पटना का वाइल्डलाइफ

पटना का वाइल्डलाइफ-

अब वैसे पटना कोई नॅशनल पार्क या रिज़र्व तो नहीं है, पर्रंतु एक समय था, जब यहाँ के सड़कों और गलियों में गाय-भैंस-सुवर-कुत्ते-गधे उतनी ई आज़ादी से विचरते थे, जितनी आज़ादी से काजीरंगा में गैंडे और रन्थम्बोर में बाघ…वैसे उन बेचारों को तो पोचर का डर भी रहता था…मगर पटना के वाइल्डलाइफ को किसी बात का भय नहीं रहा कभी. उसी विविध वाइल्डलाइफ का एक परिचय, व्यक्तिगत अनुभवों की चटनी के साथ:

1. मच्छर- असली मायनो में एक वेमपायर. वैसे पटना के मच्छर साइज़ में छोटे होते हैं (कभी मुज़्ज़फ़्फ़रपुर के खली-नुमा मच्छरों से मुलाकात हुई है?) पर्रंतु आपने वो दोहा तो सुना ही होगा, ‘देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर’. ऐसा ग़ज़ब का इस्किल बना लिया है सब, जब काट के उड़ जाता, तब बिसबिसाना शुरू होता है. अभी तक याद है कैसे फील्ड में किसी एक लड़का के सर पे सब मच्छर झुंड बना के नाचते रहता था, और वो किसी और से माथा सटा के अपना लोड ट्रान्स्फर करने की कोशिश करता. हमारे माथा पर नाचने वाला मच्छर सब लेकिन बहुत वफ़ादार था. कभियो सफलतापूर्वक  ट्रान्स्फर नहीं हुआ…और तो और गुस्सा कर एक-दो बार भांभोर भी लेता था.  कोई लड़का अगर फील्ड में बिना मतलब के ही इधर उधर दौड़ रहा है तो समझ जाइए की आज उसका मच्छराभिषेक हुआ है.
कितना बार तो देखते थे की सब गुड नाइट के मशीने पर ही बैठा हुआ है…मानो कह रहा हो ‘चिन्ह्ते नहीं हो…फलना यादव के घर के सामने वाला गड्ढा के मच्छर हैं…हमको गुड-नाइट देखाओगे’. और मुसहरी  में शायद कोई सीक्रेट कोड वाला गेट था, जिसका पिन मच्छरवा सब हॅक करके पता कर लिया था…काहेकि हम को कितनो खोजने पर कभी कोई छेद नहीं दिखा…मगर रोज सुबह हमारा खून पीकर तुन्न हो चुका मच्छर सब रोज़ भेंटाता…और हम बकाएदा सब को चुन चुन कर मारते और मुसाहरी में चिपका देते, बाकी मच्छरों को चेतावनी के जैसे. मगर उसका उल्टा असर होता और वो सब बदले की भावना से और ज़ोर शोर से हम पर हमला कर देते.

2. छिपकली- इस जानवर का सतह से कम से कम दस फीट उपर होना ज़रूरी था. जब तक ये उस ऊँचाई पर रहते, नीचे बैठे लोगों को कोई फरक नहीं परता. कभी अगर ग़लती से ये सतह पर आ जाते तो आस-पास के लोगों के अंदर का प्रभु-देवा जाग जाता. एक बार का याद है की ‘लाइन’ कटा हुआ था…रात के समय…सब बच्चा लोग बैठ के गप्प मार रहे थे. हमने पता नहीं किस कारण से कैप पहना हुआ था. तभी लगा की सर पर कुछ टप्प से गिरा…फिर कैप के आगे निकले हुए फ्लॅप के उपर से अंधेरे में टोह लेते हुआ किसी लंबे से जीव की आकृति दिखी…छिपकली…हमने आव देखा ना ताव और उसे अपनी टोपी से चिटक दिया…’मम्मी…छिपकली’ की उद्घोषणा के साथ…अंधेरे में वो छिपकली कहाँ जाकर गिरी पता नहीं…मगर कभी सोचा नहीं था की उतनी छोटी सी जगह में आठ-दस लोग एक साथ ‘ब्रेक-डांस’ कर सकते हैं. वैसे, आटा का छिपकली बना कर, उसपे बर्थडे में मिले अनेकानेक स्केच पेन से थोड़ी कलाकारी करके, हमने अपनी माताजी को बहुत बार डराया हुआ था. शायद असली छिपकली ने उसी बात का बदला लिया.

3. मकड़े- एक विचित्रा टाइप का मकड़ा पाया जाता है पटना के आस-पास. मटमैला रंग का…लंबे लंबे ओक्तॉपास जैसे पैर…दीवार से चिपका हुआ. कई बार इनके दर्शन बड़ी नाज़ुक अवस्था में हुए थे…बाथरूम में…सुबह-सुबह. बड़ी अंतड़ी शायद मूड में नहीं है…आप इंतेज़ार कर रहे हैं…बाकी दिन की प्लॅनिंग करते हुए…तभी बायें साइड की दीवार पर…आप से सिर्फ़ आधे फीट की दूरी पर एक पंद्रह सेंटिमेटेर की व्यास वाला एक मकड़ा दीवार पे चुप चाप बैठा हुआ…आप अब हर काम स्लो मोशन में करते हैं…मगर शायद मकड़े ने आपके डर को महसूस कर लिया है…इसलिए वो ज़रा सा हिलता है…आप के हाथ से मग्गा छूट जाता है…बाकी जैसे तैसे करके आप बाहर आते हैं और फिर आपकी माताजी…किसी तरह हिम्मत जुटा कर नारियल वाले झाड़ू से उसे मार कर ही बाहर निकलती हैं. और नही तो अगर वाक्कुम -क्लीनर से जाले सॉफ हो रहे हों तो इन बड़े वालों को पकड़ना और भी मुश्किल होता था…कई बार तो कुछ मकड़े पाइप पर ही कूद जाते…और हम सब कुछ फेंक-फाँक कर उस रूम से रफ्फु-चक्कर. कभी कभी लेकिन में दया खाकर, कोई मच्छर मार कर उनके जाले में फेंक देता. फिर गौर से देखता की वो कितने प्यार से अपने खाने को रॅप करके साइड में रख देते.

4. भुआ- हम लोग के घर के सामने पता नहीं कौन से प्रजाति का पेड़ लगा दिया था…उसमे हर साल सर्दी के मौसम में ‘भुआ’ या ‘भुईला’ लगता था…भूरे रंग का रोएन्दार ‘केटरपिलर’. अगर कहीं छुआ गया, तो नोचते नोचते आपका बुखार, बिना लगे छूट जाएगा. हमको आजतक नहीं समझ में आया की ये भुआ सब आख़िर आदमी के देह पर क्यूँ चढ़ता था…इतना खाली ज़मीन है…पेड़ का पत्ता है…जाओ खाओ बैठ के…मगर नहीं…हम तो आके देह पर चढ़ेंगे. उसी कारण भुआ लोकेट करने और मारने का प्रोटोकॉल सेट था घर में. भुआ मारने का सुपारी हम ही लोग लिए हुए थे…जहाँ भुआ दिखा…पढ़ाई लिखाई छोड़ कर अगले आधे घंटे में उसको ठिकाने लगा दिया जाता.

5. गाय- गौ माता का पटना से विशेष संबंध है…पूरा पटना उनका है…वो कहीं भी किसी भी फील्ड…सड़क…मार्केट में घूम सकती हैं. पटना का सड़क सब तो वैसे ही कितना खाली-खाली और चौड़ा हुआ करता था…उन सड़को पर ड्राइविंग को थोड़ा और उत्तेजनापूर्न बनाने के लिए गाय लोग आराम से बीच सड़क पर पसर जाती थी…जितना इस्किल और क्विक-रेअक्शण यहाँ ड्राइविंग के लिए चाहिए, हमको तो अभी तक विश्वास नहीं होता है की पटना से कोई फ़ॉर्मूला वन ड्राइवर नहीं निकला अभी तक. गाय सबको पटना का ग्वाला सब वैसे ही ट्रीट करता है जैसे अमेरिका में लोग अपने घर की पालतू बिल्ली को…बिल्ली को लोग आज़ाद छोड़ देते हैं…वो दिन भर इधर उधर घूम कर, शाम को अपने आप वापस आ जाती है…वही हाल पटना की गाय सब का भी है. हमको लेकिन एक अजब आदत हो गया था…कोई बड़ा सींग वाला गाय को अगर बैठा हुआ देखते तो उसका सींग पकड़ कर हिलाने लगते…जब तक वो गाय परेशान होकर खड़ा ना हो जाय. कुछ गाय हमको पहचान गया था, और हमको देखते ही अपने आप खड़ा हो जाता. फिर चुनौती भरी आँखों से देखता ‘आ, अब सींग पकड़ के दिखा’…भाई हमें तो अपने दो सौ छे में से दो सौ सात हड्डियाँ प्यारी थी…कभी और सही.

5. भैंस- मुझे लगता हैं भैइसों को इस जीवन चक्र का औचित्या पता चल चुका है. इसलिए वो बिना कोई योगा-ध्यान किए हुए कितना चिल्ड-आउट रहती हैं…मोह-माया से उपर. कभी किसी भैंस को देखा है गर्मी के मौसम में तालाब के अंदर…पानी से सिर्फ़ अपना सिर बाहर निकले हुए…संतोष की पराकाष्ठा. इस  पशु ने भी गायों के तरह पटना की सड़कों को थ्री-डी रेसिंग गेम में बदलने का बीड़ा उठाया हुआ था…’भैंस के आगे हॉर्न बजाए…भैंस रही पागुराए’…आज तक कोई ऐसा प्रेशर हॉर्न नहीं बना जो किसी भैंस को टस से मस कर दे. और मारुति का विंडो ठीक उनकी पूंछ की ट्रजेक्टरी के फोकस पॉइंट पे था…ज़्यादा पास से गुज़रे तो अपने गोबर से सने पूंछ मारने में उन्हें देर नहीं लगती.

6. कुत्ते- पटना के कुत्ते भी बड़े मजेदार प्राणी हैं. रात में देर से लौटने पर हर गली के कुत्ते, फ्री में एस्कॉर्ट सर्विस प्रवाइड करते हैं. हर कालोनी में घर के पालतू और गली के कुत्तों में एक अजीब से अंडरस्टॅंडिंग थी. जब कुत्ता घर में होता और कोई गली का कुत्ता सामने से गुज़रता तो वो पागलों की तरह भूंकने लगता. उल्टा दृश्या होता जब पालतू कुत्ता अपनी लघु एवं दीर्घ शंका के निवारण के लिए गली में घूमने निकलता…तब सारे गली के कुत्ते मिलकर उसको गालियाँ निकालते. ‘क्यूँ बे…कल क्या बोल रहा था गेट के पीछे से…फिर से बोल के बता…हिम्मत है तो इस दुबले-पतले से नौकर से अपनी चैन छुड़ा के आजा मैदान में’
सर्दी के मौसम में लेकिन अजीब से दृश्या देखने को मिलते. शायद कुत्तों का सेक्स-रेशियो हरयाणा के मनुष्यों से भी खराब है…इसलिए एक बेचारी कुतिया के पीछे कम से कम बीस कुत्ते घूम रहे होते. जिनके घरों के सामने इन कुत्तों की फॅमिली प्लॅनिंग शुरू होती, वो बाहर निकल इन्हें भगाने की कोशिश करते. एक हमारे मित्र ने भी ऐसी ही कोशिश की थी…रेनबो फील्ड में जमा एक कुत्तों की टोली पर पत्थर फेंक कर मारा…नतीजे में एक अत्यधिक उन्माद से भरे कुत्ते ने उन्हे खदेड़ दिया…फिर उनकी पतलून की पीछे की कभी ना इस्तेमाल होने वाली बायें साइड की पॉकेट भी फाड़ ले गया. अँग्रेज़ी में एक फ्रेज़ है ‘ही आस्क्ड फॉर इट’.

7. गधे- हमारे स्कूल के रास्ते में हमें हमेशा गधे दिख जाते…कभी कभी तो असली चार पैरों वाले भी. उनसे कभी ज़्यादा व्यक्तिगत संवाद तो नहीं हुए…पर्रंतु हमारे साथ स्कूल जाने वाले एक मित्र की अपनी ही एक थेओरी थी…केजरीवाल से पहले उसने ऑड- ईवन प्लान निकाला हुआ था…अगर ईवन नंबर गधे दिखे (असली वाले) तब तो ठीक…मगर ऑड नंबर दिख गये तो दिन खराब बीतेगा…एस्पेशली अगर तीन गधे दिखे तो फिर हम लोग स्कूल का रास्ता छोड़ कर चौथे गधे की तलाश करने लगते…जिससे अमूमन स्कूल पहुँचने में देरी होती…लेट लाइन में जब पी-टी सर पूछते की लेट क्यूँ हुआ तो जवाब भी देने में नहीं बनता. ‘सर हमलोग गधा खोज रहे थे’ ये सुनकर शायद पी-टी सर हमारा भी गधा बना देते.

पटना के वाइल्डलाइफ को अपने चाइल्डलाइफ में लपेट कर ये सब आपके सामने पेश किया था. आपके भी कुछ मजेदार अनुभव रहे होंगे…शायद मेरे शब्दों ने उन अनुभवों का आपको फिर से एहसास करा दिया हो.

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