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छठ का संयोग.

छठ का संयोग
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सुनील ने नाक पर कपडा रखा हुआ था.
‘बाप रे, रास्ता भर ऐसा गन्दा सूंघते हुए जाना पड़ेगा’
उसके सर में हल्का दर्द शुरू हो चूका था. भूख भी लग आयी थी. झोले में दो पैकेट बिस्कुट है और दो छीमी केला. पूरा सफर इसी से निकाल देना है. समझ बूझ के खाना होगा. उसने बिस्कुट का एक पैकेट टटोला…ले अंदर तो लगता है सब पिसा के पाउडर बन गया है. थोड़ा हाथ घुमाया तो गीला गीला केला का हलुआ भी हाथ में लग गया.
‘सत्यानाश…भीड़ में सब कूचा गया’
उसने पिसे हुए केले को ही पहले सधाने का निर्णय लिया. केले को गूदे को आइस क्रीम की तरह चाट पोंछ के साफ़ करने के बाद उसकी जान में जान आयी.
‘पता नहीं कब पहुंचेंगे…बैल गाडी के जैसा चला रहा है’
सुनील और उसका दोस्त मनोज, बहुत मुश्किल से इस छठ स्पेशल ट्रैन में घुस पाए थे. भगदड़ मचा हुआ था प्लेटफार्म पे. किसी तरह सिर्फ सिकुड़ के बैठने लायक जगह मिली थी, वो भी टॉयलेट के पास. दोनों लड़के आस पास के गांव से थे. दिल्ली में छोटे मोटे लेबर का काम करते थे. मनोज अब तक किसी और के अखबार का एक पन्ना उधारी लेकर टाइमपास कर रहा था. सुनील ने पुछा,
‘कितना बजे पहुँचने का टाइम है इसका? पता किये हो?’
‘टाइम तो कल दोपहर एक बजे का है…मगर स्पेशल ट्रैन खाली नाम से स्पेशल होता है…बाकी इसका औकात माल-गाड़ी से भी नीचे’
‘भक साला…इससे अच्छा तो सम्पूर्ण क्रांति पकड़ लेते…अगले ही प्लेटफार्म पर तो लगने आ रहा था’
मनोज ने अखबार नीचे करके सुनील को घूरा.
‘बउआ…सम्पूर्ण क्रांति में चढ़ना है तो घर से वापस आते ही, चिकन और मटन खाना शुरू करिये…और दंगल में जैसे अमीरवा अपना बेटी सबको ट्रेनिंग देता है वैसे ही बॉडी बनाइये…सम्पूर्ण क्रांति में चढ़ेंगे…दाल भात का कौर समझे हुए हैं’
सुनील ने याद किया,
‘सच में, कितना मारा मारी हो रहा उस प्लेटफार्म पर…वो भी शायद केला के जैसा पीसा जाता’
सुनील लेकिन अंदर से खुश है आज. पिछले साल का छठ और इस बार का होली में भी घर नहीं जा पाया था. साली के शादी में लेकिन पहुँच गया था मोतिहारी. माँ, खूब बात सुनाई थी और चाची-मामा (दादी) ने तो अल्टीमेटम भी दे दिया था,
‘अगिला साल के की पता, रहम की नै रहम…ई बार सायद अंतीमे छठ हो’
सुनील ने बहुत हिम्मत करके आने का प्रोग्राम बनाया था. पटना पहुँच कर, बस पकड़ना है मुज़्ज़फरपुर या हाजीपुर का. जउन धरा जाए पाहिले. बीवी के गुस्से पर ठंडा पानी डालने के लिए एक नया फुल स्क्रीन वाला फ़ोन लिया है उसने. बटन भी स्क्रीन पर ही आता है और फोटू दुन्नो तरफ से खिंचाता है. करोल बाग़ में आधा घंटा मोल मोलई के बाद अढ़ाई हज़ार में दिया था…डुप्लीकेट माल.
ट्रैन ने अब थोड़ी गति पकड़ी…सुनील अपनी बीवी के चेहरे पर खिलने वाली मुस्कान को अपनी आँखों में संजोये बैठा है…अब गंदे शौचालय की महक उसे परेशान नहीं कर रही.
 
अपने चौदहवें माले के फ्लैट की बालकनी में खड़े अविनाश ने एक बार फिर अपनी घड़ी को घूरा…चार बज कर दस मिनट…सुबह के. उसके चेहरे पर परेशानी की लकीरे और साफ़ दिखने लगी थी. अंदर लतिका अपने सुपुत्र श्रेयांश उर्फ़ ‘मोनू’ को नींद से जगा कर तैयार करने की कोशिश कर रही थी.
‘मोनू…उठो न..दादी पास जाना है आज…चलो…उठो अब…कपड़ा कैसे बदले तुम्हारा…ओह्ह’
मोनू बाबू कल भर पेट स्कूल में भागा दौड़ी किये हैं…भोरे भोरे उठने की हिम्मत नहीं है उनमें. अविनाश ने बालकनी से ही चिल्ला कर कहा,
‘जो पहने हुए है, ठीक है…पटना में एयरपोर्ट पर उसको चेंज कर देना…ओला से कन्फर्मेशन आया था न फ़ोन पे’
‘हाँ भई, सब मेसेज आया था…क्या हुआ, अभी तक कैब नहीं असाइन किया है क्या?…कॉल करो न’
‘कॉल किये थे अभी…सॉरी बोल के नेक्स्ट ट्रिप फ्री दे रहा है, मगर अभी कोई कैब नहीं है उसके पास भी इस एरिया में…गरियाने पर बोल रहा है टर्म्स एंड कंडीशंस पढ़ लो फिर से’
‘उबेर में देखे क्या’
‘उसमें भी नहीं है’
‘क्या होगा फिर, इतना महंगा टिकट लिए थे’
बीस हज़ार का टिकट पड़ा था एक आदमी का…इंडिगो की डायरेक्ट फ्लाइट. सुबह छे बजे वाली. इंडिगो वाले भी छठ पर्व का महत्वा समझते थे अच्छी तरह.
‘सुनो न, बगल में जो लोग शिफ्ट किया है दो दिन पहले, उन लोग से पूछो एक बार…शायद हेल्प करे’
‘अरे कोई अगल बगल में जाना रहता तो कोई बात नहीं था, चालीस किलोमीटर एक साइड पड़ता है…कैसे कहें’
‘ट्राई तो करो, हो सकता है मान जाए’
अविनाश को और कुछ नहीं सूझ रहा था. ऑफिस के दोस्त लोग भी उससे काफी दूर रहते थे, वो अगर छोड़ने को तैयार भी होते तो फ्लाइट छूट जाती. हार मान कर उसने सामने वाले फ्लैट का बेल्ल बजाया. तीन बेल्ल के बाद अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आयी.
‘यस’
‘हाई, आई एम् अविनाश…आई लिव राइट अक्रॉस इन 1405 ‘
‘ओह हेलो…आई एम् श्रीकांत…मगर इतनी सुबह…आपको कुछ अर्जेंट है क्या’
अविनाश ने पूरा मामला समझाया. श्रीकांत ने दिलासा दिया,
‘दीज बग्गर्स…आप घबराओ मत…आई विल ड्राप यू…जस्ट गिव मि फाइव मिनट्स’
अविनाश भागा भागा वापस आया,
‘चलो, वो तैयार हो गया है…सामान लगा रहे हैं लिफ्ट में हम…मोनू को वैसे ही ले आओ’
दस मिनट बाद सब लोग, श्रीकांत की स्कार्पियो में आउटर रिंग रोड की धूल उड़ाते हुए एयरपोर्ट की तरफ बढ़ रहे थे.
‘अभी कुछ स्पेशल है क्या आपके उधर’
‘हाँ…हम बिहार से हैं न…वहां अभी छठ होता है…आपने सुना है छठ के बारे में’
‘थोड़ा सुना है…मैं तो केरल से हूँ, कुछ दिन बॉम्बे में रहा था….उधर भी मेरे बिल्डिंग में लोग करते थे छत पर…आप सूर्य की पूजा करते हैं न…अमेजिंग’
अविनाश तो अब छठ का विकिपीडिया पेज बन गया था…उसने श्रीकंठ को पिछले साल के फोटो भी दिखाए. पीछे की सीट पर मोनू के साथ साथ उसकी मम्मी भी खर्राटे ले रही थी.
समय से ये लोग एयरपोर्ट पहुँच गए. श्रीकांत ने जाते जाते वचन लिया,
‘मेरे लिए स्पेशल प्रसाद लाइयेगा’
‘पक्का’
मोनू बाबू उठ गए हैं और अब केम्पेगौडा अंतर-राष्ट्रीय विम्मानपत्तन स्थल की दीवारें उनके सुरमयी रुदन की चीखों से गुंजायमान हो रही थी. फ्लाइट ऑन-टाइम है. लतिका ने सोचा,
‘छठी मैय्या के कृपा से ही पकड़ा पाया है आज…वरना चांस कम ही लग रहा था’
लतिका ने उचक कर मोनू के सीट के ऊपर वाली एयर वेंट को बंद किया. फिर बैग में रखे बोरबर्न बिस्कुट का पैकेट निकाला.
 
छठ स्पेशल ट्रैन में बैठे सुनील ने टाइगर बिस्कुट के पैकेट को सावधानी से खोला. बिस्कुट के पाउडर को अपने हथेली पर डाला और भूंजे की तरफ फांक गया. बगल में एक नया आदमी आकर बैठा था. उसने सुनील को अपने पैकेट से एक बिस्कुट ऑफर किया. वैसे तो सुनील ने बहुत सारे किस्से सुन रखे थे नशा करके लूटने वालों के.
‘ऐसा ट्रैन में कौन नशा करा के लूटेगा’ उसने खुद को समझाया और एक बिस्कुट मुस्कुराते हुए निकाल लिया. ठीक दस मिनट बाद, उसे लगा मानो कोई अदृश्य ताकत उसकी पलकों को बंद कर रही है. कितना भी विरोध करने पर उसका शरीर निढाल हो गया…सामने मनोज भी अपने उधारी अखबार को ही तकिया बना कर सो चूका था. सुनील ने हिम्मत छोड़ दी…एक बड़ा अच्छा सा सपना देखने लगा वो.
 
ट्रैन थोड़े झटके से खुली…साथ में सुनील की आँखें भी…बाहर अँधेरा नहीं है. सुनील ने समय देखने के लिए कलाई मोड़ी,
‘हैं…घड़ी तो पहने हुए थे…कहाँ गया…इस हाथ में भी नहीं है…ले…हमारा बीफ़केस…उसी में तो फ़ोन था…धत्त…बिस्कुट वाला आदमिया कहाँ गया?…साला सब छठ के समय भी लूटता है…डबल पाप चढ़ेगा ऐसा कमीना सब पर’
सुनील को गुस्से से ज्यादा दुःख हो रहा था. मनोज सामने अभी तक सो रहा था. उसका सामान सलामत था. सुनील ने मनोज को उठाया. मनोज ने पूरा मामला समझने के बाद सुनील को ही डांटा,
‘माने इतना कहानी सुने हो फिर भी दूसरा का दिया खा लिए…अच्छा हुआ है’
‘अब क्या करें…पैसा भी उसी में रखे हुए थे’
‘पैसा तो हमारे पास भी ज्यादे नहीं है…बस का भाड़ा भर है’
दोनों के मुँह लटक गए.
‘कहाँ पहुंचे हैं हम लोग’
दरवाज़े पर बैठे लड़के ने जवाब दिया,
‘मुग़ल सराय पुहंचने वाले हैं’
चलिए कम से कम ट्रैन ज्यादे लेट नहीं है. मगर सुनील को समझ नहीं आ रहा की पटना से अपने गांव जायेगा कैसे.
 
इंडिगो की फ्लाइट पटना में लैंड कर चुकी है. जहाज दुसरे छोर से घूम कर वापस आ रहा है. अविनाश ने घर फ़ोन लगाया है,
‘हाँ…हम लोग पटना लैंड कर गए हैं…गोकुल बाबू आये हुए हैं न गाड़ी लेकर’
‘नहीं बेटा, गोकुल बाबू का भगिना का कल एक्सीडेंट हो गया था, उसी में फंसे हुए हैं…कोई नहीं जा पाया है…तुम बस या टैक्सी से आ जाओ’
अविनाश को अचरज हुआ…एक के बाद एक लफड़ा.
सामान उठा कर, प्री-पेड टैक्सी काउंटर…जहाँ कोई मौजूद नहीं. मन मार कर बाहर पहुंचे.
‘सर आइये न…ए सी टैक्सी है…पटना लोकल जाइएगा की बाहर.’
‘हाजीपुर से थोड़ा आगे जाना है…सराए के पास’
‘पांच हज़ार लगेगा सर’
‘काहे जी…हेलीकॉप्टर से ले जाओगे क्या?’
‘काहे मजाक कर रहे हैं सर?’
‘वाह, शुरू कौन किया ये मजाक’
मोल तोल करके साढ़े तीन हज़ार पर बात तय हुआ.
‘अब तो नया वाला पुल खुल गया है न’
‘हाँ सर, उधर से ही ले चलेंगे…गांधी सेतु से ज्यादे नज़दीक भी पड़ता है’
 
छठ स्पेशल फुलवारीशरीफ हॉल्ट पर बहुत देर से रुकी हुई थी. पटना जंक्शन पर कोई प्लेटफार्म खाली नहीं था उसके लिए. मनोज और सुनील यहीं उतर गए. सुनील का बस एक झोला बचा था. मनोज और उसके कुछ सहयात्रियों ने थोड़े पैसे जमा करके सुनील को दिए थे. बस के भाड़े से कुछ कम ही थे अभी भी. मनोज ने सुनील से विदा ली. सुनील चुप चाप पैदल ही मार्च कर गया…जितना आगे से पकड़ेगा उतना कम भाड़ा देना पड़ेगा. नए वाले पुल के बारे में उसने भी सुना था. रास्ता पूछते पाछते चल पड़ा. वो अपने सोच में डूबा सड़क क्रॉस कर रहा था…तेज़ी से आती हुई टैक्सी उसे दिखी भी नहीं.
 
अविनाश की टैक्सी बेली रोड पे जाम में फँसी थी. जाम खुलते ही ड्राइवर ने तेज़ी से गाड़ी बढायी.
‘अरे देखो…आदमी है’
टैक्सी ड्राइवर ने ज़ोर से ब्रेक मारा.
‘पागल है क्या जी…आँख मूँद के रोड क्रॉस कर रहा है’ ड्राइवर गर्दन निकाल कर चिल्लाया.
अविनाश ने भी गुस्से से सुनील की तरफ देखा. फिर उसके गले से ख़ुशी की किलकारी निकली,
‘ओ तेरी…सुनील!!!’
सुनील ने भी अविनाश को पहचान लिया.
‘छठ में घर जा रहे हैं…तुम भी लगता है घर है आये हो न…भाभी भी हैं क्या’
‘हाँ…बेटा भी है, तुम तो मिले नहीं हो…आओ इधर…लतिका…हमारे बचपन का दोस्त है…सुनील…मंदिर के पीछे जो घर है, इन्हीं लोग का है’
प्रणाम पाती हो गया. अविनाश और सुनील अंतिम बार सुनील की दादी की श्राद्ध में मिले थे दो साल पहले. बचपन की गहरी दोस्ती थी, भले अविनाश सफलता की सीढ़ी में सुनील से काफी ऊपर निकल गया था, मगर बचपन में साथ की गयी बदमाशियों ने उन्हें अभी तक साथ जोड़े रखा था.
‘पैदल कहाँ मार्च कर रहे हो’
सुनील ने अपनी व्यथा सुनाई.
‘चलो फिर हमारे साथ. जगह भी है…हम पीछे बैठ जायेंगे’
सुनील थोड़ा न नुकुर करने के बाद तैयार हो गया. अविनाश ने कहा,
‘आज एक अनजान आदमी ने हमारी मदद की…छठी मैया ने फिर हमें तुम्हारी मदद के लिए भेज दिया…वरना ऐसा संयोग की ऐसे ही चलते हुए मिल जाओ सड़क पर’
सब लोग अब नए पुल की सुंदरता का रसपान करते हुए अपने ‘घर’ की तरफ चल दिए…साथ में अविनाश और सुनील के रोमांचक कारनामो के किस्से भी…सबसे ज्यादा ठहाके टैक्सी ड्राइवर लगा रहा है लेकिन.
दो दिन बाद गांव के पोखर पर भीड़ लगी है चारो तरफ…सूर्यास्त का समय. सुनील की चाची मामा (दादी) घुटना भर पानी में खड़ी हैं. उनके बगल में अविनाश की दादी. दोनों ने अस्ताचल गामी सूर्य को अरग दिया…सुनील ने अविनाश की तरफ देखा…डूबते सूर्य के प्रकाश में दोनों के मुस्कुराते चेहरे और ज्यादा दमक रहे हैं. बैकग्राउंड में ‘मारबौ गे सुग्वा धनुख से’ गुंजायमान है 
– महापर्व छठ पर आप सबके चेहरे भी इसी तरह ख़ुशी से दमकते रहे. आप सबको छठ की ढेरों शुभकामनाएं.