पटना का कालोनी -लाइफ

पटना का कालोनी -लाइफ-
जब तक पटना में थे, एक कालोनी में रहते थे…घर …पड़ोसी….घर के सामने मैदान…कोई आने जाने की रोक नहीं…आजकल लोग बड़े बड़े अपार्टमेंट में रहते हैं. बगल वाले घर में कौन रहता है, इससे ज़्यादातर लोगों को कोई मतलब नहीं होता. अपार्टमेंट के बाहर गार्ड है…वो किसी ऐरे-गेरे को अंदर आने नहीं देता.  सब लोग अपने अपने घरों में बंद टीवी, टॅबलेट, लॅपटॉप या मोबाइल के साथ खेल रहे होते हैं. वीकन्ड पर निकले तो सुपर-मार्केट से सब्जी वग़ैरह ले ली और माल का एक चक्कर लगा लिया.अपार्टमेंट लाइफ का अपना मज़ा है…शायद समय का तक़ाज़ा है. कालोनी लाइफ का भी अपना मज़ा था…उसी का एक परिचय प्रस्तुत कर रहा हूँ-
हम पटना के एक मिड्ल क्लास कालोनी में पले-बढ़े. नाम था पीपल’स कोवापरेटिव कॉलोनी. नाम का अनुसरण करते हुए यहाँ के बाशिंदे सच-मुच ही काफ़ी कोवापरेटिव थे. घर के सामने छोटा मैदान था जहाँ खूब क्रिकेट चला…थोड़ी डोर पर और भी बड़ा मैदान था जहाँ अब एक वर्ल्ड क्लास स्पोर्ट्स कॉंप्लेक्स बन गया है.
1. कालोनी के ‘भैया’ लोग- हर कालोनी में कुछ बेरोज़गार भैया पाए जाते हैं…ये वो लोग होते हैं जो बाहर किसी काम के लायक नहीं होते…घर पर पड़े पड़े शादी होने का इंतेज़ार करते रहते हैं. ये लोग कालोनी के बाकी जूनियर युवकों के अनडिक्लेर्ड लीडर बन जाते हैं.  उस समय गूगल नहीं था…ये भैया लोग ही सारे ज्ञान का ज़रिया थे. इनको लगभग हर विषय के बारे में ग़लत ज्ञान होता जिसका प्रतिपादन ये बिना संकोच के करते.
‘कराटे ब्लॅक बेल्ट को दो मर्डर अलाउव्ड होता है…नहीं जानते हो…अमिताभ का हाइट सात फुट है…उसके लिए स्पेशल कॅमरा यूज होता है…नॉर्मल कॅमरा में वो फ़िटे नहीं होता है…टाइटॅनिक वाली बुढ़िया असली पॅसेंजर थी…रियल स्टोरी है पूरा’.
ये लीडर लोग ‘आग्जा’ यानी होलिका दहन में हम लड़को की टोली को लीड करते. क्रिकेट खेलते समय, भले ये सिर्फ़ ‘ब्लाइंड हिट्टिंग’ (कहने का मतलब आँख मूंद के बॅटिंग करना…शब्दार्थ पर मत जाइए) मगर ओपनिंग बॅटिंग-बोलिंग दोनो इन्हें ही करना रहता. क्रिकेट ने नये नवेले नियम-क़ानून भी ये वहीं खड़े खड़े बना देते, अपनी ज़रूरत के हिसाब से.
‘अगर राऊन्द दा विकेट फेंक रहे हो तो घुटना के ही उपर का फुल-टॉस नो-बॉल होता है…पता नहीं था?’
कुछ भैया लोग एक लेवेल उपर होते थे…चाचा के लेवेल पर…ये लोग शिकार खोजते रहते थे अपने टाइम काटने के लिए.  ‘कहाँ पढ़ते हो? किस क्लास में हो? इंजिनियरिंग करना है की मेडिकल?’ बेसिकली हम लोग इन जैसे महा-बोरिंग मनुष्यों से दूर ही रहते थे…एक बार मगर मैं और एक दोस्त एक ऐसे ही ओक्तॉपास जैसे चाचजी की चंगुल में फँस गये…मगर हमने भी उनको ये ज्ञान बाँट दिया की हमारा स्कूल ‘ज्ञान-निकेतन’ असल में रबींद्रा नाथ टैगोर के ‘शांति निकेतन’ का ही हिस्सा है और शर्मिला टैगोर कभी कभी आकर पढ़ाती भी है यहाँ.

2. कालोनी का क्रिकेट- हमारी अपनी कालोनी की एक टीम थी…कोस्को क्रिकेट की बॉल…हर साल दीवाली के बाद पिच बनाया जाता था. फिर रोज़ शाम क्रिकेट. घरों में बॉल जाते थे…कुछ घरवाले अच्छे थे…कुछ पंगेबाज. एस्पसियाली जिनके घर में नव-युवतियाँ थी, उन्हें लगता था की हम जान बूझ कर उनके घर में गेंद फेंकते थे…ये सरासर ग़लत इल्ज़ाम तो नहीं था…पर कभी कभी ग़लती से भी गेंद चली जाती थी. भाई, बाइस रुपये की गेंद जो सभी लड़के चंदा करके खरीदते थे…वो अगर रोज़ कोई घर वाला दबा ले, तो कब तक ये ‘इनटॉलरेन्स’ बर्दाश्त की जाएगी. हमारे एक मित्र ने एक अजीब सा उपाय निकाला…वो रोज़ एक अंडा, उन साहब के घर पर फेंक आता…ऐसा करीब एक महीने चला…धीरे धीरे उन साहब को भी एहसास हो गया की उनके घर पर अंडों की बारिश क्यूँ हो रही है…आकर हमसे जिरह की…मगर उसके बाद से उनके घर से भी बॉल वापस मिलने लगे.  गर्मी की छुट्टियों में सुबह पाँच बजे उठ कर ‘मॅच’ खेलने जाने का अलग ही मज़ा होता था. बस एक गड़बड़ होती थी की बड़े वाले मैदान, पटना का सबसे बड़ा ओपन एयर उर्वरक उत्पादन केंद्र भी था…वो उर्वरक जो रोज़ सुबह मनुष्या अपने शरीर से पैदा करते हैं.  उर्वरक उत्पादन की प्रक्रिया का लाइव टेलीकास्ट के साथ साथ कभी ज़्यादा जोश में फीलडिंग करते समय आप अपने साफ़ सुथरे जूतों को भी फर्टिलाइज़ कर डालते थे. इन सबके बावजूद, कालोनी क्रिकेट का जो रोमांच और आनंद था, वो शायद आपको आई-पी-एल में भी नहीं मिलेगा.

3. कालोनी की शादियाँ- हर साल किसी ना किसी घर का नंबर लगता था…कालोनी के ग्राउंड में बड़ा सा पंडाल…नॉर्मली आप जिन लोगों को लूँगी-गन्जि में देखते थे…आज वो लोग सफ़ारी-सूट में सेट होके पहुँचते थे…कई लॅडीस तो मेकप की वजह से पहचान में ही नहीं आती. एक बार का याद है, बगल की शादी में ‘प्लेट’ ख़तम हो गया था…लंबी लाइन लगी हुई थी…हमारा घर दस कदम पर था…मज़ाक में हमने मेजबान भैया से पूछ दिया की अगर ज़्यादा देर हो रहा है तो अपने घर से प्लेट ले आयें क्या…भैया थोड़ा बुरा मान गये थे.
लॅडीस लोग अपने काम में लगी रहती…दूल्हा-दुल्हन का ऑन-दी-स्पॉट क्रिटिकल रिव्यू हो जाता…’लड़की का रंग कम है…दुबली भी लग रही है’…’लड़का भी तो एजेड लगा रहा है’…दूल्हा-दुल्हन का अनॅलिसिस करने के बाद बारी आती दूसरी औरतों की…’बंटी की मम्मी का सेट देखिए  तो, बहुत चमक रहा है’…’हेह…अमेरिकन डाइमंड है तो…परसों दिखी थी ना होटेल सत्कार में…सेल लगा हुआ था’…इधर जेंट्स लोग पॉलिटिक्स बतियाते रहते…जिसका सार यही निकलता की ‘इस स्टेट और इस देश का कुछ नहीं हो सकता’. कभी कभी इन मुलाक़ातों में हमारे माता पिता को कुछ मेटीरियल भी मिल जाता हमारी क्लास लगाने के लिए…’फलना बाबू के भाई का लड़का चार चार टियूशन करता है स्कूल से आने के बाद…स्कॉलरशिप मिलता है उसको…और एक तुम लोग है’
शादियों में फिर खाने-पीने का कॉंपिटेशन रहता. अब लिफाफे में जीतने रुपये दिए हैं…उसका डबल तो कम से कम खा के ही जाना है. चिकन काउंटर पर हमेशा लोग सर्वर से बहस करते हुए दिखते…’खाली ग्रेवी दिए हो जी…और ये गला का पीस कोई पीस होता है…टन्गरी सब तुम लोग अपने लिए छुपा के रखा है?’
और आइस-क्रीम तो समझ लीजिए की जैसे अमृत बँटा रहा हो…उपर से कालोनी में तो सब कोई पहचान भी लेते थे…’तुम फिर आ गया…बता दें तुम्हारे पापा को’. अब उनको क्या पता की पिताजी ने ही भेजा हुआ था हमें.

4. कालोनी के पर्व-त्योहार-
असली मज़ा होली में आता था…कोई पहचान में नहीं आता…कभी कभी तो अपनी माताजी भी नहीं. मगर उसके पहले आग्जा यानी होलिका दहन के बारे में बताना ज़रूरी है…जैसा की मैने पहले बताया था, ‘भैया’ लोग हम चेलों की टोली बना कर निकलते थे, ठीक होलिका के दिन ही…उसके पहले किसको टाइम रहता था…शाम को हम आठ-दस लड़को ली टोली अपने ही कालोनी में, होलिका में डालने योग्य सामग्री तलाशने लगती. अपने ही कालोनी में पीटने का डर कम रहता था. मजेदार अड्वेंचर होता था. भैया लोग कभी भी खुद जाकर कोई काम नहीं करते…हमें भेज देते…’जाओ ना, उसका चौकी उठा लाओ’…’क्या भैया, पिटवायएएगा आप तो’…’अरे कुछ नहीं होगा, हम हैं ना’….जब भी ‘कुछ’ होता था…भैया लोग तुर्रंत मिसटर इंडिया बन जाते. किसी के ‘बॅडमिंटन’ कोर्ट का बाँस उखाड़ लाए…किसी ने बड़े शौक से बाँस के फट्टो से बाड़ बनवाए थे…अगर हमसे हो पाया, तो वो भी गायब…एक हमारे कालोनी में थोड़े सनके हुए आई-पी-एस अफ़सर रहते थे. उन्होने बड़े शौक से एक बकरा पाला हुआ था…पता नहीं क्यूँ?…उसके लिए एक छोटी सी झोपड़ी भी बनवा डाली थी. बकरा तो लगता है किसी दिन हलाल हो गया…मगर उस झोपड़ी का हमने असली उपयोग किया…पूरी की पूरी झोपड़ी उठाकर आग्जा में डाल दी थी…कम से कम पचास फीट उँची लपटें उठी थी उस बार.  एक बार तो हम लोग कुछ कच्चे बाँस उठा कर डाल दिए थे…जब वो फटने लगे तो कंकारबाग थाना का जिप्सी चेक करने आ गया था की ‘फाइरिंग’ कहाँ हो रहा है?

5. कालोनी के हॉकर्स- अमेरिका के सेआटल शहर  में अमेज़न कंपनी में सब्जियों की होम डेलिवरी का प्रोग्राम शुरू किया…बहुत हंगामा हुआ. अब इनको कौन बताए की हमारी कालोनी में हर सब्जी की होम डेलिवरी होती रही है जेफ बीज़ोस के बाप के पैदा होने के पहले से. सुबह सुबह ये ठेले वाले पहुँचते थे…और उनके आवाज़ लगाने के स्टाइल से लोग पहचान जाते की ये कौन है…’बड़का आँख वाला’, ‘गाल-फुल्ला’ और बदमशवा…बाकी दोनो मोल-मोलाई कर देते थे…बदमशवा लेकिन एक पैसा नहीं छोड़ता था…इसलिए उसे वो उपाधि मिली हुई थी…इनके असली नाम शायद ही कोई जानता हो… उनके आवाज़ देने के तरीके भी ग़ज़ब थे…’बड़का आँख वाला’ चिल्लाता ‘प्याज आलू है…आलू प्याज है’. इस वाक़्या की गहराई में अगर आप जायें तो  एक बेहद फिलोसॉफिकल मतलब निकलता है…प्याज और आलू असल में एक ही हैं…मेटा-फिज़िकल लेवेल पर. उस सब्जी वाले ने मोह-माया का जाल तोड़ दिया था…पर्रंतु इस बात से वो खुद अनभिग्या था…घोर विडंबना.
फिर एक डोसा वाला आता था…उसको डोसा बनाते हुए लोग इतने गौर से देखते जैसे अगले एग्ज़ॅम में डोसा बनाने की विधि पर प्रश्न आने वाले हों. घर में खोजकर सबसे बड़ा कटोरा निकाला जाता सांभर और चटनी के लिए…’थोड़ा और डालिए ना…इतना से क्या होगा’…डोसा वाला भी चिढ़ जाता कभी कभी ‘आपको खाना है की नहाना है सांभर से?’

ये सब कुछ यादें हैं बचपन की, जो अपनी छोटी सी कालोनी में मिलकर बुनी थी हम सब ने. अगर इन कुछ यादों ने आपके चेहरे पर मुस्कान लाई हो तो शायद मेरा ये प्रयास कुछ हद तक सफल रहा.  इतना लंबा पोस्ट बर्दाश्त करने के लिए धन्यवाद.

पसंद आया हो तो अपने वॉल पर शेर ज़रूर करें.

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