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कुछ यादें एग्जामिनेशन हॉल की

कुछ यादें एग्जामिनेशन हॉल की-

घबराइए नहीं…मैं कोई हॉरर स्टोरी नहीं बताने जा रहा हूँ. मैं भी समझता हूँ की मेरी तरह आप में से बहुत लोगों की एग्जामिनेशन हॉल की खौफनाक यादें ही साथ होंगी. वो सडेन मेमोरी लॉस सिंड्रोम…वो पश्चाताप की भावना उस चैप्टर को ना पढ़ने की जिससे आधे सवाल आ गए…वो दूसरे छात्रों का दना-दन एक्स्ट्रा शीट मांगना जबकि आपका अभी तक मेन शीट आधा भी नहीं भरा. उन सभी बातों को परे रखकर, ऐसी बातों को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ जिन्होंने उन गम्भीर पलों में भी हमारे चेहरे पर मुस्कान ला दी थी-

स्कूल लाइफ के एग्जाम हॉल-
स्कूलों के एग्जाम का अपना मजा होता था. अलग अलग क्लास के स्टूडेंट्स को एक बेंच पर बिठाया जाता था ताकि ‘विचारों’ के आदान-प्रदान का ज्यादा स्कोप न हो. बहुत लोग अपने क्लिप-बोर्ड पर छोटे छोटे अक्षरों में अगले सब्जेक्ट के इम्पोर्टेन्ट हिंट्स लिखकर लाते थे…एक मित्र ने तो इतना छोटा लिख दिया था की एग्जाम हॉल में एंगल बदल बदल कर देखने के बावजूद कुछ समझ नहीं आया. मगर उसकी इन हरकतों ने टीचर का ध्यान ज़रूर खींच लिया,
‘क्या कर रहे हो जी?’
‘कुछ नहीं सर’
‘दिखाओ तो…दो अपना बोर्ड इधर’
गनीमत से उसने इतना छोटा फॉन्ट साइज यूज़ किया हुआ था की टीचर को भी समझ नहीं आया और बालक बच गया.
एक बार मेरे बगल में बैठे, दो क्लास सीनियर लड़कों में थोड़ी कोऑपरेशन चल रही थी-
‘ ओए, अन्टोनिम क्या होता है…सेम मीनिंग  वाला न?’
‘हाँ’
मुझे लगा शायद पीछे बैठे भइया ने गलती से मेरे साथ वाले भैया को रॉंग आंसर दिया था…इसलिए मैंने अपनी तरफ से उसको सही कर दिया,
‘नहीं भैया, अन्टोनिम उलटे मीनिंग वाला होता है…सयनोनिम सेम मीनिंग वाला होता है’
‘पक्का?’
आगे बैठे सीनियर छात्र ने भी मेरे जवाब की पुष्टि  कर दी.
तभी मैंने पीछे देखा तो गलत जवाब देने वाले भैया मुझे गुस्से से घूर रहे थे. शायद मैंने उनके नापाक इरादों पर पानी फेर दिया था.
एग्जाम हॉल में जो टीचर रहते थे उनके भी मजेदार किस्से होते थे. एक बार हमारी क्लास में दो संस्कृत के टीचर की ‘गार्डिंग’ लग गयी. एक थे संस्कृत के महापंडित…धोती-कुरता-टिक्की धारी पांडेय सर और दूसरी थी संस्कृत की शिक्षिका. दोनों में लगता है आज से पहले ज्यादा बातें नहीं हुई थी…स्टाफ रूम में ज्यादा लोगों के सामने  बात करने में शायद पाण्डे जी को संकोच लगता होगा. आज लेकिन अच्छा मौका हाथ लगा था…शिकार अकेला था…पाण्डे जी ने अपनी टिक्की बांधे और चालू हो गए,
‘हें-हें-हें…संस्कृत विषय में ज्यादा लेडीज टीचर देखे नहीं हैं…हमारे कॉलेज में भी बस एक ही थी…आपने कहाँ से किया है एम-ए ?…अच्छा आप तेरासी की मैट्रिक पास हैं…हम भी उसी साल पास हुए थे’
दोनों दिल खोल कर गप्पे लड़ाने लगे…ये भूल गए की वो एग्जाम हॉल में हैं. पांडेय जी का थोड़ा खौफ भी था हम में…बाल पकड़ कर, झुका के पीठ पर मस्त नगाड़ा बजाते थे…इसी डर से कोई कुछ नहीं बोला.

फिर एक लास्ट मिनिट वाला ड्रामेबाज हर क्लास में रहता था,
‘सर…एक मिनट सर..बस हो गया सर…एक लाइन और सर…नहीं सर…प्लीज सर’
लगता था जैसे अगर वो दो एक्स्ट्रा लाइन उसने लिख दी तो वो टॉप ही कर जायेगा. मगर ऐसे नाटकबाज छात्र जेनेरली ग्रेस मार्क से ग्रेस होकर ही पास होते थे.

कॉलेज के एग्जाम हॉल-
यहाँ भी अलग अलग ईयर के इंजीनियरिंग छात्रों को साथ बिठाया जाता था. एक बार हमारे एक सीनियर थोड़ी देर से पधारे…दो घंटे के पेपर में आधे घंटे लेट. हड़बड़ में क्वेश्चन पेपर लिए. मेरे ही बगल में उनकी सीट थी. कुछ देर क्वेश्चन पेपर को पढ़ते रहे फिर उन्होंने हमारे इलेक्ट्रॉनिक्स सब्जेक्ट के प्रोफेसर को बुलाने का आग्रह किया. प्रोफेसर साहब, जिन्हे हम प्यार से ‘गांधी सर’ बुलाते थे, कुछ देर में पहुंचे-
‘ये क्या पेपर सेट किये हैं सर…कुछो नहीं बुझ रहा है. एक भी क्वेश्चन सिलेबस से नहीं है, माने मुश्किल पेपर सेट करने के चक्कर में आप आउट ऑफ़ सिलेबस दे दीजिएगा?’
सर ने क्वेश्चन पेपर शांति से देखा.
‘किस सब्जेक्ट का एग्जाम देने आये हो आज?’
‘बेसिक इलेक्ट्रॉनिक्स’
‘ये पेपर कौन सब्जेक्ट का है?’
‘बेसिक इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग’…ओहो…हमको लगा दोनों सेम है ?
वैसे तो हम प्रोफेसर सर को ‘गांधी’ उनके अपीयरेंस के चलते बुलाते थे…मगर ऐसी बात सुनने के बाद भी जब वो अहिंसा का साथ नहीं छोड़े, तो हमें एहसास हुआ की शायद वो सोच-विचार में भी राष्ट्रपिता से प्रेरित थे.
हमारे सीनियर को सही पेपर लाकर दिया गया. वो अलग बात थी की उन महानुभाव को सही पेपर में भी कोई क्वेश्चन नहीं आता था.
एक और मजेदार बात हुई थी. कोई छात्र लगता है रात में देर तक पढाई कर रहा था…इंजीनियरिंग स्टूडेंट एग्जाम के सर पर आने से पहले, तैयारी करने को उतना ही यूजलेस काम मानते हैं जितना किसी ओप्पोसिशन बॉलर का कोहली के लिए बोलिंग प्लान करना. खैर, भाईसाहब को लगता है उठने में देर हो गई थी…तो बिस्तर से उठकर सीधा एग्जाम हाल में पहुँच गए थे.
आप सबको तो पता ही होगा…सुबह सुबह कुछ नित्य-कर्म होते हैं…अगर उनको समय पर न किया जाये तो उसके परिणाम अच्छे नहीं होते. एक परिणाम होता है वायु प्रदुषण…जो की कभी कभी ध्वनि प्रदुषण के साथ उस्फुटित होता है. अगर आप अकेले में है तब तो चलेगा…मगर एग्जाम हाल जैसी पब्लिक प्लेस में  कोशिश यही रहती है की ध्वनि प्रदुषण को काबू में रख जाये…ताकि बाकि लोग अपने नाक में पहुंची उस सम्मोहक गंध के स्रोत का पता न कर पाएं. वैसे तो हर क्लास में कुछ यूजुअल सस्पेक्ट होते हैं.
इस छात्र ने भी काफी देर तक लगता है कंट्रोल किया हुआ था…मगर एक ही साथ अपने दिमाग पर और अपने वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम पर कंट्रोल रखना ज्यादा देर तक संभव नहीं था. बड़ी अन्तरि के अंदर बने गैस के गोले ने अब ‘हमें चाहिए आज़ादी’ की मांग तेज़ कर दी थी. आख़िरकार बेचारे परीक्षार्थी  ने गैस-कांड कर ही दिया…वो भी पूरे बैंड-बाजे के साथ…पूरे हाल में लोग हंसने लगे. करीब तीस सेकण्ड बाद जब हाल में फिर से शान्ति छा गयी…तभी एक स्टूडेंट जो थोड़ा इंट्रोवर्ट टाइप की थी…उसे हंसी आई…और ऐसी हंसी आई की वो अगले पांच मिनट तक खिखियाते रही. बाद में पता चला की उस पाद-शिरोमणि सीनियर  को बुरा भी लग गया था,
‘हंसना था तो सबके साथ हंसती…टूब-लाइट कहीं की’
एग्जाम हाल में तो लोग चिट-पूर्जा लेकर आते ही थे…सबसे अजीब हालत होती थी टॉयलेट की. एक बार का याद है की टॉयलेट में गए तो चारों तरफ इतना कागज बिखरा हुआ था की समझ नहीं आया की अपनी लघु शंका का समाधान कहाँ करें. मेरे दादाजी कहा करते थे ‘नक़ल के लिए भी अकल चाहिए’.  मेरे बगल में जो छात्र बैठता था…वो वैसे तो एकदम हीरा लड़का था…बस पढाई लिखाई नहीं करता था…एग्जाम के दिन उस सब्जेक्ट  की किताबों का माइक्रो-ज़ेरॉक्स करा के पहुँच तो जाता था मगर उसे ये पता नहीं होता की आंसर लिखना कहाँ से है ..कितनी बार तो मैंने पेन से मार्क करके बताया था…और कौन सी ड्राइंग कॉपी करनी है ये भी…लड़का ड्राइंग बड़ी सुन्दर बन देता था लेकिन.

एग्जाम हाल से थोड़ा अलग मगर उल्लेख करने योग्य –
मेरी माताजी  को एक बार बिहार मैट्रिक  बोर्ड के पेपर चेक करने का जिम्मा मिला था. वो मुझे बिठाकर मार्क्स ऐड करवा रही थी.  उन आंसर शीट में भी इतनी मजेदार बातें थी की मैं हँसते हँसते लोट पॉट हो रहा था…
किसी छात्र ने ‘नक़ल के लिए अकल’ वाली बात को सही साबित करते हुए ऊँट को रेगिस्तान का ‘हवाई-जहाज़’ घोषित किया हुआ था.
मनुष्य के पाचन-तंत्र (डायजेस्टिव   सिस्टम) का डायग्राम बनाने वाले प्रश्न के जवाब में लोगों ने मस्त कार्टून बनाए हुए थे…लगता था  छिपकली का पाचन तंत्र बनाए हुए है… कुछ ने तो डायजेस्टिव सिस्टम के अंग-प्रत्यंग छोड़ कर बाकी सभी ऑर्गन दिखा दिए थे…ब्रेन…किडनी..फेफड़ा…वैसे मैंने अपनी माताजी को ब्रेन दिखने के लिए मार्क्स देने को कहा था…आखिर सारा कंट्रोल तो उसी का है.
कई पेपर में तो बड़ी इमोशनल कहानी के साथ पचास-सौ का नोट भी लगाया रहता था. मिलने पर घर में समोसे-गुलाब-जामुन की पार्टी हो जाती थी.
एग्जाम हाल में बिताए समय ने ही हमारी ज़िन्दगी को डिफाइन किया है. आशा करता हूँ इस लेख ने आपको भी अपने एग्जाम हाल के उन यादगार पलों को टटोलने का अवसर दिया होगा.