पटना का जाड़ा

Wintery Nostalgia:
बिहारी होने के नाते, मुझे पर्सनली कभी ठंड नही लगी. हाँ, जाड़ा बहुत लगता था लेकिन. डिसेंबर के शुरुआत तक हाफ-स्वेटर सब निकल जाता था. टीन के बक्सा में कोन्च के रखी गयी रजाईयों और कंबल वग़ैरह को ‘सुखाने’ का कार्यक्रम भी अभी ही शुरू होता था…भारी भरकम रज़ाई को टांग के तीन-मंज़िला मकान के छत पे ले जाकर, दिन भर के लिए छोड़ दीजिए…शाम तक नप्थलिन बॉल का दुर्गंध गायब. पर्रंतु कभी कभार कोई बहुत ही दानवीर टाइप का पंछी अपनी निशानी भी दान कर जाता था…आपकी वाली रज़ाई पर…एक दम स्ट्रॅटेजिक पोज़िशन पे. खैर, रज़ाई में रोल करके सोने का जो सुख है, उसका कोई जोड़ नहीं. अमरीका में तो घरों में हीटिंग होती है…बाहर भले बरफ गिर रही हो…आप अंदर आराम से ‘बेरमूडा’ पहन के घूम सकते हैं. पर ये आराम पटना में कहाँ मिलता था, वो भी 15-20 साल पहले. जब कड़ाके की ठंड पड़ती थी, तो अलाव का इंतेज़ाम करते थे. लोहे की कढ़ाई में बगीचे से जमा किए हुए आम के पेड़ की सूखी डालियां. अगर ध्यान नहीं दिया और हरी-भरी टहनियाँ डाल दी आग में, तो घर में जैसे अश्रु-गॅस का गोला फट जाता था. फिर जो थोड़ी बहुत गर्मी जमा हुई थी…वो धुआँ भागने के चक्कर में ख़तम.
मुझे वैसे ‘जाड़ा’ सबसे अच्छा सीज़न लगता था. एक तो इस समय की फल-सब्जियाँ मुझे ज़्यादा पसंद थी…खाने को लेकर मम्मी से पीटाने का गुंजाइश कम रहता था. मोटे मोटे जॅकेट पहन कर आदमी अपने आप को थोड़ा ज़्यादा तगड़ा और स्मार्ट समझता था. पर मफ्लर और टोपी से मुझे ज़्यादा प्रेम नही था. एक तो मेरे बाल थोड़े अजीब से हैं…टोपी कितनी भी ‘लूस’ क्यूँ ना हो, उतरने के बाद लगता था जैसे मुझे अभी अभी 440 वॉल्ट का करेंट लगा है. हीरो बनने में कोई कसर तो नहीं रहती थी, पर एक छोटी से प्राब्लम थी…मुझे टॉन्सिलिटीस था बचपन से…और जहाँ थोड़ी हेरोगीरि दिखाई ठंड में…की अगले दिन से सर्दी-बुखार का सिलसिला शुरू. उससे भी मजेदार बात की मैं दवाई बहुत साल तक निगल नही पाता था… इस दुनिया के इतिहास में paracetamol शायद सिर्फ़ मैंने ही पीस के, bournvita में मिला के खाने की चेस्टा की होगी. bournvita से काम नहीं चला तो शहद में मिला के. किसी तरह रो-धो के इलाज होता था…पर मफ्लर-टोपी की गुलामी फिर भी अस्वीकार्या थी. जाड़े के मौसम में क्रिकेट भी शबाब पे रहता था. कभी कभी तो इतनी ठंड होती थी की टेन्निस बॉल भी संभाल कर खेलनी पड़ती थी. बॅट के हॅंडल पे लगी तो भाई, दस मिनिट तक उंगली झारते रहो. पटना में तो कुहासा भी खूब लगता था. बड़ा मज़ा आता था सुबह सुबह कुहासे में स्कूल जाने में…उस दिन कोई लेट-लाइन नहीं लगती थी स्कूल में. और सबसे मजेदार काम…नहाना…अगर ‘लाइन’ कट गया…तो हो गया बंटाधार…बाल्टी में मग…मग पे आपकी उंगलिया…पर्रंतु जो चेंज ऑफ पोटेन्षियल एनर्जी चाहिए एक मॅग पानी को बाल्टी की हाइट से उठ कर आपके सिर के हाइट तक पहुँचने के लिए…वो आज आपके लिए चाँद पे जाने वाले सॅटर्न रॉकेट की ताक़त से भी ज़्यादा लग रहा है. आप बुत बनके खड़े हैं…तभी समय का ध्यान आता है..फिर आप मॅग के पानी को उपर हवा में उछाल कर…तुरंत ही अपनी करनी पर अपने आप को कोसते हुए, उस गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित पानी से बचने की असफल कोशिश करते हैं…पर वो रात का ठंडा पानी आपको आख़िर भींगा ही देता है…फिर क्या…हर-हर-गन्गे. एक और मजेदार बात होती थी जाड़ो में…घर की लॅडीस लोग, आँगन में बैठ कर स्वेटर बुनते हुए…जो भी वहाँ अनुपस्थित थी…उनकी ‘तारीफों’ के पुल बाँधती रहती थी. मैदान में खेल रहे कौन से बच्चे आपस में भाई हैं…ये उनके स्वेटर की डिज़ाइन से समझ आ जाता था. सारी मम्मी-चाची-फुआ लोगों का एक ही ठिकाना होता था-लालजी मार्केट…वर्धमान का ऊन का स्वेटर..प्यूर वूल…eeze में ही धोना.
जाड़े की सुबह, गरमा गरम चाय की प्याली को कोई उसके हॅंडल से नही पकड़ता था…बल्कि अपनी ठंडी हथेली से उसे चारों तरफ से लपेट के…इस बार सुने हैं की जाड़ा ठीक से नही ‘पड़’ रहा है. ग्लोबल वॉरमिंग का असर है शायद. आशा करता हूँ, कम से कम एक-आध हफ़्ता तनी कड़कड़ा के पड़े…ताकि लोग अपने अपने कमरों से निकल कर, एक अलाव के चारो तरफ बैठ कर अपने दुख-सुख बाँटें.

3 thoughts on “पटना का जाड़ा”

  1. Dear Chintu
    Your short hindi stories temind me of another Phanishwarnath Renu
    Keep it up.
    Was reading some of your posts through Rajesh

    1. Thank you so much for your kind words sir. That comparison makes me feel more motivated to aspire for the high standards set by my favorite writer, Renu ji.

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