चिल्ड-आउट’ शहर की किस्मत में ज़्यादा फ्रीक्वेंट्ली आएँगे.

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