पटना में चल-चित्र दर्शन

पटना में चल-चित्र दर्शन-
अपनी ज़िंदगी में हम दिल्ली, बंगलोर, हयदेराबाद और अब अमेरिका के अनेकानेक मल्टी-प्लेक्स में सिनेमा देखे हैं. मगर जो मज़ा पटना के सिनेमा हॉल सब में ख़टमल से कटवा कटवा कर सिनिमा देखने में आता था आता वो फिर कभी नहीं आया. पटना के सिनिमा हॉल में अभिव्यक्ति की भी पूरी आज़ादी थी. जो मर्ज़ी में आए चिल्लाइए…कभी कभी तो मूवी से ज़्यादा कॉमेडी तो दर्शकों के कॉमेंट्स में होते थे.उन्हीं यादों को टटोल कर कुछ मजेदार घटनायें पेशे-खिदमत हैं-
पटना के त्रि-मूर्ति – मोना, रेजेंट और एलिफिन्सटन
मुझे लगता शायद ही दुनिया में कहीं और तीन-तीन सिनिमा हॉल एक साथ होंगे. माने ग़ज़ब का सेट्टिंग था. पब्लिक को बस रिक्सा पकड़ के गाँधी मैदान पहुँच जाना है….किसी एक थियेटर में तो पसंद की फिल्म मिल ही जाएगी…अगर कोई पसंद नहीं आई तो गाँधी मैदान में बाऊआ के वापस आ जाइए. टिकेट भी इतना सस्ता की फिल्म अगर बकवास भी हुआ तो ज़्यादा दुख नहीं होता था. मगर कभी कभी अजूबा लोग भेंटाते थे थियेटर में…कॉँमेंट्री पार्टी…एक महापुरुष जो पहले ही वोही फिल्म देखे हुए है और अब अपने कोई मंद-बुद्धि अथवा नज़र से कमज़ोर दोस्त को साथे लाया है. ऐसा इसलिए कह रहा हूँ, की कॉमेंटेटर बाबू पूरे फिल्म का अड्वान्स कॉमेंटरी करते रहते, वो भी हाइ वॉल्यूम में. याद है, गोविंदा वाला ‘गैम्बलर’ फिल्म में ऐसा ही कोई भेंटा गया था…और कॉँमेंट्री भी ऐसा की रमीज़ रज़ा और अरुण लाल भी हाथ जोड़ दें. ‘अब देखना, गोविन्द्वा दू फ़ैट मरेगा पांचोलिया को…फिर उसको उठा के बिग देगा’. गनीमत से इस तरह का एनकाउंटर ज़्यादा नहीं हुआ.
एक और कमाल का अरेंज्मेंट था पटना में, जिसके सामने शॉशेंक-रेडेंपशन भी फैल है…पटना रेलवे स्टेशन के सामने सेंट्रल जेल और वीना सिनेमा. माने भगोड़े कैदी के लिए फर्स्ट क्लास इंतज़ाम…जेल से निकलो…सिनिमा में घुस जाओ…जब तक पटना पोलीस खैनि मलते हुए स्टेशन में आपको ढूँढते रहे…फिर तीन घंटा बाद जब सब शांत हो जाए, तो अगला ट्रेन पकड़ के छू-मंतर.

पटना में हॉलीवुड दर्शन- याद है पहला हिन्दी डब्बिंग वाला अँग्रेज़ी मूवी, वीना में ही देखे थे…’स्पीड’…वोही जिसमे बस कूदा के फ्लाइ-ओवर लाँघ जाता है…हॉलीवुड था तो वाह-वाह…यही सीन किसी हिन्दी, तेलुगु या तमिल फिल्म में होता तो लोग कितना मज़ाक उड़ाते. खैर, वो छोड़िए…अँग्रेज़ी सिनिमा सब सिर्फ़ मॉर्निंग शो ही लगता था…अशोक और मोना में अच्छा वाला सूपरहिट हॉलीवुड फिल्म सब…वैसे हिन्दी डबिंग मजेदार रहता था…’तुम कौन हो?’…’तुम्हारा सबसे बुरा ख्वाब’.
पहला अँग्रेज़ी सिनिमा जो चारों शो में लगा था वो था जुरासिक पार्क (हमको जितना याद है)…हमारी दादी जी भी गयी थी डाइनेसॉर सबको देखने. वो हिन्दी में डब की हुई थी तो सबको समझ भी आ गयी. मगर पता नहीं क्या सोच कर, वीना में ‘टाइटॅनिक’ लगाया था…अँग्रेज़ी में…चारों शो.
मैं और एक मित्र पहुँचे फर्स्ट डे मैटिनी शो…भयानक भीड़…शायद लोगों को पता नहीं था की ‘फोटो’ बनाने वाला अत्यंत रोचक सीन काट दिया गया था थियेटर प्रिंट से. हम लोग किसी तरह रियर-स्टॉल का टिकेट लेकर बैठे…करीब चालीस मिनट बाद पीछे से किसी महिला की आवाज़ आई…’कब डूबतई जहाजवा’…बेचारी लॅडीस लोग, ग्रूप बना के आई थी…अँग्रेज़ी सिनिमा वो भी भयानक ब्रिटिश आक्सेंट में…बेचारी सब को कुछ समझ में आ नहीं रहा था, बस इतना पता था की ‘जहाजवा तो डूबेगा’.
एक और मजेदार वाक़या हुआ था. ‘गदर’ लगी हुई थी…हमारा जनमदिन था…दोस्तों को सोचे की पिक्चर दिखा लाते हैं…टिकेट का इंतेज़ाम हमारे एक बहुत ही वेल-कनेक्टेड अंकल जी ने कर दिया था. टिकेट भी एक काग़ज़ का टुकड़ा था, जिसपे लिखा था ‘पप्पूजी बोले हुए हैं…बालकनी में आठ सीट’. हमें लगा की पप्पूजी शायद हॉल के मॅनेजर होंगे. थियेटर में घुसने के बाद हम शुरू हो गये…’पप्पूजी लाइट ऑफ करवाईए…पप्पूजी दरवाजा बंद करवाईए..एटसेट्रा एटसेट्रा’. बाद में पता चला की पप्पूजी असल में करबीगहिया के बहुत बड़े ‘गोप’  थे और बाद में हमलोग का खोज भी हो रहा था की कौन लौंडा सब थियेटर में उनका नाम लेके हल्ला मचाए हुए था. वैसे गदर देखने के बाद हम लोग भी सन्नी-देओल वाले मूड में थे…पप्पूजी को भी चांपा-कल के जैसे उठा के फेंक देते. याद है सिनिमा ख़तम होने के बाद कैसे बालकनी से हम ज़ोर से चिल्लाए थे  ‘हिन्दुस्तान’…नीचे से पूरा फ्रंट और रियर स्टॉल  चिल्लाया, ‘ज़िंदाबाद’
एक प्राब्लम था लेकिन पटना के थियेटर सब में…पार्किंग का. हमलोग तो स्टूडेंट थे…साइकल फिर बाद में मोटर साइकल से पहुँचते थे…ऐसा भयंकर पार्किंग करवाता था सब की अगर बीच में मूवी छोड़े के निकलना है तो भूल जाइए…आपका साइकल अभी सैकड़ों अन्य साइकलों के साथ एक होमोजेनिक मास बन चुका है…आपके लिए केजरीवाल से मोदी जी के लिए कोई अच्छी बात निकलवाना, ज़्यादा आसान होगा अपनी साइकल निकालने के बनिस्पत.
अब तो पटना में भी मल्टी-प्लेक्स खुल गया है…लोग पाँच रुपया का गरम थम्स-आप और दू रुपया का तेल से लबालब चिप्स एवं मूँग-फली के जगह, सौ-सौ रुपया का पाप-कार्न और फाउंटन-पेप्सी के साथ डोल्बी डिजिटल फोर-डी में सिनिमा का लुत्फ़ उठाते हैं. हम भी उठाते हैं…मगर जैसे मोना में ‘ग्लॅडियेटर’ के स्टार्टिंग सीन में चिल्ला चिल्ला के मॅक्सिमसवा को सपोर्ट करने में जो संतुष्टि मिली थी…वो शायद अब ना मिले.
अगला बार पटना आएँगे तो किसी पुराना हॉल में फिर से एक शो मारेंगे. साथ में आकर हूटिंग करना है तो बता दीजिएगा…टिकेट हमारे उपर रहा.

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