Nostalgia Series: एक डॉक्टर-पुत्र की कहानी, उसी की ज़ुबानी

एक डॉक्टर-पुत्र की कहानी, उसी की ज़ुबानी-
जब मैने होश संभाला और चीज़ों की समझ होने लगी तो एक दिन पता चला की मेरे पिता एक डॉक्टर थे (अभी भी हैं)…और तो और मेरे दादाजी भी एक डॉक्टर ही थे. डॉक्टर के घर में एक अलग ही सिस्टम होता है…कोई भी बीमारी हुआ नहीं की ‘फिज़ीशियान सॅंपल -नोट टू बी सोल्ड’ का तीन-चार पत्ता पकड़ा दिया जाता था. एक तो ये फिज़ीशियान सॅंपल भी मजेदार होते हैं…एक ‘हाथ’ लंबे स्ट्रीप में कहीं कोने पे दो टॅबलेट छुपे होंगे…ऐसा लगता था 3-D में ‘ढूँड़ो तो जाने’ खेल रहे हों…हर डॉक्टर के घर में कोई एक फेवोवरिट ब्रांड होता था…हमारे यहाँ soframycin था…मेरी अर्धांगिनी भी डॉक्टर पुत्री ही हैं…उनके घर में neosporin. आप गेस कर सकते हैं की आजकल मेरी बेटी को कौन सा मलम लगता है…सही गेस…neosporin राम-बान दवा है, soframycinतो दूध-भात टाइप दवा थी. एक और मित्र के यहाँ लोग ‘sinarest’ भुजिया के जैसा फाँकते थे. खैर, वो सब तो ठीक था, सबसे कष्ट होता था कुछ कटने-छीलने पर. जितना दर्द उस घाव से नही होता था, उससे ज़्यादा डर टेट्नस के सुई से लगता था…’जंग लगा हुआ ब्लेड से कटा है ना…अब तो टेट्नस का सुई लगाना पड़ेगा’… हद तो तब होती थी जब आप ही को भेजा जाता था सुई खरीद के लाने के लिए. बस एक अच्छी बात थी की पिताजी खुद से ही सुई देते थे…और इतने सलीके से देते थे की पटना के मच्छर भी उनके सामने फेल…पता भी नही चलता था की कब सुई अंदर गयी और कब बाहर आई. टेट्नस की सुई का असर छे महीने रहता है…सो सुई लगने के बाद से ही हम अपने आप को ‘शक्तिमान’ से कम नहीं समझते थे, अभेद्य…अक्षय. वैसे डॉक्टर फॅमिली से होने का एक बड़ा फायेदा था…पटना के सभी बड़े डॉक्टर’स के क्लिनिक में कभी वेट नहीं करना पड़ता और चूँकि ये डॉक्टर्स मेरे पिताजी या दादाजी को पर्सनाली जानते भी थे, वो लोग थोड़ा ज़्यादा उत्साहित होकर हमारा इलाज भी कर देते थे. पटना के एक मशहूर बच्चों के डॉक्टर से हम जब भी मिलने जाते, वो हम दोनो भाइयों की बाजीराव जैसी मूँछें बना देते थे…वो भी डॉट-पेन से. दिन भर दोस्त लोग मज़ाक उड़ाते. फिर जब इंजिनियरिंग की पढ़ाई शुरू की तो किसी भी सोशियल ओकेजन पे अगर कोई जान -पहचान के मिल गये तो वो करियर काउन्सेलिंग शुरू कर देते थे ‘क्या जी, पापा डॉक्टर, दादा डॉक्टर, फिर तुमको भी मेडिकल ही लेना चाहिए था’…अब मैं कैसे समझाऊं की मैं कोई रणबीर कपूर तो हूँ नहीं , एक टॉवेल-स्टंट किया और अपने पिता, दादा और पर-दादा की तरह बॉलीवुड में सेट…ना ही मैं राहुल गाँधी हूँ, जो ‘सुबह उठ कर रात में जागने’ जैसे चमत्कार करके अपने परिवार की लेगसी को आगे बढ़ाऊं. पर ये सवाल काफ़ी दिनो तक फेस करना पड़ा था. वैसे जिस आदमी की सुई-सीरिंज देखते ही सिट्टी-पिटी गुम हो जाती हो, उसे डॉक्टर तो क्या, कॅमपाउंडर भी नही बनना चाहिए. मेरी आवाज़ पिताजी से काफ़ी मिलती है…कई बार मरीज फोन करते और मुझे ही अपनी प्राब्लम बताने लगते ,’ परनाम डागडार साहेब, आप जो आँख में ऑपरेशन किए थे, उसमें कुछ कुन्मुना रहा है…क्या करें?’…कई बार इच्छा हुई की अपना ही कोई इलाज बता दूँ ‘ऐसा कीजिए, रोज़ सुबह कान पकड़ के दस बार उठक-बैठक…’
अब अमेरिका के अजीब से मेडिकल सिस्टम का सामना करने के बाद पटना का ये एक्सपीरियेन्स बहोत याद आता है (अच्छे सेन्स में).

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