पिट्सबर्ग से पटना

* सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं.

चाय पर एक मोटी मलाई की परत जम चुकी है. जिसके लिए ये चाय आयी थी, वो अभी भी चद्दर तान के सो रहे हैं. पिछले तीस साल से इस कमरे और अब इस घर की मालकिन, मिसेज नूतन पांडेय, वापस कमरे में आयी. अँधेरे कमरे में अभी तक बिस्तर पकडे अपने पतिदेव की आकृति देखकर उनका मूड थोड़ा सा ख़राब हुआ.
‘आपको आधा घंटा पहले चाय देकर गए, आप अभी तक सोये ही हुए हैं? अब पहुँचने ही वाला है सब, रिशु फ़ोन किया था एयरपोर्ट से निकलने से पहले’
‘हूँ!’
‘सुनिए, आप को जो गुस्सा है न उसको इस चाय के साथ पी जाइये…एक बाद ध्यान में रखियेगा, आप अगर अपने ख़ुशी से आशीर्वाद नहीं दीजियेगा तो बाकि लोग क्यों देगा? सब वैसे अल -बल ताना सुनाये हुए है हमको…मगर ओमी के ख़ुशी के लिए हम सबका बकवास नज़रअंदाज किये हुए हैं. आप भी अपना ये रुसना छोड़िये और बाहर आइये तैयार होके’
बिस्तर पर पड़े थे डॉक्टर ब्रिज भूषण पांडेय…पटना मेडिकल कॉलेज में प्रोफेस्सर…हड्डी रोग विशेषज्ञ. पटना में खूब जमाया हुआ प्रैक्टिस था. बड़ा बेटा ओमी, यानी ओमकार, अमेरिका में पढ़ रहा था पिछले पांच साल से. बहुत कुछ सोचे हुए थे डॉक्टर साहब…न्यू पटना क्लब में शादी होगा…मौर्या में रिसेप्शन…पटना में न्यूज बन जाए, ऐसा शादी करेंगे बेटा का…यहाँ बेटा का शादी न्यूज तो बना…वो भी हेडलाइन…मगर दुसरे तरीका से. आज वही ब्रेकिंग न्यूज, पटना में लांच होने आ रही है.
ओमी अपनी धर्मपत्नी जेसिका के साथ पटना पधार रहे हैं. अमेरिका में ही दोनों ने कोर्ट में शादी कर ली थी. साथ में पढ़ती थी…दो साल पहले पार्टी में मिले…डेढ़ साल बाद प्रपोजल…ओमी ने पटना परिवार को बहुत मनाने की कोशिश की फिर हार के अमेरिका में ही कोर्ट मैरिज कर लिया. वो तो अभी आना भी नहीं चाहता था…मगर जेसिका ने ही झगड़ा करके प्लान बनवाया.
पांडेय जी धीरे से उठे. बाहर गोधूलि बेला हो चुकी थी. कुरता पैजामा पहने…ठंडी चाय एक घूँट में गटक कर नीचे पहुंचे. घर में छोटा सा हुजूम जमा था…नजदीकी दोस्त एवं परिवार वाले. सबसे में एक अलग उत्साह था…इस पीढ़ी की पहली बहु…वो भी अमेरिकन…वाह ओमी बाबू!
मगर बात बनाने वालों को कैसे रोकियेगा, गार्डन में चल रही गप्प के कुछ डायलॉग डॉक्टर साहब के कानो में पड़े. फुफेरी बहन के पतिदेव, माधव बाबू लगे हुए थे,
‘अरे, जानते नहीं हैं, अमेरिकन सिटीजन से बियाह करने पर सीधे अमेरिका का नागरिकता मिल जाता है…कउनो ग्रीन कार्ड का चक्कर नहीं…उसी के लिए किया होगा…फिर दो -तीन साल में छोड़ देगा…वैसे भी अमेरिकन सब दो-तीन साल से ज्यादा टिकती कहाँ है’
डॉक्टर साहब ने सोचा, कितनो का मुँह बंद करेंगे…जितने मुँह, उतनी बातें. नूतन जी ठीक ही कह रही थी, अभी बस परिवार का ख़ुशी किस चीज़ में है वही देखना है. बाहर गार्डेन में पहुंचे. गप्प का टोन चेंज हो गया तुर्रंत. डॉक्टर साहब ने माधव बाबू को पकड़ा पहले,
‘तब मेहमान, क्या हाल चाल है’
‘ठीक है भूषण भैया, बस थोड़ा बैक पेन है’
‘योग कीजिये भोरे उठ के, सब ठीक हो जायेगा. और पिंकी नहीं दिखी…अभी तो आयी हुई थी न’
‘हाँ हाँ…शायद मार्किट गयी थी…लगता है आ गयी’
घर के बाहर एक रिक्शा रुका था. पिंकी अंदर आयी…डॉक्टर साहब उसका चेहरा देख के एकदम सकपका गए…जैसे कोई पेंट पोत दिया हो. पिंकी ने आकर प्रणाम किया.
‘खुश रहो ! तुमको एनीमिया हो गया है क्या? ऐसा सफ़ेद चेहरा’
‘जी मामा, अभी जस्ट ब्यूटी पार्लर से आ रहे हैं…मेकअप करवा के’
पीछे खड़ी नूतन जी सब समझ रही थी…अमेरिकन से भी पटिदारी…पिंकी, वैसे ही बहुत गोरी थी…आज लेकिन उसको जेसिका से भी गोरी दिखना था. वैसे नूतन जी ने खुद भी ‘रेखा’ से काम नहीं लग रही थी, हेवी कांजीवरम साड़ी में. वीडियोग्राफी भी होने वाला है भाई.
जेसिका को वीडियो चैट में देखे थे दोनों व्यक्ति…सुन्दर तो थी ही…समझदार भी लगती थी. मगर वीडियो और असल में तो बहुत फरक होता है…वीडियो पर लोग कभी कभी प्रिटेंड भी कर देते हैं.
छोटा बेटा रिशु, एयरपोर्ट पर रिसीव करने गया है. अपनी गाडी का हॉर्न…नहीं…कोई और. डॉक्टर साहेब अब घूम कर तैयारियों को देखा. उनकी धर्मपत्नी ने सारा इंतज़ाम फिट कर दिया था…सब बिध, नयी दुल्हन के गृह प्रवेश वाला सेट किया हुआ है. अमेरिकन है तो क्या हुआ…यहाँ का कल्चर भी तो सीखे थोड़ा.
अब तो डॉक्टर साहेब को भी थोड़ी उत्तेजना होने लगी है. सभी की निगाहें बाहर गेट पर टिकी हुई हैं…परिवार के कनिष्ठ सदस्य तो बाहर सड़क पर ही मोर्चा डाले हुए हैं…कौन पहले गाडी देखेगा और अंदर जाके के खबर देगा. जीत, दीपू मास्टर की हुई.
‘आ गए…आ गए…आ गए’
लेडीज लोग का हुजूम बाहर पहुंचा. रिशु ने धीरे धीरे कार अंदर डाली. लोग एक झलक पाने को बेक़रार…मानो कोई सेलेब्रेटी आयी हो . वो बैठी है अंदर…वाह…खूब सुन्दर लाल बनारसी साड़ी…आँचल है सर के ऊपर.ओमी बाबू पूरा ट्रेनिंग दे के लाये हैं.
गेट खोला गया दुल्हन के साइड का…गांव से आयी लेडीज लोगों ने अपने अंदर की आशा-लता को जगाया और शुरू हो गयी कोरस में. बहु मुस्कुरा रही है मंद मंद…इतने सारे अचीन्हे चेहरे, बस उसी को निहार रहे हैं…उसकी आरती की जाती है. पीछे से ओमी उसे गानों का मतलब और आरती का वैल्यू समझा रहा है, अंग्रेजी में. वो नीचे उतरती है और सामने खड़े डॉक्टर पांडेय और नूतन देवी के चरणों को झुककर स्पर्श करती है. दोनों व्यक्ति एक दम गद गद हो जाते हैं. नूतन देवी तो जेसिका को गले लगा लेती हैं. लेडीज लोग अब जेसिका को लेकर अंदर बाकी विध विधान पूरा करने के लिए, जेंट्स लोग वापस गार्डेन में.
मगर जेसिका को ऐसे थोड़े ही अंदर जाने मिलेगा…पिंकी दरवाज़ा छेंक के खड़ी है. अंग्रेजी झाड़ने का भी मौका मिला है,
‘आई वोन’ट लेट यु गो इनसाइड टिल आई एम् पेड सम मनी…डॉलर्स आर फाइन’
जेसिका एक पल के लिए तो पिंकी का खतरनाक मेकअप देखकर चकित रह गयी. फिर उसने हाथ बढ़ाया और भारी अमेरिकन एक्सेंट में वाली हिंदी में कहा,
‘टुम पिंकी हो न…अचा लगा टुम से मिलखे’
‘यु कैन स्पीक हिंदी…ओ माई गॉड!’
‘थोड़ा सीखा है…बाकी अप्प लोग सीखा देना’
‘फिर तो उसका भी फीस लगेगा’
ओमी तब तक अपने पर्स से कुछ हरे हरे नोट निकाल चूका था…बीस डॉलर के पांच नोट. पिंकी के हाथ में रखते हुए बोला,
‘तुम्हारा हिंदी सीखगी तो अपना अंग्रेजी भी भूल जाएगी…अभी बस ये पकड़ो सौ डॉलर और रास्ता खाली करो’
पिंकी के चारो तरफ भीड़ जमा हो गयी…बहुत लोगो ने डॉलर कभी देखा नहीं था. अमेरिकी राष्ट्रपति ‘जैक्सन’ की फोटो है बीस के नोट पे. पिंकी के पिताश्री ने स्पर्श एवं गंध परिक्षण किया सभी नोटों का,
‘इससे अच्छा क्वालिटी तो अपना नयका नोट सबका है…और इ किसका फोटो लगा दिया है…माइकल जैक्सन के बाबूजी है का ये’
पिंकी के पांच नोटों में से एक गायब हो चूका है इस हो हंगामे में. बेचारी मुँह बना के घूम रही है…ज़रूर देवघर वाली चाची की छोटकी बेटी दबायी होगी. भारी चोरनी है.

इधर जेसिका को घर के अंदर लाया जा रहा है…दौड़ी में पैर रखवा के. साड़ी में तो वैसे ही उसका बैलेंस नहीं बन पा रहा था…दौड़ी में पैर रख रख के आने में थोड़ा मुश्किल हो रहा है उसको. बगल में पिंकी की मम्मी, कुसुम फुआ ने आकर हाथ थामा. जेसिका के सर पर नूतन जी ने सूप रखा हुआ है…जेसिका लम्बी है काफी…नूतन जी ठीक से दबा नहीं पा रही. पीछे से किसी ने कमेंट मारा,
‘ज़ोर से दबाइये भाभी…ये तो वैसे भी अमेरिकन है तो और ज़ोर से…वरना दब के नहीं रहेगी’
नूतन जी ने टोन में व्यंग की मात्रा से पहचान लिया की ये गया वाली की आवाज़ है, जिनकी अपनी बहु छुट्टियों में ससुराल से ज्यादा समय मायके में बिताती थी.
‘आप तो लगता है की कुछ ज्यादा ज़ोर से दबा दी थी विशाखा को…बेचारी इतना दब गयी आपसे की ससुराल भी नहीं आती है’
अगल बगल की लेडीज लोग समझ की इशारा किस तरफ था. दौड़ी वाला बिध करके जेसिका को एक कमरे में बिठाया गया. ओमी के सभी चचेरी, ममेरी, मौसेरी बहनो ने आकर उसे घेर लिया. उनकी लीडर नेहा ने गप्प शुरू की,
‘हाई, आई ऍम नेहा, ओमी’ज कजिन…हाउ वास् योर फ्लाइट’
‘फ्लाइट वास् ओके…आप हिन्ढी में बात करो मुझसे…मैं दो महीने क्लास की हूँ…आई नीड प्रैक्टिस’
‘अच्छा…सॉरी…लीजिए हिंदी में बात करते हैं…आपको कैसा लग रहा है…डीड यु एक्सपेक्ट सो मेनी पीपल’
‘यस…ओमी हैड टोल्ड में…बोला था बहुट लोग आएंगे…आई लव दी कलर एंड टेक्सचर ऑफ़ योर स्किन…व्हाट क्रीम डु यु यूज?’
‘सीरियसली?…यहाँ मम्मी कहती रहती की मेरा रंग थोड़ा और साफ़ रहता तो अच्छा रहता…आई मीन…इफ आई वाज मोर फेयर…यु नो…इसलिए मैं फेयरनेस क्रीम ज्यादा लगाती हूँ’
‘हाहाहा, वहां वाइट लोग डूप में लेट लेट कर तुम्हारे जैसा टैन्ड लुक लाने के लिए परेशान रहता है’
धीरे धीरे कमरे में और लोग पहुंचे. बोकारो वाली मौसी का स्टैण्डर्ड था…कुछ न कुछ उल्टा पुल्टा बोलके हंसी खेल के माहौल को ख़राब करने का…उनका अपना थोड़ा टेढ़ा सेंस ऑफ़ ह्यूमर था. उन्होंने जेसिका से पुछा,
‘अमेरिका में तो लोग बहुत जल्दी डाइवोर्स दे देता है न…सुने हैं की एक एक औरत का पांच पांच शादी होता है कम से कम’
रूम में सन्नाटा छा गया. शादी के घर में कोई सीधे डाइवोर्स की बात कर दे. जेसिका को भी थोड़ा अजीब लगा सुनकर, मगर उसने ऐसे सवालों का मुंह तोड़ जवाब देना अपनी आदत बनायीं हुई थी,
‘बहुट आचा सवाल पूछे अप. आई विल आंसर, बट पहले अप्प ये बताइये, इंडिया में इतने रेप और फीमेल चाइल्ड किलिंग क्यों होटे हैं’
बोकारो वाली मौसी डिफेंसिव हो गयी, अपने मुँह में कुछ बोली और कमरे से चली गयी.
– क्रमशः

 

अब तक- पटना के ओमी बाबू, अपनी अमेरिकन पत्नी को पहला बार अपने घर लाये हैं. उनकी माताजी ने नयी दुलहिन के स्वागत वाला सब सेटिंग करके रखा है. आगे पढ़िए.

बोकारो वाली मौसी तो मुँह ऐंठ के रूम से चली गयी. जेसिका का जवाब सुनकर बाकी लेडीज भी समझ गयी थी की इसके सामने फ़ालतू का तेज़ बनना, खतरे से खाली नहीं. कुछ समय बाद, नूतन जी ने ‘मुँह दिखाई’ की रस्म की शुरुआत की. बच्चों को कमरे से भगाया गया और लेडीज ने आकर उनकी जगह पकड़ ली. अब ये लोग का अपना तरीका होता है बात चीत का…किसी के सामने ही उसका क्रिटिकल एनालिसिस करके, टिपण्णी करने में इन्हें कोई आपत्ति नहीं थी…भले, उनकी ‘सब्जेक्ट’ को आप्पत्ति हो तो होते रहे. लोग शुरू हो गए,
‘नाक थोड़ा ज्यादे बड़ा है…लम्बी भी थोड़ा कम रहती तो अच्छा होता’
‘रंग तो बहुत साफ़ है…मगर दूबर है बहुत’
जेसिका ने बगल में बैठी नेहा से, ‘दूबर’ का मतलब पुछा. फिर, शायद पांडेय परिवार के इतिहास में किसी बहु ने पहली बार अपनी चाची-मौसी-मामी सास लोग को मोदीजी की तरह अपने ‘मन की बात’ बताई,
‘हम दूबर नहीं, हैल्दी हैं…हाँ, आप मगर तोड़ी मोती ज़रूर हैं…आप भी…और आप भी…आपके हाइट के कम्पैरिजन में वेट ज्यादा है…यु आल नीड तो रेडूस योर वेट’
लीजिये, सबसे जूनियर स्टूडेंट ने ही सबकी रैगिंग ले ली. अब उसकी सास, नूतन जी कमरे में आयीं, लाल रंग का वेलवेट कवर वाला एक डब्बा लेकर. ऊपर ‘ज्योति अलंकार, कंकरबाग और पांच ठो फ़ोन नंबर. खोलकर, जेसिका के हाथ में रख दी…बाकि लेडीज एक दूसरा पर गिरी जा रही हैं, सेट की एक झलक के लिए.
‘बाह…ओमी की मम्मी तो कोई कसर नहीं छोड़ी हैं’
जेसिका ज्यादा ज्वेलरी नहीं पहनती थी…मगर, उस सोने के सेट की कारीगरी ने उसका मन मोह लिया. फिर कमरे में एंट्री की परिवार की सबसे ज्येष्ठ सदस्य…डॉक्टर पांडेय की चाची…अस्सी के ऊपर ही उम्र होगी…नूतन जी ने चाची का हाथ थामा. चाची जी की सुनने समझने की क्षमता थोड़ी क्षीण हो चुकी थी,
‘यहाँ बैठिये चाची…देखियऊ के हई…ओमी के दुल्हिन’
चाची जी ने चश्मा एडजस्ट करके देखा…जेसिका अपनी चौड़ी से मुस्कान लिए उनकी आँखों में झाँक रही थी.
‘बाप रे…एक दम उज्जर हई…की नाम हाउ बौआ?’
नेहा ने ट्रांसलेट करके जेसिका को अपना बोलने को कहा,
‘जेसिका’
‘किसका? तोहर नाम पूछइ छिये’
‘हाँ तो बताई न…अमेरिकन नाम हई…जेसिका’
‘नै बुझाई छौ हमरा’
‘आप इसको जस्सी बुलाइये’
‘ठीक है…ले हो जस्सी बौआ…दादी के तरफ से आशीर्वादि…बहुत दिन से सहेज के रखले रहिये र ‘
चाची जी ने एक बेहद सुन्दर कान का सेट जेसिका के हाथों में रखा. जेसिका तो ख़ुशी से फूली नहीं समां रही. उसे शायद इस रस्म के बारे में ठीक से पता नहीं था…इतनी सारी जेवेलरी !! वाओ !!
जेसिका ने एक और बात नोटिस की, सभी गोल्फ बाइस या बीस कैरट थे…अमेरिका में ज्यादातर गहनों में दस कैरट गोल्ड यूज होता है. इधर नूतन जी सबका दिया नोट कर रही थी…जो जैसा दिया है, उसको वैसा ही मिलेगा. ले…बकरोहर वाली तो वही ‘टॉप्स’ चला दी जो नूतन जी ने, ‘गया वाली’ के यहाँ दिया था. दुनिया गोल है भाई.
खाने पीने का समय. जेसिका को भी कुछ पकाना है…नूतन जी ने कहा,
‘तुम खाली सब पकाने का सामान टच कर लो’
‘नो मम्मी, मैं अच्चा खाना पकाती हूँ…आई विल मेक समथिंग’
‘अच्छा, आओ, परांठा बन रहा है…एक तुम ट्राई कर लो’
जेसिका ने एक परांठा बेला…थोड़ा अलग आकर का हो गया. इधर किचन की गर्मी में उसकी थोड़ी हालत ख़राब होने लगी. नूतन जी ने वापस रूम में जाने का आदेश दिया. जेसिका का बनाया हुआ परांठा टेबल पर पहुंचा.
‘भाभी के हाथ का परांठा…किसको चाहिए’
रिशु ने हाथ उठा दिया.
‘जा…ये कैसा शेप है…श्री लंका का मैप लग रहा है…हाहाहा’
सामने बैठे रिशु के पिताजी ने डायलॉग मार दिया,
‘तुमसे आज तक पानी भी गरम हुआ है ठीक से…अरे, श्री लंका हो, चाहे नेपाल…अंदर जाके तो पाकिस्तान बनना है उसको…खाओ चुपचाप’
अगले दिन, जेसिका ने अपनी सासु माँ से कुछ कॉटन के कपड़े खरीदने की इच्छा जाहिर की. गर्मी में कितना सिल्क और बनारसी टांग के घुमते रहती. ओमी ने गाड़ी निकाली.
‘हनुमान नगर में मोटा भाई ड्रेस वाला, वहीँ चलो, अब सब कुछ मिलता है इधर भी’
जेसिका ने एयरपोर्ट से आते समय नोटिस नहीं किया था, मगर अब पटना के भगवान् भरोसे ट्रैफिक को देखकर उसकी भगवान् में आस्था और मजबूत हो गयी. उसने सोचा,
‘कोई अदृश्य अलौकिक शक्ति ही, इतने रैंडम, अनियमित ट्रैफिक को कण्ट्रोल कर सकती है…और शायद अपने हॉर्न से ही ये सभी उस अलौकिक शक्ति का आह्वान करते रहते हैं हर पांच मिलीसेकंड में’
ओमी को हंसी आ रही थी…एक साइड ‘सिटी बस’ और दूसरी साइड एक टेम्पो के बीच दबी उनकी गाड़ी में, वो अमेरिकन लड़की थोड़ी हतप्रभ और भयभीत सी दिख रही थी.
मोटाभाई में जाकर बैठे ये लोग. साड़ी दिखाने वाला लड़का सब में मार…फॉरेनर लईकी को कौन अटेंड करेगा. दूकान के मालिक ने फटाक से कोल्ड-ड्रिंक मंगवाया. जेसिका ने रेफूज कर दिया. दूकान मालिक बुरा मान जाता, मगर जेसिका को हिंदी बोलते देख उनकी बांचे खिल गयी,
‘वो कलर में धिखाओ…नीचे…और नीचे…यस, डट वोन’
दूकान के बाहर हुजूम…बहुत लोगों ने आज तक फॉरेनर नहीं देखी थी…ज़िंदा.
वापस घर. रास्ते में नूतन जी ने ओमी को, अशोक जी की दूकान पर रुकने को कहा.
‘साबूदाना लेना है’
गाड़ी से जेसिका भी उतरी. नाप तौल के बाद पैसे देने की बारी आयी. अशोक जी,
‘पाव भर साबूदाना…पैंतीस रूपया…और बोलिये’
नूतन जी का सारा चेंज मोटा भाई पर ही ख़तम हो चूका था. उन्होंने जेसिका से पुछा तो उसने अपने पर्स से दो हज़ार के कड़कड़ा नोट निकाल के पकड़ा दिया.
वैसे तो अशोक जी बहुत ठन्डे दिमाग के स्वामी थे…उनका पारा लेकिन एक ही बात पर हाई होता था…खुदरा. पैंतीस रूपया का सामान के लिए कोई दो हज़ार का नोट निकाले, ये अशोक जी नज़र में ऐसा अपराध, इंडियन पीनल कोड की किसी दफा के तहत दंडनीय होना चाहिए. वो किसी भी खुदरा/चेंज मांगने वाले को ऐसे देखते जैसे उसने, उनकी पुश्तैनी ज़मीन पर दावा ठोक दिया हो. मगर आज बात दूसरी थी…आज इतना सारा चेंज उनसे, एक सुनहले बालों,नीली आँखों और दूध जैसे सफ़ेद स्किन वाली एक हिन्दीभाषी अमेरिकन मांग रही थी. नूतन जी ने जेसिका को इंट्रोड्यूस करवाया. अशोक जी थोड़ा खुश हुए,
‘बहुत बड़ा नोट दे दिए हैं…कोई बात नहीं आप लोग तो एक्सचेंज करवाए होंगे एयरपोर्ट पर…वहां तो बड़के नोट दे दिया होगा…लीजिये पूरा चेंज कर दिए आपका’
जेसिका ने मुस्कुराते हुए पैसे ले लिए, अशोक जी तो गंगोत्री में डुबकी लगा आये वहीँ खड़े खड़े. ज़िन्दगी भर की अंग्रेजी को निचोड़ कर बोले,
‘भेरी नाइस टू मीट यु…और बोलिये’
जेसिका ने भी अपनी हिंदी को निचोड़ा,
‘अच्चा लगा आपसे मिलखे’
नूतनजी मुस्कुराते हुए गाड़ी में आकर बैठी.
कल इनको पुश्तैनी गांव जाना है, सुबह सुबह, देवता पूजने.

 

 

 

अब तक – पटना के ओमकार पांडेय, अपनी अमेरिकन दुल्हन के साथ घर आये हैं पहली बार. दुल्हन का अच्छे से स्वागत सत्कार हो चूका है. अब गांव जाना है.

ओमी का मूड ठीक नहीं था. उसे बिलकुल भी इच्छा नहीं थी की जेसिका उसके ‘घर’ यानी गांव जाए. वो तो जेसिका को पटना भी नहीं लाना चाहता था, मगर माँ की ज़िद थी.
आज गांव जाना है…पटना से करीब पचास किलोमीटर दूर…पटना मुज़्ज़फरपुर हाईवे पर बसा, बैकटपुर. घबराइए नहीं…यहाँ किसी भी तरह का बायकाट नहीं किया जाता था…असल नाम ‘बैकुंठपुर’ था…लोगों ने अपने आलसपन में इतने सुन्दर नाम का बायकाट कर दिया. डॉक्टर पांडेय का पुश्तैनी मकान था यहाँ…ज़मीन जायदाद भी इतनी थी की बिना मतलब का सिरदर्द बनी रहे. डॉक्टर साहेब भी अब ज्यादे नहीं आते थे. कौन आकर अपने बाल नोचवाये. आज लेकिन शुभ कार्य के लिए जाना था…पिछले साल देवता पूजने का प्लान बनते बनते रह जाता…कभी रिशु का एग्जाम तो कभी अपने हॉस्पिटल में बीजी. इस बार, नूतन जी ने सपर के प्रोग्राम बनाया है. सुबह सात बजे निकलने के डेडलाइन दिया गया था…नौ बजे गाड़ी घर से निकली.
रिशु ड्राइव कर रहा है. मगर ये कौन सा रास्ता पकड़ रहा है, ओमी ने टोका,
‘किधर से ले जा रहे हो? गाँधी सेतु तो ओल्ड बाईपास से पकड़ना होता था न?’
‘भैया, गांधी सेतु भूल जाइये…अब नया वाला पुल खुल गया है…डबल डेकर…गाँधी सेतु में तो तीन घंटा जाम में फंसे रहते’
ओमी ने पहली बार नया वाला पुल देखा,
‘अच्छा बनाया है…जेसिका!…लुक हाउ इम्प्रेसिव इज दिस ब्रिज…सो मच स्टील’
जेसिका भी इम्प्रेस्सेड है भाई…इतना लम्बा पुल. नीचे गंगा जी. कुछ समय बाद नदी ख़त्म…खेत शुरू. जेसिका ने ऐसा नज़ारा शायद ज़िन्दगी में कभी नहीं देखा था,
‘ओह माय गौश! दी लैंड सिम्स टू बी कवर्ड इन गोल्ड’
खेतों में गेहूं काटने को तैयार है…पुल की ऊँचाई से ऐसा लगता है जैसे सच में किसी ने सोने का वरक चढ़ा दिया है ज़मीन पर. ये अलग बात है, की किसान को उस सोने जैसे गेहूं की असली कीमत, कभी नहीं मिलती.
उनकी गाड़ी हाजीपुर क्रॉस कर रही है…लीजिये, जिसका डर था, वही हुआ…बरौनी लाइन वाला गुमटी, बंद. बड़ी गाड़ी देखकर बहुत सारे छोटे बच्चे, केला, लाई वगैरह बेचने आ गए. जेसिका विंडो पर ही बैठी है. इससे पहले की ओमी मना करता, उसने विंडो नीचे किया…विदेशी लड़की को देखकर बच्चे थोड़ा ज्यादा उत्साहित हो गए,
‘अरे फ़ौरन के लेडीज है…दाम बढ़ा के बोलिहे’
जेसिका ने रामदाना लाई वाले को इशारा किया,
‘एक पैकेट किटने का?’
फ़ौरन लेडीज के मुँह से हिंदी सुनके पहले तो लाई वाला लड़का हैरान हुआ, फिर जवाबी करवाई करते हुए, उसने अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में गोला दागा,
‘मैडम…भेरी स्वीट…ओनली हंड्रेड रुपीज’
‘नाह…बहुट महंगा…ट्वेंटी रुपीज में दोगे?’
ओमी खुश हुआ, उसने जेसिका को बार्गेनिंग की जो ट्रेनिंग दी थी, वो रंग ला रही थी.
‘लाई वाले लड़के ने आखिरी दांव मारा,
‘फिफ्टी’
जेसिका ने पैकेट ले लिया…उसे अंदाज़ नहीं था की रामदाना लाई कितना मीठा हो सकता है…पहले बाइट में ही लगा जैसे उसके मन-मंदिर में सैकड़ों घंटियां बजने लगी. रिशु ने पुछा,
‘देखिये…यहाँ बच्चा लोग को भी ये सब करना पड़ता है…दे आर सच स्माल किड्स’
जेसिका ने मगर उन बच्चो पर तरस खाने के बजाय दूसरा ही एंगल पकड़ा,
‘वेल…व्हेन आई वास् यंग…वी वुड आल्सो सेल कूकीज…डोर-टू -डोर…गर्ल स्काउट्स का नाम सुने होंगे’
नूतन जी को आश्चर्य हुआ, कैसे माता पिता थे इसके जो बच्चा सबसे,बिस्कुट बेचवाते थे. लीजिये, आ गया डीजल इंजन, हॉर्न बजाते हुए.
कुछ समय बाद, गाड़ी बैकटपुर के लिए हाईवे से टर्न मारी.
पांडेय परिवार का पुश्तैनी मकान, खपरैल का छत…सामने पांच मोटे मोटे पिलर…वरांडा…अंदर बड़ा सा आँगन…कोने में चांपाकल…नया शौचालय भी बना था पीछे. एक ही कंपाउंड में तीन घर. सामने के अहाते में पूरा हुजूम जमा है…जेसिका को आश्चर्य हुआ, बाप रे! कितने सारे बच्चे.

लेडीज लोग सामूहिक गायन में लीन हैं. गाते गाते ही जेसिका को गाड़ी से उतार के अंदर ले जाय जाता है. इधर डॉक्टर पांडेय का अनौपचारिक मेडिकल कैंप लग चूका है बाहर के बरंडा में. पहला मरीज़,
‘आम के पेड़ से गिर गया था…तब से लँगड़ाइये के चल रहा है’
‘गज़ब हालत है…अभी तक इसको दिखवाए नहीं हो…देखो टखना पर फूला हुआ है…ये पत्तर दे रहे हैं गोली का…सुबह शाम एक एक, खाने के बाद. चलना फिरना जितना काम, उतना बढ़िया’
‘एगो कुछ पीये वाला भी दे देते तो अच्छा होता’
डॉक्टर पांडेय साथ में ब्लड प्रेशर का दवाई लेकर चलते हैं, ऐसे ही मौको के लिए,
‘कउनो फ्री के ऑफर चलाये हुए हैं हम यहाँ…पिलाना है तो दूध पिलाओ इसको…हड्डी मजबूत होगा’
नेक्स्ट,
‘प्रणाम चचा…हमरा आजकल बहुट टेंशन हो जाइ छई, बिना मतलबे के…की करियई?’
‘ताड़ी पियो रोज़ दू लोटा’
डॉक्टर साहब वैसे तो हड्डी रोग विशेषज्ञ हैं, मगर गांव वाले उनके पास बल-तोड़ से लेकर पेट ख़राब तक का इलाज करवाने पहुँच जाते हैं. वो भी अपने मरीजों की रग रग से वाकिफ हैं…इलाज एकदम पुख्ता बताते हैं.
अंदर घर में लेडीज और बच्चे नयी बहु को निहार रहे हैं. फिर टोली बनाकर सभी कुल देवता के मंदिर के तरफ निकल पड़ते हैं. जेसिका ने भी लोक गीत की ट्यून पकड़ ली है…मुस्कुराते हुए गुनगुना रही है साथ में. साथ में एक ढोलकी और शहनाई वाला भी चल रहा है, लाइव म्यूजिक. जेसिका ने वीडियो भी बना लिया.
मंदिर पर नूतन जी कमांड संभालती हैं. ओमी की कुछ चचेरी बहने जेसिका को पूजा करने में मदद करती हैं. उनमे से एक, ‘बेबी’ ने जेसिका से पुछा,
‘आप लोग तो जीजस क्राइस्ट का पूजा करते हैं न’
‘नाहीं…हम लोग जियु हैं’
अगल बगल की स्त्रियां हंसने लगी,
‘ही ही ही…ए ओमी के माय…महीन कंघिया हई न घर में…जूं के कण्ट्रोल में रखे लागी’
पीछे खड़े ओमी ने झिड़की लगायी,
‘आप लोग के दिमाग में जो जूं लगा है, वो तो बाल मुंडवाने पर भी नहीं निकलेगा…एक तो वो दुसरे धर्म की होकर भी, आप लोग का मन रखने के लिए ये सब कर रही है, मगर आप लोग को मज़ाक उड़ाने से ज्यादा तो कुछ आता नहीं है’
वैसे जेसिका को ये सब एक मनोरंजक कार्यक्रम ज्यादा लग रहा था. एक नया अनुभव.
पूजा समाप्त हुई और सब वापस घर को निकले. घर के बाहर तक बासमती चावल के खीर की मनमोहक खुशबू आ रही थी. मगर खाने से पहले जेसिका को उस गांव का एक ‘बिध’ पूरा करना था…ये बिध, उनके भैंसुर यानी ओमी के बड़े भाई को करवाना था. जेसिका के भैंसुर, श्री बिजेन्दर पांडे उर्फ़ रिंटूआ…भैंसुर कम, भैंसासुर ज्यादा थे. शादी नहीं हुई थी…तड़प तड़प के ग्रेजुएशन किये थे…अब ग्रेजुएट थे तो को छोटा मोटा काम कैसे करते…इसलिए गांव में निठल्ले पड़े रहते थे.
नूतन जी ने खबर भिजवाई. मगर साहब कहीं फिरंट हो गए हैं. लड़की की टोली का लीडर, भिक्की आकर रिपोर्ट करता है,
‘पता नहीं रिंटू चा कहाँ हत्थिन…सब जगह देख लिए’
तभी ओसारे पर हल्ले-हंगामे की आवाज. ओमी और रिशु बाहर आये…रिंटू बाबू खटिया पर चारो खाने चित्त…खटिया को चार लोग उठा कर ला रहे हैं. डॉक्टर साहेब आगे गए,
‘क्या हुआ इसको…बदहवास है एकदम’
‘वो चचा, ये लोग ‘तीन पत्ती’ खेल रहे थे…थाना का जीप पहुँच गया…कोई फ़ोन कर दिया था शायद…बाकी लोग तो भाग गया, ये वहीँ पेड़ पर चढ़ गए…सूखा डाल पर वजन डाल दिए…जीप के सामने ही भड़ाम से गिरे…थानेदार साहब, हँसते हुए चले गए…बोले, की सजा तो भगवान दे ही दिए’
डॉक्टर पांडेय ने अपनी ही गाड़ी में रिंटू बाबू को एक्स रे के लिए भगवानपुर भेजा. अंदर घर में अब खीर पूरी चाम्पा जा रहा है.
तभी दो छोटे बच्चों में ‘ओकरा ज्यादे खीर मिलल है’ वाला सीन बन गया…फिर क्या था…छीना झपटी चालू. दोनों की माताएं आयी और दे तबड़ाक…जेसिका हतप्रभ रह गयी. अमेरिका में तो बच्चों को मारने पर, माता पिता को सजा हो जाती है…यहाँ तो फ्री फॉर आल है. बच्चे अब राग अलापना शुरू कर दिए. रिशु ने जेसिका को समझाया,
‘इट्स ओके, इनको बिना पिटाये इतना अच्छा खाना हज़म भी नहीं होता…ये इनका रोज़ का है’
बच्चों का गायन संपन्न नहीं हुआ था की उनकी माताएं अब आपस में भिड़ गयी. एक दुसरे के परिवार वालों की महानता के कसीदे पढ़े गए…
‘तोहर माये…तोहर बहिन…तोहर ननद…’
लेडीज लोग भी लड़ते समय भी प्रतिद्वंदी के परिवार की लेडीज को ही गरियाती है…कोई जेंट्स रिलेटिव को इन्वॉल्व नहीं करता.
डॉक्टर पांडेय एक बार अंदर आकर गरजे,
‘क्या तरीका है ये सब…दुल्हिन आयी है पहला बार और आप लोग ऐसा तमाशा बनाये हुए हैं’
युद्धविराम.
जेसिका को बहुत इच्छा है गांव में घूमने की…खेतों में, फसल के बीच खड़े होने की. रिशु ने लेकिन वार्निंग दे दी,
‘भाभी…आपको पता है न…वेयर आल दी पीपल इन इंडियन विल्लेज डु देयर पॉटी…आपको शायद कोई लाइव टेलीकास्ट भी दिख जायेगा’
जेसिका को इस तरह का कोई लाइव टेलीकास्ट नहीं देखना. दोपहर का खाना खाकर, सब कोई वापस, पटना.

 

अब तक- पटना की अमेरिकन बहु जेसिका, का पूरे बिध बिधान से अपने ससुराल में स्वागत हुआ है. गांव का भी चक्कर लग चूका है. अब पटना घूमना है, आज.

रिशु लिस्ट लेके बैठा है. जेसिका ने विकिपीडिया पर पटना के बारे में रिसर्च करके ये लिस्ट बनायीं है.
‘गोल घर…कुम्हरार…म्यूजियम…खुदा बक्श लाइब्रेरी…अब इनको लाइब्रेरी में क्या काम है?…कोई मॉल या शॉपिंग काम्प्लेक्स जाते हैं’
ओमी ने समझाया,
‘अरे भाई, वो इतिहास की पढाई कर रही है…जब उसको पता चला की पटना का अढ़ाई हज़ार साल का इतिहास है तो ख़ुशी से नाचने लगी थी. बोली की ताज महल भले स्किप कर दो, पटना ज़रूर देखना है हमको’
रिशु भौंचक्क होकर ओमी के देख रहा है,
‘वो सब तो ठीक है, मगर इसमें से बहुत सारा जगह तो हम जानते भी नहीं है…खुदा बक्श लाइब्रेरी कहाँ है?’
‘गूगल से पूछो’
तब तक पीछे से डॉक्टर पांडेय पहुंचे,
‘किसको जाना है खुदा बक्श लाइब्रेरी…हमारे डिपार्टमेंट के पास ही है’
‘वो भाभी को जाना था’
‘दुर्र…लाइब्रेरी में क्या करेगी…घूमना ही है तो इको पार्क ले जाओ, ज़ू ले जाओ’
‘क्या पापा, वो कोई दस साल की बच्ची हैं, की उनको ज़ू ले जाएं’
नाश्ते के टेबल पर फिर लिस्ट फाइनल हुई. पहले कुम्हरार फिर लाइब्रेरी, फिर गोल घर और लास्ट में म्यूजियम. नूतन जी भी साथ हो लीं.
‘हमको कब ले गए हैं म्यूजियम ये…कुम्हरार भी बस एक बार गए थे नया साल में…इतना भीड़ था कुछ देखियो नहीं पाए थे…जब बोलते हैं घुमाने के लिए तो गाड़ी सीधे जैविक उद्यान, गेट नंबर दो के सामने ले जाके खड़ा कर देते हैं…फ्रेश ऑक्सीजन सूँघिये, बोलकर’
इग्यारह बजे गाड़ी निकली घर से. ओमी को फाइनली हिम्मत हुई है पटना में गाड़ी चलाने की. फर्स्ट स्टॉप कुम्हरार.
मौर्या काल के अवशेषों को देखने के लिए जेसिका बेहद उत्साहित थी. बाकि लोग के लिए तो घर की मुर्गी, दाल बराबर.
सबसे पहले मौर्या कालीन ‘खम्भा’. कुम्हरार में एक बड़े से सभागार के अवशेष मिले थे…अस्सी खम्भों वाला. खम्भा तो दिखा मगर सभागार कहाँ है?
जेसिका ने ओमी को पता लगाने बोला…विकिपीडिया पेज पर तो फोटो है खुदाई की.
‘अरे वो बहुत पुरानी फोटो है…सौ साल से ज्यादा पुरानी…बाद में उसमें पानी जमा होने लगा था, तालाब बन जाता था…वाटरलॉगिंग’
‘वाटर निकालने का पंप तो होगा न’
‘वो पंप यहाँ के मैनेजर साहब के घर में लगा होगा…लास्ट टाइम आये थे पानी लगा हुआ था खुदे हुए सभागार में…अब उसको मिट्टी से भर दिया है…ताकि ख़राब न हो जाए’
जेसिका को आश्चर्य भी हुआ…उसने आजतक ऐसे कोई पुरातत्व अन्वेषण के बारे में नहीं सुना था, जिसे खोद कर फिर वापस भर दिया गया हो. मगर फिर उसने दाद भी दी उस महानुभाव की जिसने शायद और कोई रास्ता नहीं सूझने पर वापस गड्ढे को भर देना ही मुनासिब समझा…सामने सभागार के गड्ढे की जगह, खाली सा मैदान…जब मन तब, फिर से खोद लिए…पैसे बचाने हों तो कॉलोनी में पिच बनाने वाले बच्चो को बुला कर खुदाई करवा लेंगे…विन विन.
कुछ दूर पर गुप्त काल के कुछ अवशेष…उस समय के एक ‘हॉस्पिटल’ जैसी इमारत, जहाँ आयुर्वेद के जन्मदाता धन्वंतरि, ‘प्रैक्टिस’ करते थे.
‘कैन यु बिलीव इट? आयुर्वेदा वास् बोर्न इन साइड दीज़ वाल्स’
नूतन जी वहां से कुछ घास फूस तोड़ने लगीं.
‘अरे, धन्वंतरि जी के अस्पताल का घास है…इसमें कुछ न कुछ स्पेशल पावर ज़रूर होगा’
स्पेशल पावर का तो पता नहीं, नूतन जी के हाथ में खुजली ज़रूर शुरू हो गयी पांच मिनट के अंदर.
कुम्हरार में थोड़ी फोटोग्राफी करके म्यूजियम की तरफ रवाना हुए. बुद्ध भगवान की अलग प्रकार की अनेकों मूर्तियां…पत्थर में गज़ब की नक्काशी की गयी थी, वो भी उतना पहले के समय में. सूर्य भगवान की मूर्ती, दो हज़ार साल पुरानी. दीदारगंज की यक्षी का भी दीदार किया सबने. जेसिका पूरा वीडियोग्राफी किये हुए है…पुरातन सभ्यता ऐसी भव्य भी हो सकती थी, उसने सोचा नहीं था. नूतन जी भी भौंचक्क होकर देख रही है…रिशु ने भी म्यूजियम के बारे में सुना था…आज पहली बार आया है.
‘बाप रे, उस समय लोग ऐसा बेजोड़ आर्ट क्रिएट कर लेता था…गज़ब’
ओमी ने भी टिपण्णी की,
‘उस समय कोई टीवी, फेसबुक या व्हाट्सप्प तो था नहीं…लोग यही सब करते होंगे टाइमपास करने के लिए’
नूतन जी की नज़र कुछ सिक्कों पर पड़ी,
‘बताओ तो कैसा मोटा और भारी सिक्का सब है…बटखरा के जैसा’
रिशु को हंसी आ गयी,
‘इसका तो सब पिट्टो बना के खेलता होगा’
और भी कई बेजोड़ संग्रह…जेसिका बहुत ही प्रभावित है,
‘ओमी, योर सिटी हास् सच रिच हिस्ट्री…स्पॅनिंग थाउजंड ऑफ़ इयर्स’
‘हाँ, यहाँ का हिस्ट्री ही एक अच्छा चीज़ है…बाकी जियोग्राफी और सिविक्स का हलुआ बना हुआ है’
‘कॉम ऑन ओमी, सभी जगह का कुछ न कुछ प्रॉब्लम होता है…यू शुड बे प्राउड ऑफ़ व्हाट यू हैव…आई एम् प्राउड ऑफ़ माय ससुराल’
नूतन जी खुश हुई सुनकर, दोनों बेटो को उलाहना मिली,
‘सीखो कुछ…जब देखो खाली बुराई निकालते रहता है सब’
म्यूजियम के बाहर सिलाव का खाजा…जेसिका को तो जो शुगर- हाई हुआ खाके…लगा की एक बोतल वाइन चढ़ा ली है.
फिर, गोल घर.
नूतनजी को घुटना में कुछ कुनमुना रहा है,
‘तुम लोग हो आओ…हम यहीं बैठते हैं’
जेसिका को ये मंज़ूर नहीं,
‘नो मम्मी, आपकी भी आना है…नाही तो में भी नाही जाउंगी’
‘अरे, बहुत सीढ़ी चढ़ना पड़ता है…कितना सीढ़ी है रिशु इसपर’
रिशु ने फट से गूगल खोला,
‘सिर्फ एक सौ पैंतालीस’
‘बाप रे !’
‘मगर मम्मी, देखिये कितना छोटा सीढ़ी है…आराम से चढ़ जाइएगा’
जेसिका ने भी हिम्मत बधाई,
‘चलिए में आपको सपोर्ट देती हूँ’
बहु का हाथ थामे गोलघर की चढ़ाई शुरू…कुछ देर में बाएं तरफ सेंत जेवियर स्कूल का अहाता दिखना शुरू…बाएं तरफ बांकीपुर बालिका…फिर…गंगा जी…इधर उधर ताकने में पता भी नहीं चला कब ऊपर पहुँच गए, नूतनजी खुश हो गयी,
‘जा!! पहुंचियो गए ऊपर…हमको लगा बहुत चढ़ना पड़ेगा’
गंगा से आने वाली ठंडी बयार ने उनकी थकान दो मिनट में मिटा दी. कुछ देर फोटोग्राफी करके वापस नीचे. रिशु ने जेसिका को नीचे बनी एक खिड़की की तरफ इशारा किया,
‘भाभी, आपको एक मजेदार चीज़ सुनाते हैं’
रिशु ने खिड़की के अंदर ज़ोर से आवाज़ लगायी…त्रिदेव फिल्म का डायलॉग
‘पाप से धरती फटी…फटी…फटी…और अधर्म से आसमान…आसमान…आसमान’
अंदर ज़बरदस्त इको…फटी फटी फटी….आसमान आसमान आसमान.
जेसिका ने भी इंग्लिश फिल्म के एक जबरदस्त डायलॉग को गोलघर के पेट में भर दिया, टाइटैनिक वाला,
‘आई एम् दी किंग ऑफ़ दी वर्ल्ड…वर्ल्ड…वर्ल्ड…’
गोल घर से निकल कर पि एम् सी एच होते हुए खुदा बक्श लाइब्रेरी जाना है. डॉक्टर पांडेय से उनके डिपार्टमेंट में मिलते हुए. जेसिका ने ऐसा हॉस्पिटल पहली बार देखा है ज़िन्दगी में. वो थोड़ी अचंभित लग रही है. इतनी भीड़…इतने सारे मरीज…इतनी गन्दगी. फिर भी किसी तरह काम चल रहा है…उसने मरीजों को देखा…अधिकतर लोग नीचले तबके के ही थे. मगर सबके आँखों में उसे उम्मीद दिखी, की वो अब ऐसी जगह आ गए हैं, जहाँ उनका इलाज ज़रूर होगा…उन्हें दर्द से राहत ज़रूर मिलेगी. डॉक्टर पांडेय गाड़ी तक आये. पीछे पीछे उनके डिपार्टमेंट की कुछ नर्स लोग भी आयी है जेसिका को देखने. हेड नर्स को ही उससे बातचीत करने की इज़ाजत मिली,
‘वी आर सो हैप्पी फॉर यू एंड ओमी. आवर ब्लेस्सिंग्स आर विथ यू ‘
जेसिका निहाल हो गयी. उसकी माँ भी नर्स का काम करती थी. कुछ साल पहले उनका देहांत हो गया था.
‘माय मदर वास् आल्सो ए नर्स. आपको देखकर उनकी याद आ गयी’
उस अमेरिकन लड़की का इतना सरल रूप देखकर सभी नर्स गदगद हो गयी.
डॉक्टर पांडेय ने फिर सलाह दी,
‘यहाँ गंगा किनारे बहुत अच्छा फुट पथ बनाये दिया है…घूम आओ तुम लोग’
गंगा जी को इतने पास से जेसिका ने पहली बार देखा है. कुछ तो बात है इस नदी में…देखते ही भक्ति भाव उमड़ पड़ता है. चलते चलते ये लोग दरभंगा हाउस पहुंचे.
नूतन जी को काली मंदिर जाने की इच्छा हुई. वो और रिशु अंदर गए, इधर ओमी और जेसिका घाट पर बैठे. पीछे दरभंगा हाउस की भव्यता को निहार ही रहे थे की, तभी घाट के दुसरे कोने से हल्ले हंगामे की आवाज़,
‘बचवा दहा गईल रे…कोई बचाओ’
एक छोटी बच्ची शायद अपनी माँ के साथ पानी में खेल रही थी…पैर फिसला…किसी तेज़ करंट में खींचा गयी. घाट पर उसी समय कुछ लड़के भी नहाने आये हुए थे, सब मंजे हुए तैराक…उनमें से दो तुर्रंत पानी में कूदे. पांच मिनट बाद बच्ची की बेसुध शरीर के साथ वापस घाट पर. लोगों ने घेर लिया…बच्ची सांस नहीं ले रही. जेसिका उठी…उसने कॉलेज में फर्स्ट एड की ट्रेनिंग ले रखी थी. ओमी ने भीड़ को हटाया…
‘आप लोग थोड़ा जगह छोड़िये…हवा आने दीजिये’
जेसिका ने बच्ची को फर्स्ट एड देना शुरू किया…छाती पर पांच बार अपनी हथेली से हलके हलके दबाव बनाती…फिर लड़की के मुँह में साँस छोड़ती. लड़की की माँ अजीब सा मुँह बनाकर उसे देख रही है,
‘चुम्मा काहे लेइत है हम्मर सोनी के…ई कौन तरीका हुआ’
कुछ ही देर में जेसिका की मेहनत काम आयी. बच्ची खांसते हुए जाग उठी. लड़की की माँ तो जेसिका के पैरों में गिर गयी. जेसिका ने उसे उठाया, फिर नदी से बचा कर लाने वाले लड़को की तरफ इशारा किया. ओमी ने लड़को को कुछ पैसे देने की कोशिश की इनाम के तौर पर…उन्होंने हंसकर मना कर दिया,
‘नहीं भैया…पैसा थोड़े लेंगे…वो बच गयी, यही बहुत है’
जमा भीड़ ने ताली बजाकर जेसिका और लड़कों का अभिवादन किया…तब तक रिशु और नूतनजी भी पहुंचे हल्ला हंगामा सुनकर. पूरी कहानी सुनने के बाद उन्होंने जेसिका को पास बुलाकर गले लगाया और उसका माथा चूम लिया. वहां से फिर खुदा बक्श लाइब्रेरी. मुग़ल कालीन दस्तावेज़, तैमूर -नामा. नूतन जी जाकर पुराने अखबार चाट रही हैं…उनके शादी के दिन क्या हेड लाइन थी, ये देखने के लिए.
जेसिका ने कुछ नोट्स बनाये हैं. फिर वहां से निकले तो रिशु को कुछ याद आया,
‘भैया, आज शनिवार है न…आज गाँधी घाट पर गंगा आरती होता है, चलिएगा क्या?’
‘कितना बजे होता है? देखने का तो बहुत मन था हमको भी’
खड़े खड़े प्लान बन गया…डॉक्टर पांडेय को डिपार्टमेंट से पिक अप करके, शुभराज में खाते पीते, गांधी घाट.
एक घंटे बाद गाड़ी इंजिनीरिंग कॉलेज वाला मोड़ में मुड़ी. पार्किंग करके सबने घाट की सीढ़ियों पर जगह पकड़ी. अँधेरा हो गया है…आरती का कार्यक्रम शुरू हुआ. आरती की पीली रौशनी सबसे चेहरे ख़ुशी और भक्ति भाव से ऐसे दमक रहे हैं मानो सबने एक दिन पहले ही ‘दूल्हा पैक’ फेसिअल करवाया हो पटना मार्किट में. गंगा की लहरे भी आकर घाट को हलके हलके थपथपा कर अपनी प्रसन्नता प्रकट कर रही हैं.
– क्रमशः

आज फिर वापस आये हैं, क्रिसमस और नए साल की छुट्टियों में.

हवाई जहाज की छोटी सी खिड़की पे जेसिका और ओमी दोनों अपनी आँखें गड़ाए हुए थे. पायलट ने दस मिनट पहले लैंडिंग की घोषणा करके सबको वापस अपनी कुर्सियों पे बिठा दिया था. अब तो दोनों एयर होस्टेस भी अपना सीट पकड़ चुकी थी. मगर नीचे, अभी तक ज़मीन नहीं दिखी थी…बस एक अजीब हलकी भूरे रंग की धुंध. जहाज ने लम्बा मोड़ काटा…ओमी समझ गया हाजीपुर के ऊपर से टर्न मारा है फाइनल एप्रोच के लिए. जेसिका से अब रहा नहीं गया,
‘इट इज सो फॉगी’
‘वो फॉग नहीं है…स्मॉग है…फॉग सफ़ेद होती है’
‘इतना स्मॉग कहाँ से आया…यहाँ कोई बड़ी फैक्ट्री है क्या?’
‘नहीं…पटना शायद दुनिया का सबसे ज्यादा पोलूटेड नॉन- इण्डस्ट्रियलाइज़्ड सिटी होगा…बिना किसी फैक्ट्री के ही ये हालत है…कोई फैक्ट्री होती तो शायद सर्दी के मौसम में सूरज भी नहीं दिखता कभी…नॉर्वे -स्वीडन के जैसा’
जेसिका दुखी हो गयी. तभी नीचे गंगा जी की चौड़ी धारा ने उसका ध्यान खींचा.
‘लुक, इट्स योर गंगा मैय्या’
ओमी ने उचक कर झाँका…दिसंबर में भी इतना पानी…सही है. अब शहर दिखने लगा था…गाँधी मैदान के कोने पर बने दोनों विशालकाय ऑडिटोरियम भी दिखे…
‘वो लगता है नया वाला ऑडिटोरियम है…लगता है कोई कछुआ बैठा हुआ है’
बिस्कोमान, गवर्नर हाउस, विधान सभा, इको पार्क, सब के ऊपर से उड़ते हुए इनका विमान पटना में लैंड कर गया.
लगेज बेल्ट पर सलवार कुर्ते में खड़ी अमेरिकन को कुछ लेडीज घूर घूर के ताक रही थी. वैसे अब पटना में ये कोई अजूबा चीज़ नहीं था…बहुत फॉरेनर लोग आने लगा था यहाँ भी पिछले कुछ सालों में.
बाहर जेसिका के ससुर और देवर, रिसीव करने पहुंचे हुए हैं. जेसिका ने दुप्पटा सर पे रख के प्रणाम किया. पांडे जी फिर से गदगद हो गए. गाडी कंकरबाग का रुख कर ली. रास्ते में ओमी ने लगभग हर सड़क के ऊपर एक फ्लाईओवर की श्रृंखला बनते हुए देखा तो अचंभित हो गया.
‘कितना फ्लाईओवर बनाएगा…लगता है पटना को ‘डबल डेकर’ शहर बना देगा सब’
घर पहुंचे. इस बार थोड़ा साधारण स्वागत ही हुआ जेसिका का.
वो सब के लिए अमेरिका से गरम कपडे लेकर आयी है.
‘पापा ये देखिये, कितना पतला जैकेट है मगर बहुत गरम है…इट हैज डक विंग्स स्टफ्ड इनसाइड’
पीछे खड़ी सुधा बुआ को टेंशन हो गया ये सुनके,
‘मगर भैया तो प्यूर भेजिटेरियन है…बत्तख के पंख वाला कैसे पहनेंगे’
पांडेय जी ने हंस के कहा,
‘हाँ, तो पहनना ही है न…खाना थोड़े है…वैसे भी ऊन कौन से पेड़ पे उगता है? डक विंग्स है तो वाटर प्रूफ भी होगा’
सुधा बुआ के लिए मगरमछ के खाल का बहुत सुन्दर हैंड-बैग आया है…जो उन्होंने बिना संकोच के ले लिया, सफाई देते हुए,
‘मगरमछ थोड़े ही कोई पालतू पशु होता है…कितना बदमाश भी होता है सब…अच्छा किया है की सबको मार के बैग बना दिया’
जेसिका को लेकिन ठण्ड लग रही है. चचेरी ननद नेहा को आश्चर्य हुआ,
‘हाउ कैन यू फील कोल्ड हियर? आप तो अमेरका में इससे ज्यादा कोल्ड फेस करती होंगी’
‘हाँ पर वहां सब लिविंग स्पेस और वर्किंग स्पेस हीटेड होते हैं न…इट कैन बी स्नोविंग आउटसाइड, बट इनसाइड, यू कैन वाक इन टी-शर्ट. ‘
सासु मां को ओमी ने पहले ही कहलवा दिया था…उनके रूम में ब्लोअर का इंतज़ाम हो चूका है. बाथरूम में भी गीजर का पानी किस नल में आता है ये जेसिका ने दो बार हाथ जला कर समझा.
अगली सुबह, नाश्ता करके लेडीज लोग पीछे के आँगन में बैठ के गप्पांस्टिंग में लगी हुई थी. ओमी बैंक गया था, आधार लिंकिंग करवाने. जेसिका भी बाहर आकर बैठी. बगल वाले घर की भी दो लेडीज आकर बैठी हुई थी. जैसी ही ओमी की मम्मी कुछ काम से अंदर गयी, जेसिका को अकेला पाकर एक लेडीज ने अपने दिल की भड़ास निकालनी शुरू कर दी,
‘अमेरिकन बहु तो ले आयी हैं…मगर अमेरिकन सब बुढ़ापा में सेवा थोड़े करेगी…सुने हैं की सब माये -बाप को साथ में नहीं रखता है वहां…प्राइवेसी के लिए…अब तो रिशु बाबू का ही सहारा है मिसेज पांडे को…अरे…कोहनी काहे मार रही हैं’
प्रवचन करने वाली लेडीज के बगल में बैठी मिसेज प्रसाद उनको चुप कराने का असफल प्रयास कर रही थी, फुसफुसा के बोलीं,
‘अरे चुप रह रहिये न…इसके सामने मत बोलिये ये सब’
‘क्या हुआ?इसको हिंदी थोड़े ही न बुझाता होगा’
जेसिका मुस्कुरा के सब सुन रही थी, हंस कर बोली,
‘हमको हिंदी समझ आता है…और ये भी समझ आता है की अपने और ओमी के मदर फादर का कैसे केयर करना है…यू डॉन’ट नीड टू वरी’
प्रवचन करने वाली आंटी जी का मुँह बन गया. कुछ बहाना बना के वापस अपने घर भागी.
दोपहर के खाने पर डिस्कशन हुआ…नए साल में कहाँ घूमने चला जाए. रिशु ने प्रोपोज़ किया,
‘चिड़ियाघर चलते हैं…हम एक बार भी नहीं गए हैं नए साल पर’
ओमी ने विरोध किया,
‘बहुत भीड़ रहता है. अंदर घुसने में ही एक घंटा लगेगा…इससे अच्छा गंगा जी के उस पार चलो’
‘बै…उधर है क्या देखने को…खाली केला का पेड़ होगा और आजकल कंस्ट्रक्शन चल रहा है उधर…बहुत धुल भी उड़ता है’
पांडे जी ने एक सुझाव दिया,
‘अरे तो ज़ू ही चले जाओ…सहाय जी का लड़का डी-ऍफ़-ओ हो गया है…कहवा देगा तो गेट नंबर दो से अंदर चले जाना.’
आईडिया जँच गया सबको. एक जनवरी को सुबह इग्यारह बजे संजय गाँधी जैविक उद्यान गेट नंबर दो से इनकी गाडी अंदर घुसी. गेस्ट हाउस के सामने पार्क करके, पैदल घूमने निकले. जेसिका ने देखा…भयंकर भीड़…लोग टोली बना के पहुंचे हुए थे. केरोसिन के स्टोव पर भात का तसला चढ़ा हुआ था…साइड में चिकेन के लिए प्याज कटा रहा था. ओमी ने समझाया,
‘ये एक तरह का ट्रेडिशन है बहुत लोगों का…ज़ू में आकर भात चिकन चाम्पने का…उसके बिना ‘हैप्पी न्यू ईयर’ नहीं पूरा होता इनका.’
जेसिका के नाक में गरम मसाले के छौंक की महक आयी,
‘वाओ…स्पाइस का स्मेल कितना स्ट्रांग है…जानवर लोग का तो नाक फ्यूज कर जाता होगा’
हर तरफ से मोबाइल फ़ोन पर गाने बज रहे हैं…मेले जैसा माहौल है. रिशु ने पुछा,
‘आप लोग भी तो कैंपिंग करते हैं न जंगल में जाकर…वहां खाना भी तो पकाते हैं’
‘हाँ, मगर बहुत रूल्स होते हैं फॉलो करने के लिए…यहाँ तो लगता है फ्री फॉर आल है’
रिशु को हंसी आ गयी. तभी उसे एक गज़ब की चीज़ दिखी,
‘भैया, देखो शर्मीली बिल्ली…कितना बार ज़ू आये हैं, आज पहला बार देखे इसको…लगता है चिकेन के स्मेल से बाहर आयी है’
आज बोटिंग बंद है मगर टॉय ट्रैन चालू है. ओमी ने पुछा,
‘हाउ अबाउट अ ट्रैन राइड?’
जेसिका ने एक बार उस थोड़े से कंजर टाइप के टॉय ट्रैन को देखा,
‘इज इट सेफ?’
‘अनलेस इट इज ऑन फायर…इट इज सेफ’
ओमी ने हंसकर कहा. ट्रैन का टिकट लेकर सभी बैठे. शेर बाघ सभी के पिंजरों के पीछे से होती हुई ट्रैन गैंडे के बाड़े के सामने पहुंची. गैंडे को एक बेबी हुआ था हाल में….मम्मी से सट के खड़ा था. जेसिका खुश हो गयी,
‘वाओ, सच अ क्यूट बेबी राइनो’
ओमी की मम्मी ने चांस पे डांस कर लिया,
‘अब तुम लोग भी जल्दी ही बेबी का सोचो’
रिशु भी रेडी था,
‘हाँ भाभी…मगर बेबी राइनो जितना बड़ा नहीं’
आगे मगरमच्छ का बाड़ा…रिशु को ये प्राणी बहुत पसंद है.
‘वाह…कितना प्यारा है सब…धुप में मुँह फाड़ के पड़ा हुआ है…लाइफ में कोई टेंशन नहीं…लाइफ हो तो ऐसी’
पीछे से उनकी मम्मी ने मजाक में ही कहा,
‘लक्षण तो तुम्हारा भी मगरमच्छ सब के जैसा ही है, इस साल भी कहीं सेट नहीं हुए तो यहीं भर्ती करवा देंगे, मुँह फाड़ के धुप सकते रहना बीच में’
वापस आकर सफ़ेद बाघ के दर्शन किये जेसिका ने…पहली बार. बाघिन पूरा पोज मारके बाहर वाला पिंजरा में बैठी हुई थी.
‘शी लुक्स सो रॉयल…आई वोन’ट माइंड गेटिंग ईटेन बाइ सच अ ब्यूटीफुल बीस्ट’
इधर बाघिन ने भी जेसिका जैसी गोरी चिट्टी, सुनहले बालो वाली लड़की कभी नहीं देखी. उसने भी गुर्रा के अपनी सहेली बाघिन से कुछ कहा.
हैप्पी न्यू ईयर मनाकर अब पांडे फॅमिली वापस घर को निकली.
– क्रमशः

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