टीवी और हमारा बचपन

टीवी और हमारा बचपन:
एक समय था जब हमारे घर में सिर्फ़ एक टीवी था…पूरी जॉइंट फॅमिली एक साथ बैठ कर देखती थी. डाइयेनोरा…12 चॅनेल वाला. उस समय पटना में सिर्फ़ एक ही चॅनेल आता भी था…उसी पे स्ट्रीट-हॉक…ही-मॅन…जंगल बुक…टेल-स्पिन जैसे कार्टून से ही हमारे जैसे बच्चे अपना काम चला लेते थे. फिर रात को साप्ताहिक सीरियल आते थे…अगर ‘लाइन’ काट गया या किसी और वजह से छूटा…तो फिर भूल जाइए…आज कल के जैसे चार बार दिन में रिपीट नहीं होता था. उस समय तो प्रोग्राम भी ऐसे बनते थे जो आप फॅमिली के साथ बैठ कर देख लें. टीवी के सामने बैठने का अधिकार पाने के पहले हम बच्चों को पढ़ाई का कोटा पूरा करना पड़ता था,
‘कितना देर पढ़ाई किया है?’
‘दो घंटा’
‘ठीक है, फिर आधा घंटा फ्लॉप-शो देख लो’
बारगिनिंग चलती थी मम्मी के साथ
‘आज ‘श्रीमान-श्रीमती’ देख लेने दो, फिर कल लाइन कटने पर भी पढ़ाई करेंगे…अंधेरा में गप्प मरने के बजाय’
कभी कभी लेकिन पढ़ाई का कोटा पूरा होने पर भी हमें टीवी से वंचित कर दिया जाता..एक बार का याद है, कोई टेस्ट-मॅच चल रहा…हमलोग सुबह पढ़ कर बड़े इतराते हुए आए और टीवी के सामने बैठ गये…’साड्डा हक़…ऐथे रख’ की भावना के साथ. पिताजी हॉस्पिटल के लिए तैयार हो रहे थे…मॅच देखते हुए…उन्हें देरी भी हो रही थी. इधर स्ट्राइक पर आए विनोद कांबली…और वो आराम से अपने ग्लव्स वापस पहनने लगे…पिताजी ने कुछ सेकेंड तो बर्दाश्त किया…फिर भड़क उठे…’इसको बहुत नवाबी छाया हुआ है…बॅटिंग करने आता नहीं है मगर नॉन-स्ट्राइकर पर ग्लव्स खोल के ही खड़ा रहना है…और तुम लोग क्या ये फालतू मॅच देख रहा है…जाओ पढ़ाई करो’
इससे पहले की हम कोई सफाई दे पाते..दोनो भाइयों को पीठ पे दो ‘धपाके’ पड़े…आज तक मैंने कांबली को उस बात के लिए माफ़ नहीं किया है.
सबसे मज़ा आता था जब कोई जॅम्स-बॉन्ड जैसे फिल्म का कैसेट आता था…प्ले करते ही पहले सीन में ही मिसटर बॉन्ड ‘प्यार-मोहब्बत’ का संदेश देते दिखते.
‘प्ले में फास्ट-फॉर्वर्ड मत करो…स्टॉप करके करो’
क्यूंकी प्ले में अगर FF>> किया तो प्यार मोहब्बत का संदेश तो फिर भी दिखता था…भले थोड़ा तेज़ी से…जैसे आजकल ‘म्यूचुयल फंड आर सब्जेक्ट टू मार्केट रिस्क’ वाला कसीदा पढ़ता है टीवी पर. फिर अगर वी-सी-पी का ‘हेड’ गंदा हो गया तो नये कड़कड़े नोट में स्पिरिट लगाकर हेड की सफाई का कार्यक्रम शुरू होता था.

हमलोग के घर में केबल लेकिन बहुत दिन बाद लगा…जैसा लालच किसी और के घर से आती हुई चिकन मसाले की गंध से लगता है वैसा ही लालच लगता था किसी और के घर से जब ‘आप देख रहे हैं ज़ी- टीवी’ सुनाई देता था. एक सवाल मगर मन में आता था की आख़िर उसको बार बार ये बताना क्यूँ पड़ता है की कौन सा चॅनेल देखा जा रहा है? नानी घर पास ही था और वहाँ केबल लगा हुआ था…प्रणाम-पाती करने के बाद दोनों भाई सीधा टीवी के सामने अंगद बनकर बैठ जाते थे.
उस समय कार्टून नेटवर्क नहीं था…टॉम-एन-जेर्री के वीडियो केसेट आते थे. मुझे पढ़ाई लिखाई छोड़कर इस तरह की चीज़ें ज़्यादा अच्छे से याद रहती थी (अब तक तो आप सबको समझ आ ही गया होगा
smile emoticon
…) क्लास में अगर टीचर नहीं रहता था तो मैं कभी कभी टॉम-एन-जेर्री की स्टोरी नॅरेट करता था…साथ में अपनी हँसी भी नहीं रोक पाता था…
‘चूहा केटली में छुपा हुआ था…बिल्ली ढक्कन खोल के उसमे बम डाल दिया…चूहा केटली के पाइप से निकल के भाग गया…बिल्ली ढक्कन हटा के बम को चेक करने गया तो…हा-हा-हा-हा एक मिनिट…हाँ…तो बिल्ली मूँह घुसाया ना जैसे…वैसे ही बम फट गया…हो-हो-हो…और केटली फट के, उसके सर के चारों तरफ सूरज-मूखी के जैसे फैल गया…हा-हा-हा..ओह…पेट दुखा गया’
हमलोग स्कूल से लौटते वक़्त सीरियल्स को डिस्कस करते. मेरे एक दोस्त और मुझमें शर्त लग गयी थी की ‘शांति’ का ‘भंडारी’ कौन है…दोस्त जीत गया था.
मेरा अपना ओपीनियन है की कम से कम टीवी के मामले में अस्सी और नब्बे का दशक अभी से बेहतर था…ज़्यादा वज़नदार कहानियाँ…पात्र…केशव कल्सि…नाना-नगरकर…दिलरूबा…केशव कुलकर्णी…चाचू-चाची-करीमा…कक्काजी…कामेश महादेवन-राज जी जे सिंघ…इन सबको भूलना आसान नहीं है. वैसे हर वक़्त का अपना तक़ाज़ा होता है…शायद आजकल लोगों को जो पसंद आ रहा है, वोही ये चॅनेल दिखा रहे हैं…अब तो लोगों के घरों के हर कमरे में एक फ्लॅट स्क्रीन टंगा है…जिसको जो मर्ज़ी देख लो…मगर जो मज़ा टीवी पर ‘प्रेम के संदेश’ वाले सीन, फॅमिली के साथ बैठे रहने पर आता था…वो अब विरले ही आएगा. कुछ बड़े लोगों के गले में खराश आ जाती थी अचानक से… और हम लोग तो सीलिंग के कोने में बने मकड़े के जालों का विश्लेषण शुरू कर देते थे…मन ही मन मुस्कुराते हुए…आप लोगों ने भी शायद यही किया होगा…है की नहीं?

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