हाई- टेक सैलून

त्रिवेनिनगर, पाटनपुर शहर का सबसे बड़ा मोहल्ला था. वहाँ की काफ़ी चीज़ें फेमस थीं…कपड़ो का बड़ा मार्केट था, जहाँ त्योहारों के समय भयंकर भीड़ होती थी. घोष की मिठाइयों की दुकान जिसकी ‘क्रिस्पी’ जलेबियाँ और लाजवाब छेना-पायस खाने, लोग शहर के दूसरे कोनो से आते थे…सलीम’स के कबाब भी काफ़ी मशहूर थे. और इन सब फेमस दुकानो के बीच था ‘हाई-टेक’ सलून…जिसका सिर्फ़ नाम ही हाई-टेक था. सलून में इस्तेमाल होने वाला औजार इतना पुराना और ‘भोथर’ था की उनके सामने पाषान-युग में बने पथर के औजार ज़्यादा मॉडर्न लगते थे.
हाई-टेक सलून में ज़्यादातर वोही लोग जाते थे जिनको अपने बाल की स्टाइलिंग में कोई महत्वा नहीं दिखता था. या फिर वो बच्चे जिन्होने अपने बालों को छोटा रखने का जिम्मा अभी भी अपने पिता के हाथों में सौंप रखा था. जैसे वो बच्चे किशोरावस्था में पहुँचते और उनमें ये समझ आ जाती की धीरेन्द्र नाई को आदमियों का नहीं बल्कि जानवरों का नाई होना चाहिए था, वो हाई-टेक सलून में कभी झाँकने भी नहीं आते.मगर हाई-टेक सलून का एक अपना लायल कस्टमर बेस था…कॉलोनी के ‘पुराने’ लोग जो कॉलोनी बसने के समय से ही धीरेन्द्र नाई की कैंची का शिकार बनते रहे थे…और कोई नाई की दुकान थी भी नहीं आस-पास उस वक़्त. दूसरे सलूनों में तो पैसे भी ज़्यादा लगते थे. यहाँ खर्चा भी कम था एवं मनोरंजन का एक बेहतरीन साधन भी मौजूद था. यह साधन कोई टीवी चॅनेल अथवा कोई एलेक्ट्रॉनिक उपकरण नहीं बल्कि एक सेल्फ़ स्टाइल्ड, कॉंटेंट-जेनरेटिंग महापुरुष थे जिनका नाम- धीरेन्द्रा था. हालाँकि लोकल लोग उन्हें ‘धीरेंदरवा’ अथवा ‘धुरन्दर’ नाम से पहचानते थे. ये महाशय इस सलून के ‘हेड-स्टाइलिस्ट’ अथवा ‘मुख्या-नाई’ एवं अनाफीशियल ‘ब्रांड-आंबास्डर’ थे. दुकान में बैठे आधे लोगों को सलून में कोई काम नहीं करवाना रहता था…वो तो बस धुरन्दर नाई की लच्छेदार गप्प सुनने के लिए बैठे रहते.
धीरेंदर नाई की ज़ुबान उसकी कैंची से भी तेज़ चलती थी. वो बड़े इतमीनान से अपने वफ़ादार कस्टमर के बालों को काटता. केश-कर्तन करते हुए धुरन्दर बाबू खेल-कूद, राजनीति, मौसम, स्टॉक मार्केट जैसे विविध और अनेकानेक विषयों पर अपने ज्ञान की अभिव्यक्ति करते रहते. वैसे ज्ञान तो उनको ठीक से अपने काम का भी नहीं था…बाकी विषयों पर भी जो वो कहते वो उनका ‘पर्सनल ओपीनियन’ ही हुआ करता था. पर्रंतु हर गप्प ऐसी लगती थी जैसे गरम-मसाले और दही में मारिनेड करके पेश किया गया हो. ‘धुरन्दर’ नाई की ये प्रतिभा कमाल की थी…वो बच्चों के साथ ‘छोटा भीम’ भी डिसकस कर सकते थे…और कहीं खुदा ना ख़ास्ते, स्टेफन हावकींग उनके सलून में आ जाते तो उनके साथ ‘ब्लॅक होल और समानांतर ब्रहमांड (पॅरलेल यूनिवर्स) थेओरी का भी विश्लेषण कर डालते.
आज मगर दुकान में बिल्कुल खाली पड़ी थी…बुधवार के दोपहर…तीनों नाई,धीरेन्द्र, नरेश और महेश, सुस्ता रहे थे.
‘भईया..चाय’, नंदू सैलून में दाखिल हुआ, हाथ में तीन छोटे शीशे के ग्लास में बेहद मीठी चाय लेकर. बारी बारी से सबने अपना ग्लास पकड़ा. तभी धीरेन्द्र को अपने सबसे प्रिय मिठाई की तलब लगी,
‘अरे नंदू, गुलाब-जामुन छना गया है क्या?’
‘हाँ भईया, अभी ही निकला है कड़ाही में से…एक दम गरमा गरम’
‘तो ले आओ एक प्लेट भाग के’
असल में सैलून के बगल में ही मिठाइयों की दुकान थी. दिन भर खोवा और छानते हुए मिठाइयों की सुगंध को भला कब तक बर्दाश्त कर पता कोई.
जब तक नंदू गुलाब-जामुन, एक कटोरे में रख कर वापस लाता, दो कस्टमर पहुँच गये. उनमें से एक थे जनार्दन बाबू…बिहार सरकार में बड़े अफ़सर होकर रिटायर हुए थे. बड़ा सा घर…बड़ा रुतबा था उनका इलाक़े में.
‘क्या धीरेंदर, सब ठीक-ठाक है ना…थोड़ा मालिश कर दो आज’
‘जी सर, एक दम बढ़िया…चलिए अंदर, नया कॅबिन बनवाए हैं…आप तो स्पेशल ग्राहक हैं’ धीरेन्द्र नाई ने दाँत निपोडते हुए कहा.
धीरेन्द्र को पता था की अगर जनार्दन बाबू खुश हो गये, तो टिप का भी गुंजाइश बनता था. उसने तेल गरम करके मालिश का कार्यक्रम आरंभ कर दिया.
‘अच्छा सर, ये असहिशुणता क्या होता है थोड़ा खुलासा करके समझा दीजिएगा क्या हमको?’
‘अभी नहीं धीरेंदर, अभी मन ठीक नहीं है और ये थोड़ा टेढ़ा टॉपिक भी है…देखते हो ना टीवी पर कैसे पगलाया रहता है सब…आज शांति से बस मालिश कर दो…फिर बताएँगे की असहिष्णुता किस बला का नाम है’

इधर नंदू मिठाई लेकर दुकान में पहुँचा. महेश नाई के कहने पर उसने मिठाई का कटोरा, आईने वाले रॅक पर ही रख दिया. दूसरे वाले ग्राहक को शेविंग करानी थी. वो कुर्सी पे बैठा, नरेश नाई का इंतेज़ार कर रहा था…बारी उसकी थी अभी. नरेश लघु-शंका का समाधान करके वापस आया.
‘जल्दी बना दे नरेश भाई, हमको निकलना है ज़रूरी काम से’
ग्राहक ने नरेश से आग्रह किया.
‘शादी-बियाह का सीन है लगता है…शेविंग करके टिप-टॉप होके फिर से लड़की देखने निकल रहे हैं क्या बिनोद जी?’ नरेश ने मज़ाक किया. बिनोद जी थोड़ा झेंप गये.
नरेश ने बिनोद के गले में टॉवेल डाला, फिर ब्रश में शेविंग के लिए झाग बना कर बिनोद के चेहरे को उस झाग से ढकने लगा.
‘इस बार ऐसा शेव बना दो की लड़की देखते ही पसंद कर ले’
‘ऐसा शेव बनाएँगे ना की पसंद तो आ ही जाइएएगा और तो और दुपहिया के जगह चार-पहिया भी गछ देंगे आपके ससुर जी’
‘थोड़ा और क्लियर करके बोलो…कहीं चार-पहिया के नाम पर ‘ठेला’ पकड़ा दिए तो तुम्हारे सलून के सामने ही अंडा का ‘गुमटी’ लगाएँगे’
गप्प हांकते हुए नरेश, बिनोद के चेहरे पे शेविंग क्रीम का झाग लगा रहा था. जब बिनोद के चेहरे पे कोई लीगल स्पेस नहीं बचा और झाग लगाने के लिए तो उसने बिना देखे ब्रश को पानी वाले कटोरे में रखने की कोशिश की…ऐसा लगा जैसे कटोरे में पहले से ही कुछ रखा हुआ था…उसने तोड़ा ज़ोर लगा कर ब्रश को कटोरे में धकेला…मुड़ कर देखा तो सत्यानाश…धीरेन्द्र के मंगाए गुलाब-जामुन में गुलाब या जामुन का तो पता नहीं, पर्रंतु अब वी-जॉन शेविंग क्रीम के लेमन सेंट की खुश्बू ज़रा अफ़रोज़ हो चुकी थी. नरेश ने पहले तो अपने आप को कोसा…फिर ब्रश को कटोरे से निकल के धोया. गुलाब-जामूनों का वो कुछ इंतेज़ाम कर पता इसके पहले वर्मा जी सैलून में पधारे. उनका काफ़ी बकाया था…फिर भी मूँह उठा के चले आते थे. काफ़ी पुराने ग्राहक थे इसलिए बर्दाश्त कर लिए जाते थे. उनके तो घर के बच्चों ने भी धीरेन्द्र नाई को बहुत परेशान किया था…जब आते सैलून कुछ ना कुछ तोड़-फोड़ कर ही जाते…वर्मा जी अपनी बत्तीसी निपॉड कर हर बार एक ही डाइयलोग मार जाते ‘अरे बच्चा है…क्या किया जाए’.
धीरेन्द्र और उसके चेलों नें भी अच्छा वसूला था उन लड़को के जानेयू के समय. बाल मूंडते समय पीछे ‘टीकी’ के अलावा आगे की तरफ छोटी सी ‘चुर्की’ छोड़ दी थी. ऐसा लग रहा था मानो कई छोटे छोटे अमरीश पूरी, किसी बी-ग्रेड फिल्म के विलेन के गेट-अप में घूम रहे हों. सभी लड़के आधे घंटे तक गुस्से में तड़पते रहे…जब ‘पर हेड’ पाँच सौ एक रुपये मिले तभी उनकी ‘चुर्कियों’ को हटाया गया.
वर्मा जी की घुसते ही महेश का मूँह लटक गया…वर्मा जी उसके ही पल्ले पड़े थे…पता नहीं कब उनके पैसे मिलेंगे.
‘क्या महेश…आज तुम ही फ्री है’ वर्मा जी मूड में लग रहे थे.
‘जी बैठिए’ महेश ने मूँह फुलाकर कहा.
‘हें हें हें…बैठते हैं…पहले ज़रा ये गुलाब-जामुन तो चख लें…मलाई मारे हुए इसपर तो’
महेश को एक बार तो इच्छा हुई की उनको रोक ले…पर्रंतु उसे उनके बकाया राशि की याद आ गयी. वो चुप रह गया.
‘थोड़ा अजीब स्वाद है…आज ही का है ना’ वर्मा जी को शेविंग झाग की खट्टी सी महक आई.
‘हाँ हाँ, फ्रेश है एकदम’
‘पता नहीं…चलो हम एक ही खाएँगे’ खाकर वो महेश की कुर्सी में आकर बैठ गये.
इधर कॅबिन में धीरेन्द्र ने वर्मा जी की खनकती हुई आवाज़ सुन ली थी. फिर उसे ये भी समझ आ गया की उसके माँगाया हुआ गुलाब-जामुन पे वो हाथ भी साफ कर रहे थे. उससे अब रहा नहीं गया,उसने जनार्दन बाबू से धीरे से कहा, ‘जी सर, हमको अपने थोड़ा कलाई में दर्द हो रहा है…हम महेश को भेजते हैं, वो आपका अच्छा से मालिश कर देगा’
धीरेन्द्र बाहर आ गया.
‘क्या वर्मा जी, बहुत दिन बाद दिखे…दूसरा सैलून खोज लिए हैं क्या?’
‘अरे नहीं धीरेंदर, बाहर थे, बेटा से मिलने गये हुए थे बंगलोर’
‘अच्छा, वहाँ तो उधार में बाल नहीं काटता होगा’
‘हाँ, और चार्ज भी बहुत करता है जी…बताओ बाल काटने का पाँच पाँच सौ रुपया…और बाल कटवओ तो लगता भी नहीं है की कटा है…बेटा से पूछे तो बोला की स्टाइलिंग करवाए हैं…बताओ हम लोग तो चुप-चाप ‘सब तरफ से छोटा’ करवाते थे..स्टाइलिंग तो कभियो नहीं करवाए’
‘वर्मा जी आपका इतना सुंदर पर्सनॅलिटी है…आपको स्टाइलिंग का क्या ज़रूरत, आपको तो बाल भी मूंड़ दिया जाए तो एकदम ‘शान’ फिल्म वाला कुलभूषण खरबंदा लगिएगा’
वर्मा जी खुश हो गये.
‘चलो आज ज़रा फेस-मसाज कर दो…थोड़ा मूँछ भी ट्रिम कर देना’
‘ज़रूर, अच्छा महेश तुम अंदर जाओ कॅबिन में…हम देख लेते हैं वर्मा जी को’
धीरेन्द्र सबसे सीनियर नाई था…उसकी बात टालना महेश के बस का रोग नहीं था. साथ ही धीरेन्द्र ने उसे चुप रहने का भी इशारा किया था…महेश समझ गया की धुरन्दर नाई के दिमाग़ में कुछ खुराफात चल रही थी.
धीरेन्द्र जानता था की वर्मा जी अव्वल दर्जे के गप्पेबाज थे…दूसरो की बुराई करने में भी उन्हें खूब आनंद आता था. विशेषकर उनका, जिनका रुतबा वर्मा जी से उपर था समाज में…जैसे की जनार्दन बाबू.
‘तब वर्मा जी, सुने की जनार्दन बाबू का सबसे बड़ा पोता मेडिकल निकाल लिया’
वर्मा जी नहीं जानते थे की नये बने कॅबिन में जनार्दन बाबू इतमीनान से मालिश करवा रहे थे. वैसे अपना नाम सुनकर उनके कान खड़े हो गये थे.
‘अरे वो क्या मेडिकल निकालेगा, सब पैरवी से हुआ और पैसा देकर…इतना घून्स कमाए ज़िंदगी भर…उतना ब्लॅक मनी का सदुपयोग कैसे होगा’
‘मगर हम तो सुने थे की मेडिकल का डोनेशन तो अब करोड़ो में होता है’
‘तो तुम क्या जनार्दन बाबू को चिंदी-चोर समझते हो…अरे बहुत पैसा पीटे हैं…पुल निर्माण घोटाला में बहुत बड़ा हाथ मारे थे’
धुरन्दर ने काँटे में फँसी मछली को थोड़ा और ढील दी ,’ मगर इतना सिंपल से रहते हैं…मारुति चलाते हैं…इतना ही पैसा पीटे रहते तो बड़का वाला गाड़ी चलाते’
‘सब दिखावा है जी…असलियत तो हमसे पूछो…उनके घर में एक अंडरग्राउंड कमरा भी है…जिसमे बोरा भर भर के कॅश और सोना रखा है…हम अपने देखे थे, होली में मिलने गये थे तो’
उधर वर्मा जी जलते हुए तेल के कुएँ की तरह आग उगलते रहे, इधर जो तनाव जनार्दन बाबू की मांसपेशियों से मालिश करके धीरेन्द्र और महेश ने निकाला था, वो वापस आ गया था…पहले से बढ़कर.
उन्होने महेश को चुप रहने का इशारा किया. फिर धीरे से कॅबिन से बाहर आए. सामने वर्मा जी कुर्सी पर फेस-मसाज करवा रहे थे. जनार्दन बाबू ने धीरेन्द्र को पीछे हटने का इशारा किया और उसके रॅक पर रखा उस्तरा उठाया. वर्मा जी की आँखें बंद थी.
जनार्दन बाबू ने धीरेन्द्र की हू-बा-हू नकल करते हुए कहा ,’ आपके मूँछ का ट्रिम्मिंग कर रहे हैं, हीलिएगा मत’
जनार्दन बाबू ने फिर किसी उस्ताद नाई की तरह ही उनकी मूँछो की छंटाई कर दी. धीरेन्द्र ने सामने आकर देखा तो उसकी हँसी छूट गयी. तब तक जनार्दन बाबू वापस कॅबिन में जा चुके थे.
धीरेन्द्र की हँसी सुनकर वर्मा जी ने अपनी आँखें खोली. सामने लगे आईने में एक कुख्यात एतिहासिक शख्शियत उनसे रु-बा-रु हुई. चेहरे पे लगे सफेद फेस क्रीम से और ज़्यादा समानता आ गयी थी.
‘ये क्या कर दिए…दिमाग़ सनक गया है क्या तुम्हारा’ वर्मा जी चीख उठे.
‘वर्मा जी, ये तो आजकल का नया स्टाइल है…बच्चन साहब भी अपना नया वाला सिनिमा में ऐसा ही मूँछ रखे हैं…हमको पक्का विश्वास है की भाभीजी तो आपका ये लुक बहुत पसंद आएगा’
‘सच कह रहे हो?’
‘हाँ तो, अगर नहीं आया तो फ्री में क्लीन शेव कर देंगे आपका’
‘क्लीन शेव?…अरे मेरे बाबूजी ज़िंदा हैं अभी’
तभी कॅबिन से वापस बाहर निकले जनार्दन बाबू…जिनके बारे में वर्मा जी पीछले दस मिनिट से कसीदे पढ़े जा रहे थे.
वर्मा जी को जैसे साँप सूंघ गया. जनार्दन बाबू उनके बगल में आकर खड़े हो गये.
‘वर्मा जी…अंडरग्राउंड कमरा का पता आख़िर चल ही गया आपको…अगले होली में आयगे तो ले चलेंगे आपको दिखाने की कितना बोरा रुपया है और कितना सोना का छड़’
‘हें-हें…जनार्दन बाबू…हम आपके बारे में थोड़ी ही ना बोल रहे थे…वो तो हमारे ससुराली में भी एक हैं…जनार्दन नाम से ही…उन्हीं के बारे में’
‘ठीक है. वैसे ये तो बहुत बढ़िया मूँछ का स्टाइलिंग किया है धीरेन्द्र आपका…आपको तो टिप देना चाहिए उसको’
‘हें-हें, आप कह रहे हैं तो अच्छा ही होगा.’
जनार्दन बाबू ने पॉकेट में से अपना फोन निकाला पीछे खड़े धीरेन्द्र को पकड़ा दिया. स्वयं वो वर्मा जी के बगल में आकर खड़े हो गये और सैलून का बाकी लोगों को भी आस-पास जुट जाने को कहा.
‘वैसे आपके इतने शानदार मेक-ओवर का एक फोटो तो बनता है…है की नहीं’
इसके पहले की वर्मा जी विरोध कर पाते, धीरेन्द्र नाई ने एक फोटो सेल्फी बना के और एक वैसे ही निकाल दी. तभी जनार्दन बाबू की नज़र शेविंग क्रीम से सने गुलाब-जामुन पर पड़ी.
‘चलिए बिग-बी का नया लुक पाने की खुशी में मिठाई खाइए हमारे हाथ से’
वर्मा जी ने चुप-चाप फिर से खट्टा सा गुलाब-जामुन निगल लिया.
जनार्दन बाबू ने धीरेन्द्र नाई से कहा,
‘देखा…इसको कहते हैं सहिष्णुता…कितना आराम से वर्मा जी तुम्हारा हिट्लर जैसा स्टाइलिंग को मंज़ूरी दे दिए’
‘जी समझ गये…बस थोड़ा और सहिष्णुता दिखाकर वर्मा जी हमारा बकाया पैसा भी दे देते तो और अच्छा से समझ आ जाता’
वर्मा जी को अब अपनी बेइज़्ज़ती, बिग-बी की बेइज़्ज़ती से कम नहीं लगी.
‘हाँ, कितना बकाया है तुम्हारा…आज ही दे देते हैं’
वर्मा जी के जाते ही धीरेन्द्र ने फिर से गुलाब-जामुन का ऑर्डर किया…इस बार सब के लिए…समोसों के साथ.

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