एक बिहारी की रेल यात्राएँ

एक बिहारी की रेल यात्राएँ

बिहारी लोगों का भारतीया रेल से एक विशेष तरह का रिश्ता है. बिहार के लोग होल ऑफ इंडिया में वैसे ही फैले हुए हैं जैसे इंडियन लोग होल वर्ल्ड में. जब बाहर हैं, तो ‘घर’ आने के लिए रेल ही सबसे समुचित साधन मालूम होता है. हम सब ने देखा और सुना है छठ के समय कैसे बिहारी लोग जान-प्राण दाँव पे लगा के ट्रेन पकड़ता है..दिल्ली से…मुंबई से…बंगलोर से…कलकत्ता से.
हमने भी अपनी ज़िंदगी में रेल से खूब सफ़र किया है…कुछ यादें पेशे-खिदमत.

बचपन की रेल-यात्राएँ:
सबसे यादगार रेल यात्रा थी पटना से दिल्ली-जयपुर-आगरा का टूर. जी नहीं, कोई ‘पॅलेस ऑन दा वील्स’ में नहीं…स्लीपर क्लास में ही…पर्रंतु परिवार के साथ वो स्लीपर क्लास भी बकिंघम पॅलेस से कम नहीं लगता था. ट्रेन खुलने के ठीक पहले पिताजी हमेशा कहीं ना कहीं गायब हो जाते…अब हम बच्चों को क्या पता की बोगिया जुड़ी हुई हैं…वो कहीं और भी चढ़ कर आ सकते हैं. जब तक दिखते नहीं मन रुआंसा सा होता रहता…’अब क्या होगा?’ फिर पिताजी प्रकट होते कुछ मॅग्ज़िन्स और अपने ‘स्पेशल पान’ के साथ. माताजी हमें खाने पिलाने में लगी रहती…निमकी-पूरी- तेल से परिपूर्ण आलू का भुजिया…मिल्क-बीकिस. वैसे तो चाय घर पर नहीं मिलती थी..पर्रंतु ट्रेन में थोड़ा गिरगिराने पर टी-बॅग वाली बे-स्वाद चाय की स्वीकृति दे दी जाती थी. एक मजेदार हादसा हुआ था जयपुर स्टेशन पर…सुबह सुबह चार बजे ट्रेन पहुँची और दोनो भाई कुछ बॅग्स लेकर उतार गये. पिताजी और माताजी अभी उतर ही रहे थे की ट्रेन चल दी. असल में पता नहीं किस कारण से उस ट्रेन का प्लॅटफॉर्म बदलना था…बाकी सारे प्लॅटफॉर्म खाली थे. उन दस मिनटों में इधर हम दोनों भाइयों ने मनमोहन देसाई की किसी मसाला फिल्म की स्टार्टिंग सीन की तरह उस ट्रेन को जाते हुए देखा, उधर माताजी को कम से कम पचास बार मन में हार्ट-अटॅक आ चुका था. खैर, ट्रेन वापस आई…हमारी अटकी हुई साँस को साथ लेकर.

किशोरा-वास्था की रेल यात्रा

लगभग हर बिहारी छात्र, बारहवीं पास करने के बाद भारत भ्रमण के लिए निकलता है. ग़लत मत समझिए, ये कोई मनोरंजन अथवा ज्ञान-वर्धन का टूर नहीं होता…ये होता है अलग अलग एंट्रेन्स एग्ज़ॅम देने का टूर…कर्नाटका COMED, महाराष्ट्रा कंबाइंड, बिहार कंबाइंड. बिहार कंबाइंड?? जी हाँ..बिहारी लोग को अपने राज्या की इंजिनियरिंग-मेडिकल की परीक्षा देने की लिए रेल यात्रा करते हैं…क्यूंकी आप सबने तो फोटो देखे ही होंगे उन बिहारी स्पाइडर-मॅन अभिभावकों की जो अपने बच्चों के करियर को लेकर कितने ‘सपोरटिव’ होते हैं. इसलिए BCECE बोर्ड वालों ने एक फंडा सोचा…क्यूँ ना जहाँ से इन छात्रों ने बारहवीं पास की है उसके दो-सौ किलोमेटेर के दायरे के बाहर इनका ‘सेंटर’ दिया जाए. तो पटना से पास-आउट लोग टाटा का ट्रेन पकड़ रहे हैं…राँची से पास आउट भागलपुर का. उस एग्ज़ॅम के एक दिन पहले और बाद का अगर आपका उसी रूट पे ट्रेन रिज़र्वेशन है, काँसेल करा कर, फ्री में चले जाइए…अगर बोगी में घुस पाए तो…फॅमिली साथ थी फिर तो भूल जाइए. हम भी खूब घूमे हैं…और एक समय था जब कर्नाटका के लिए ज़्यादा ट्रेन नहीं थी…पर जाना तो है…जो टॉर्चर बच्चों का होता था उस ट्रिप में…वो देखकर तो इंडियन आर्मी के कमॅंडो ट्रैनिंग वाले शर्मा जायें. हम भी बहुत घूमें हैं…ज़्यादा भ्रमण एम-बी-ए का इंटरव्यू के लिए हुआ था…चेन्नई, मुंबई, कलकत्ता, दिल्ली…बस एक अहमदाबाद छूट गया…वहाँ का भी ट्रिप लगा जाता तो क्या बात होती. एक मजेदार वाक़या हुआ था चेन्नई से लौटते वक़्त. मई के महीने में अगर आप स्लीपर बोगी के अप्पर बर्त पर हैं, तो सॉना और स्टीम-बाथ जैसे लग्जरी चीज़ों का आनंद आप मुफ़्त में उठा सकते हैं. विश्वास कीजिए, पेप्सी की डेढ़ लिटेर वाली प्लास्टिक की बोतल में रखा ठंडा पानी, तीन-चार घंटो में चाय बनाने लायक हो जाता था…इसी कारण से बोतल आधा भरा होने के बावजूद, आंध्रा के किसी स्टेशन पे हम आराम से उतरे…बर्त पर ही अपना वॉलेट, .घड़ी और बॅग छोड़कर (जिसमे की सारे मार्क-शीट और सर्टिफिकेट्स थे). उन दिनों मोबाइल फोन इतना सस्ता नहीं हुआ था की पिताजी हमें भी एक पकड़ा देते. खैर, बोगी से सामने ही नलका था…तीन नल..जिसमे में से दो काम कर रहे थे…उसपे कम से कम पचास लोग भिड़े हुए. तभी अचानक से सभी लोग भाग खड़े हुए…मैं शायद हल्की नींद में था…मैने सोचा वाह..अच्छा हुआ भागे…मैं आराम से आगे बढ़कर पानी भरने लगा…तभी एक मुस्कुराते हुए सज्जन ने मुझसे आकर कहा…’आपका ट्रेन जा रहा है’…मुड़कर देखा तो बस दो बोगियाँ बची थी. जान-प्राण लेकर भागे थे और कूद कर सेकेंड लास्ट बोगी में घुस गये. पर्स और घड़ी से ज़्यादा चिंता थी मार्क-शीट और सर्टिफिकेट्स की, वो अगर खो जाते तो एक बार फिर से पटना यूनिवर्सिटी ने ना जाने कौन कौन से डिपार्टमेंट में जाकर ‘नो-ड्यूस’ करवाना परता. अंत भला तो सब भला..वैसे वो पानी भी दो घंटे के अंदर ‘सुसूम’ हो ही गया.
ए-सी रेल यात्रा
जब नौकरी लग गयी तो ए-सी में यात्रा करने लगे…कभी अपने पैसो से, कभी कंपनी के. और हम तो ठहरे दिलदार आदमी…कोई आकर बर्त चेंज की रिक्वेस्ट करता, तो हम आराम से मान जाते…इसी चक्कर में एक बार भुज से दिल्ली आते वक़्त हमारा एल-बी था सेकेंड ए-सी के लास्ट कॉमपार्टमेंट में…दो ही बर्त थे…ऑलमोस्ट कॅबिन के जैसा. मैं आराम से लेटा ही था की एक सज्जन पहुँचे और उन्होने जो रिक्वेस्ट का सिलसिला शुरू किया उसके अंत में मैं अपने एल-बी से निकल कर एस-यू में बैठा था…भुज के बाद जो सॉल्ट-फ्लॅट के बीच से ट्रेन गुजरती है वो पूरा मिस हो गया मेरा. फिर फ़ैसला लिया की बर्त चेंज तभी करूँगा जब कोई सुंदर सी लड़की आकर रिक्वेस्ट …वरना नो चान्स. ए-सी में ट्रॅवेल करने पर कभी कभी सर्व-ज्ञानी टाइप के लोग भी भेंटाते हैं, स्पेशली पटना लाइन पर… राजनीति के एक्सपर्ट…’अरे देखिएगा ना…लालू को दसो सीट मिल जाए तो हमारा नाम बदल दीजिए’…अब उनका नाम तो कोई जनता नहीं जो बदल पाए. चिल्ला चिल्ला कर बात करने वाले ये लोग पूरी बोगी के वेल्ले लोगों को अपने आस-पास एकत्रित कर लेते थे. एक और मजेदार बात होती थी ‘सबसे खराब चाय’ वाला की एंट्री…ग़ज़ब का अड्वर्टाइज़िंग आइडिया था…लोग कौतुहुलवश उसकी चाय खरीदते…खराब निकली तो आप कुछ बोल भी नहीं सकते हैं…मगर ग़ज़ब की चाय होती थी…गावों में मिट्टी के बर्तन में खौलाई हुई दूध की सोंधी सोंधी खुश्बू के साथ. कुछ ही दिनों में और भी ‘सबसे खराब चाय’ वाले आ गये जिनकी चाय सच मुच में सड़ी हुई होती थी. अब आपके सामने चॅलेंज था इनमे से असली वाले को पहचानें…वरना नाक सिकोड सिकोड के वो सड़ी हुई चाय गटक जायें.
हमारा बचपन का एक सपना है…राजधानी के फर्स्ट क्लास में ट्रॅवेल करने का…कभी पूराएँगे मौका मिलने पर तो फिर उसका भी कहानी लिखेंगे…बस कोई सर्व-ज्ञानी चाचा ना भेंटा जायें कॅबिन में.

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